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Anshita Dubey

Inspirational

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Anshita Dubey

Inspirational

आत्ममंथन की ओर

आत्ममंथन की ओर

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अनभिज्ञता से परिपूर्ण जीवन मरण के अविरल चक्र से,

सहसा हुआ जब आभास,किया स्मरण पूर्व ब्रह्मविलास,

अन्तःकरण का आर्तनाद,विवश किया करने को विलाप,

भौतिकता का प्रागंण विशाल, मानो ज्योति रहित निर्जीव मशाल,

आन्नदित माया का अभिनंदन,गौण होता क्रमशः मेरा क्रन्दन,

मनःस्थिति का वह तीव्र स्पंदन,असह्य हो रहा प्रभुत्व से विघटन,

पर रोमांचित होते परजन,देखकर विह्वल काया नूतन,

तन से चित्त का अन्योन्य आलिंगन,शाश्वत है यह सत्य पुरातन,

ज्ञात हुआ जब मुझे ये सत्य परम,नष्ट हुआ तब द्विविधा का तम,

प्रदीप्त हुई हृदय में आशा की ज्योति,परब्रह्म से पुर्नमिलन की भावी अनुभूति,

जीवन उदधि का अथाह विस्तार,कर्म बीज का मिला सार,

शांत हुआ अन्तरमन विक्षिप्त,ज्ञात कर निज उदभव का निमित्त,

नौका मात्र है यह शरीर स्थूल,मृत्युकाल का वह अद्भुत कूल,

सगुण-निर्णुण का संयोग अति मंजुल,कायिक-कैवल्य का आनंद है विपुल,

मोक्ष मात्र था इक प्रवास,हो गया हृदय को पूर्ण विश्वास,

कि कर लेगा जीवन सहर्ष ही पार,सागर रूपी यह संसार ।


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