STORYMIRROR

Seema Kulthe

Abstract

2  

Seema Kulthe

Abstract

आग

आग

1 min
55

 ये आग है

 कभी दहकती है कभी सुलगती है 

 कभी चिंगारी बनके भड़कती है 

  

कभी गर्मी हैं तो कभी जलन है

 कभी अंगारों से आग जलाती है 

 

कभी लाल है तो कभी काली है 

 पर पानी से ही प्यास बुझाती है।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

More hindi poem from Seema Kulthe

जान

जान

1 min पढ़ें

बादल

बादल

1 min पढ़ें

भ्रम

भ्रम

1 min पढ़ें

शिखर

शिखर

1 min पढ़ें

आँगन

आँगन

1 min पढ़ें

आग

आग

1 min पढ़ें

दोस्त

दोस्त

1 min पढ़ें

Similar hindi poem from Abstract