STORYMIRROR

अधपके अमरूद की तरह पृथ्वी

अधपके अमरूद की तरह पृथ्वी

1 min
545


खरगोश अँधेरे में

धीरे-धीरे कुतर रहे हैं पृथ्वी।


पृथ्वी को ढोकर

धीरे-धीरे ले जा रही हैं चींटियाँ।


अपने डंक पर साधे हुए पृथ्वी को

आगे बढ़ते जा रहे हैं बिच्छू।


एक अधपके अमरूद की तरह

तोड़कर पृथ्वी को

हाथ में लिये है

मेरी बेटी।


अँधेरे और उजाले में

सदियों से

अपना ठौर खोज रही है पृथ्वी।।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Drama