आओ प्रकृति से प्यार कर लें
आओ प्रकृति से प्यार कर लें
आओ प्रकृति से प्यार कर लें
बातें उससे दो-चार कर लें
कुछ अपनी सुना दें
कुछ उसकी सुन लें।
अपनी तो सुना दी थी
उसकी सुनने का समय नहीं था
छलनी होती उसकी देह पर
किसी को भी विस्मय नहीं था।
प्रकृति ने हमें बनाया है
उसे हमारी साँसों पर गुमान था
हमने उसे बनाया नहीं था
उसकी उखड़ती साँसों से कौन परेशान था।
उसका मन आहत था
हमारी चाहत में
हमने उसे खिलौने की तरह खेला
जी भर गया तो तोड़ दिया
अपने हिसाब से मरोड़ दिया।
प्रकृति अब आक्रोश में सवाल दांगती है
अपने दामन की चोटों का हिसाब माँगती है
कहर बन कर फूटते हैं,
उसके जिस्म पर, हमारे दिए नासूर
पीड़ा उनकी अब हमें ही सालती है।
