**आम आदमी**
**आम आदमी**
मैं हूँ:
आम आदमी,भीड़ बन जाता हूँ,
हर बात पे ताली,अक्सर मैं बजाता हूँ ।
जब भी मुझ पे ख़ास हाथ कोई उठता है,
खुद ही खड़ा तमाशबीन बन जाता हूँ।
बात-बात पर झगड़े पे आ जाता हूँ,
घास हूँ,हर सदी में कुचला जाता हूँ।
मैं:
रोता हूँ,चिल्लाता हूँ,
कमाता हूँ, खिलाता हूँ,
भर पेट कभी नहीं खाता हूँ,
अक्सर भूखा ही सो जाता हूँ।
मैं मिलता हूँ:
खेतों में,खलिहानों में,
फैक्ट्रियों में,खदानों में,
मंडियों में, गोदामों में,
जंगलों में,बागानों में।
मैंने हर सदी को:
बड़े-बड़े धुरंदर दिए,
शाह दिए, सिकंदर दिए,
मुर्शिद दिये मुरीद दिए,
दरवेश दिए, कलंदर दिए।
फिर खुद:
उनकी बातों में आ जाता हूँ,
ताली पे ताली मैं बजाता हूँ,
कुछ ओर नहीं कर पाता हूँ,
बस,ताली पे ताली बजाता हूँ।
मैं भूल गया:
कल किसने मुझको लूटा था ?
कल किसने मुझको कूटा था ?
एक टूटा हुया तारा हूँ,
कब आसमान से टूटा था ?
पर:
जब-जब भी मैं जागा,नाबर भाग गये,
चंगेज़,अँगरेज़, फिरंगी,जाबर भाग गये,
शाह अब्दाली, गज़नी, तैमूर भागे सब,
तुर्क, पठानी नादिर, बाबर भाग गये।
अब मैं:
ताली नहीं बजाऊंगा, मैं जाग गया हूँ
भीड़ नहीं बन पाऊंगा, मैं जाग गया हूँ।
-- एस.दयाल सिंह--
