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Nihal singh Singh

Abstract Classics Inspirational

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Nihal singh Singh

Abstract Classics Inspirational

गुलिस्ताँ के बाद

गुलिस्ताँ के बाद

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  अपने दिल की कोई भी बात अब नहीं मानता,
 मुझे उससे नफ़रत है या नहीं — ये भी नहीं जानता। पर मुहब्बत मेरी रह गई सड़क के उस मोड़ पर,
जहाँ से उसे नज़र भर कर आख़िरी मर्तबा देखा था

अब कोई कशिश दिल में नहीं रही,
शायद रूह भी जिस्म में शामिल नहीं रही।
क़ातिल ने आख़िरी मुराद पूछी है मुझसे —
क्या कहूँ… कि अब वो सड़क भी नहीं रही।

मैंने देखा है वहाँ अब एक बड़ा गुलिस्ताँ है,
फूल मेरा किरदार बन कर खड़ा है।
तितली आई, अंदर का पीयूष ले उड़ी,
और फूल इंतज़ार में चुपचाप खड़ा है।

गुलिस्ताँ के पास ही एक और बाग़ भी है,
वो तितली उड़कर वहीं तो जाती है।
वहाँ के गुलाबों का रस पीकर,
मदहोश हो वहीं ठहर जाती है।

और मेरा फूल… इंतज़ार की धूप में मुरझा जाता है।

अब समझ आया — कसूर तितली का भी नहीं था,
हर फूल मुक़द्दर से महकता नहीं।
कुछ इश्क़ गुलिस्ताँ में सजाए जाते हैं,
और कुछ… बस यादों में ही खिलते हैं कहीं।  


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