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बेज़ुबानशायर 143

Abstract Fantasy Inspirational

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बेज़ुबानशायर 143

Abstract Fantasy Inspirational

आज फिर से तुम बुझा दीपक जलाओ

आज फिर से तुम बुझा दीपक जलाओ

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है कहां वह आग जो मुझको जलाए,

है कहां वह ज्वाल पास मेरे आए,


रागिनी, तुम आज दीपक राग गाओ;

आज फिर से तुम बुझा दीपक जलाओ ।


तुम नई आभा नहीं मुझमें भरोगी,

नव विभा में स्नान तुम भी तो करोगी,


आज तुम मुझको जगाकर जगमगाओ;

आज फिर से तुम बुझा दीपक जलाओ ।


मैं तपोमय ज्योति की, पर, प्यास मुझको,

है प्रणय की शक्ति पर विश्वास मुझको,


स्नेह की दो बूंदें भी तो तुम गिराओ;

आज फिर से तुम बुझा दीपक जलाओ ।


कल तिमिर को भेद मैं आगे बढूंगा,

कल प्रलय की आंधियों से मैं लडूंगा,


किन्तु आज मुझको आंचल से बचाओ;

आज फिर से तुम बुझा दीपक जलाओ ।



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