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Shraddhanjali Shukla

Abstract

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Shraddhanjali Shukla

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आँसू बहाता अमन है

आँसू बहाता अमन है

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आँसू बहाता अमन है

उजडा उजडा चमन है

मौजूदा हालातों पर-

देख तो रोता गगन है


जाति धर्म के झगडों में

बेमतलब के लफडो में

मरता बेकसूर सदा ही-

गहरी चोट थपेडों में


सब कहते हैं मेरा है

कुछ भी नहीं तेरा है

फिर भी देखो चमन में-

चारों ओर अंधेरा है


रूह भी कांप जाती है

ऐसे मंजर दिखाती है

आती जाती खबरों से

आँखें भी भर आती हैं


बड़ा विचलित सा मन है

बोझिल बोझिल सा तन है

कैसे कहें आज तो बस

आँसू बहाता अमन है।


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