STORYMIRROR

Shikha shivangee

Abstract

4  

Shikha shivangee

Abstract

आज फिर जी चाहता है

आज फिर जी चाहता है

1 min
296

कभी बैठो तो फुर्सत में

तुझसे तेरी ही शिकायत करने का

आज फिर जी चाहता है।


मंदिर में बंधी घंटी तेरे संग बजाने का

और बंद आँखों से भी तुझे

सिर्फ तुझे देखने का

आज फिर जी चाहता है।। 


तेरी दी पाटिल की सौरभ में खोने का

तेरे पसंदिता लिबाज़ में सजने का

आज फिर जी चाहता है।


तुझे निहारने का

तेरे केश को बुहारने का

आज फिर जी चाहता है।


तेरे एक स्पर्श से बलखाने का

और तुझसे शर्मा के

तेरे ही गले लग जाने का

आज फिर जी चाहता है।।


तेरी कलाई पर गुदगुदाने का

फिर चुपके से तेरी ऊँगली पकड़ने का

आज फिर जी चाहता है।


तुझे दूर खड़े मुस्कुराते देखने का

तेरे बिन छुए भी तुझे

खुद में समां लेने का

आज फिर जी चाहता है।


तेरी परछाई बनकर तेरे संग चलने का

या अंधेरे में तेरे दीपक का लौ बनने का

आज फिर जी चाहता है।


अपना मस्तक तेरे कंधे पे रखने का

तेरा सदैव साथ निभाने का वादा सच करने का

आज फिर जी चाहता है।


तूने बेहद प्यार कर दिया है शायद

इस ऋण को चुकाने का

आज फिर जी चाहता है।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract