आज़माइश...
आज़माइश...
अपनी "ज़रूरतें" कम कर दीजिए...
आपकी "चाहतें" खुद-ब-खुद ही
कम हो जाएंगी... !
आज़माकर देख लीजिये... !!!
अक्सर हम इंसान
थोड़ा-सा और ज़्यादा पाने की
अधीर 'चाह' में
अपना अस्तित्व भी दाव पर लगा देते हैं...
और अंत में उसका परिणाम
हमें ही भुगतना पड़ता है...!
इसीलिए हमें अपनी
चाह की एक 'सीमा'
निर्धारित करना ज़रूरी है,
अन्यथा असीम ख्वाहिशों की
मायाजाल में फँस कर
हम अपना सर्वस्व
लूटाने की कगार में
आकर खड़े हो जाते हैं...!
