Exclusive FREE session on RIG VEDA for you, Register now!
Exclusive FREE session on RIG VEDA for you, Register now!

S.Dayal Singh

Abstract


4  

S.Dayal Singh

Abstract


**आम आदमी**

**आम आदमी**

1 min 60 1 min 60

मैं हूँ:

आम आदमी,भीड़ बन जाता हूँ,

हर बात पे ताली,अक्सर मैं बजाता हूँ । 

जब भी मुझ पे ख़ास हाथ कोई उठता है,

खुद ही खड़ा तमाशबीन बन जाता हूँ।

बात-बात पर झगड़े पे आ जाता हूँ,

घास हूँ,हर सदी में कुचला जाता हूँ।

मैं:

रोता हूँ,चिल्लाता हूँ,

कमाता हूँ, खिलाता हूँ,

भर पेट कभी नहीं खाता हूँ,

अक्सर भूखा ही सो जाता हूँ।

मैं मिलता हूँ:

खेतों में,खलिहानों में,

फैक्ट्रियों में,खदानों में,

मंडियों में, गोदामों में,

जंगलों में,बागानों में।

मैंने हर सदी को:

बड़े-बड़े धुरंदर दिए,

शाह दिए, सिकंदर दिए,

मुर्शिद दिये मुरीद दिए,

दरवेश दिए, कलंदर दिए।

फिर खुद:

उनकी बातों में आ जाता हूँ,

ताली पे ताली मैं बजाता हूँ,

कुछ ओर नहीं कर पाता हूँ,

बस,ताली पे ताली बजाता हूँ।

मैं भूल गया:

कल किसने मुझको लूटा था ?

कल किसने मुझको कूटा था ?

एक टूटा हुया तारा हूँ,

कब आसमान से टूटा था ? 

पर:

जब-जब भी मैं जागा,नाबर भाग गये,

चंगेज़,अँगरेज़, फिरंगी,जाबर भाग गये,

शाह अब्दाली, गज़नी, तैमूर भागे सब,

तुर्क, पठानी नादिर, बाबर भाग गये।

अब मैं:

ताली नहीं बजाऊंगा, मैं जाग गया हूँ

भीड़ नहीं बन पाऊंगा, मैं जाग गया हूँ।

**एस.दयाल सिंह **


Rate this content
Log in

More hindi poem from S.Dayal Singh

Similar hindi poem from Abstract