लाल होली
लाल होली
"हाय राम। ये क्या को गया। होली से पहले ये कौन होली खेल गया।" गली के मुहाने पर पड़ी लाशों को देखकर रमा अपनी सुधबुध खो बैठी।
पिछले काफी दिनों से शहर में तनाव का माहौल था। दो दिन पहले शुरू हुई ये खून की होली अब तक नही रुकी हैं। हर गुट दुसरे गुट के लोगो को मारकर उनके मोहल्लों में लाशे फेंककर जा रहा हैं। अब तो मोहल्ले के कुत्ते भी भोंकना भूल चुके हैं। वफ़ादारी करे भी किसकी? दिनोदिन मालिक खोते जा रहे हैं। कब किस मोड़ पर कौन व्यक्ति की लाश मिल जाएँ कुछ कहा नही जा सकता हैं।
"ये बेचारा रामधन। मना करते हुए भी घर से बाहर चला गया और कमीनों ने मार दिया बेचारे को।" विनीता ने एक लाश की ओर इशारा करते हुए कहा।
"क्या करता बेचारा। उसकी बेटी बहुत ज्यादा बीमार थी। बीती रात काफी खराब हालत हो गयी तब डॉक्टर को लाने गया था। इसका इंतजार करते करते बेटी की भी साँस टूट गयी। सदमें में रेणु बेहोश घर में पड़ी हैं। पता नही बेचारी पर क्या गुजरेगी जब उसको ये सब पता चलेगा।" जानकी ने कहा।
"बरसो से शहर में साथ में रहते आ रहे है। कभी कोई दिक्कत नही हुई। अब पता नही क्यों एक दुसरे के खून के प्यासे हो गये हैं लोग? लोगो के जान की कोई कदर तक नही हैं। हर रोज चौक चौराहे रक्त रंजित दीखते हैं। घोर कलयुग हैं। शायद कोई अवतार बनकर भगवन जमीन पर आने का इंतजार हैं।"
कहते कहते आवाजें धीमी होने लगती हैं। चौराहे के दूसरी तरफ एक पोस्टर में नेताजी की मुस्कान दृष्टिगोचर होती हैं। ये पोस्टर बता रहा था कि हाल ही में चुनाव गये हैं। इस पोस्टर की जगह थोड़े दिनों बाद होली की शुभकामनाए देते हुए नेताजी भी दिखाई देंगे। जो होली इन्होने खेली हैं।
