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Priyesh Pal

Inspirational


4.6  

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आओ रचे इक जहां

आओ रचे इक जहां

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चलो,

इक जहां रचे।


बच्चे, अपने ही तो हैं,

जहाँ बोझ न लगे।

शिक्षा रहे निर्मल, 

जहाँ व्यापार न बने। 

शिक्षितजन बने इन्सान भी, 

जहाँ वे संवेदनहीन न रहें। 


चलो न, 

इक ऐसा ही जहां रचे।


क्योंकि आहत हूँ देखकर, 

असंवेन्दनशील चिकित्सक, 

व्यापारी शिक्षक, 

रिश्वतखोर रक्षक

दिशाहीन पीढ़ी, 

शन्न मानवता।।। 


तो चलो, 

रच ही ले इक जहां !

प्रेम फले, 

इंसानियत फूले जहाँ।।


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