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Nihal singh Singh

Tragedy Classics Others

4.5  

Nihal singh Singh

Tragedy Classics Others

अब के बाद हम अजनबी

अब के बाद हम अजनबी

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    ख़ुद को बरबाद कर ही लिया,
 जिसका डर था, आख़िरकार वो कर ही लिया।
 जिसकी पनाहों में ख़ुद को रखा था मैंने,
 एक बवंडर ने उसे मुझसे हर ही लिया।


बेकरारी मेरे दिल की फ़िज़ूल ही रही,
 मुहब्बत की बेड़ियाँ उसे नामंज़ूर ही रहीं।
 फ़ैसला हुआ है कि फ़ासले होंगे,
 अब के बाद हम अजनबी से ही होंगे।

दरख़्त की छाँव वही है, मगर हम एक नहीं,
 लबों पर हँसी तो है, पर ये हक़ीक़त नहीं।
 बरसात का मौसम है और तेरी याद भी,
 ज़िंदगी गुलज़ार है—अब ऐसा कोई ख़्वाब नहीं। 

हारा हूँ मैं भी, और मुझसे जुड़ा वो शख़्स भी,
 धड़कन रुकी-सी है, मगर ज़िंदा हैं अभी।
 जिस एक ने मेरी दुनिया बदली थी कभी,
 वो आज भी रूह से बातें करती है—अभी भी।     


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