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ashok kumar bhatnagar

Inspirational

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मैं भारत का राष्ट्रीय ध्वज " तिरंगा " : सुनिए मेरी कहानी मेरी ज़ुबानी

मैं भारत का राष्ट्रीय ध्वज " तिरंगा " : सुनिए मेरी कहानी मेरी ज़ुबानी

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        इस साल 15 अगस्त को हमें आजाद हुए 75 वर्ष पूरे हो जायेंगे। इस मौके पर केंद्र सरकार ने बड़ा फैसले लिये है जिसमें एक फैसला यह है की अब तिरंगा दिन रात फहराया जा सकता है। सरकार ने इसके नियम में बदलाव किये है इससे पहले ,तिरंगे को केवल सूर्योदय से सूर्यास्त तक फहराने की अनुमति थी। साथ ही अब पॉलिएस्टर और मशीन से बने तिरंगे का भी उपयोग किया जायेगा । आजादी के अमृत महोत्सव के तहत सरकार हर घर तिरंगा कार्यक्रम का ऐलान किया है।‘ आजादी का अमृत महोत्सव’ के तहत सरकार 13 से 15 अगस्त तक ‘हर घर तिरंगा’ कार्यक्रम की शुरुआत करने जा रही है। अपने-अपने घरों में तिरंगा लगाने की अपील की गई है।

 

                      मैं भारत का  राष्ट्रीय ध्वज भारत देश की संस्कृति, सभ्यता और इतिहास को दर्शाता हूँ । हवा में लहराता हुआ मैं भारत का  राष्ट्रीय ध्वज भारत की स्वतंत्रता को प्रदर्शित करता हूँ। मैं भारत का  राष्ट्रीय ध्वज भारत देश के नागरिकों की स्वतंत्रता के साथ-साथ अंग्रेजों के अत्याचार से मुक्त होने पर अपना एवं अपने देशवासियों का गौरवयुक्त अभिमान हूँ । मैं भारत  का राष्ट्रीय ध्वज स्वतंत्रता के लिए, भारत की लम्बी लड़ाई व राष्ट्रीय खजाना का प्रतिनिधित्व करता हूँ । मैं स्वतंत्र भारत के गणतंत्र का प्रतीक हूँ ।

                     देश आजाद होने के कुछ दिन पूर्व 22 जुलाई 1947 को स्वतंत्र भारत के संविधान को लेकर एक सभा आयोजित की गई थी, जहाँ पर पहली बार मुझे यानी राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा को सबके सामने प्रस्तुत किया गया । इसके बाद 15 अगस्त 1947 से 26 जनवरी 1950 तक मुझे यानी राष्ट्रीय ध्वज को भारत के अधिराज्य के रूप में प्रस्तुत किया गया । 1950 में संविधान लागू होने पर मुझे स्वतंत्र गणतंत्र का राष्ट्रीय ध्वज घोषित किया गया । मुझे यानी राष्ट्रीय ध्वज को पिंगली वेंक्क्या द्वारा बनाया गया था ।

 

       मुझे भारतीय राष्ट्रीय ध्वज को सभी लोग ‘तिरंगा’ नाम से जानते है । मेरी यानी भारतीय राष्ट्रीय ध्वज की अभिकल्पना पिंगली वैंकैया ने की थी। मुझे यानी भारतीय राष्ट्रीय ध्वज को १५ अगस्त १९४७ को अंग्रेजों से भारत की स्वतंत्रता के कुछ ही दिन पूर्व २२ जुलाई, १९४७ को आयोजित भारतीय संविधान-सभा की बैठक में अपनाया गया था। मुझ में यानी भारतीय राष्ट्रीय ध्वज में तीन समान चौड़ाई की क्षैतिज पट्टियाँ हैं, जिनमें सबसे ऊपर केसरिया रंग की पट्टी जो देश की ताकत और साहस को दर्शाती में बीच में श्वेत पट्टी धर्म चक्र के साथ शांति और सत्य का संकेत है ओर नीचे गहरे हरे रंग की पट्टी देश के शुभ, विकास और उर्वरता को दर्शाती है। मेरी यानी भारतीय राष्ट्रीय ध्वज की लम्बाई एवं चौड़ाई का अनुपात ३:२ है। सफेद पट्टी के मध्य में गहरे नीले रंग का एक चक्र है जिसमें २४ आरे (तीलियां) हैं। यह इस बात प्रतीक है भारत निरंतर प्रगतिशील है। इस चक्र का व्यास लगभग सफेद पट्टी की चौड़ाई के बराबर होता है व इसका रूप सारनाथ में स्थित अशोक स्तंभ के शेर के शीर्षफलक के चक्र में दिखने वाले कतरह होता है। में यानी भारतीय राष्ट्रध्वज अपने आप में ही भारत की एकता, शांति, समृद्धि और विकास को दर्शाता हुआ दिखाई देता है। 

 

             मुझे यानी राष्ट्रीय ध्वज भारत की स्वतंत्रता के संग्राम काल में निर्मित किया गया था। वर्ष १८५७ में स्वतंत्रता के पहले संग्राम के समय भारत राष्ट्र का ध्वज बनाने की योजना बनी थी, लेकिन वह आंदोलन असमय ही समाप्त हो गया था और उसके साथ ही वह योजना भी बीच में ही अटक गई थी। वर्तमान रूप में पहुँचने से पूर्व मुझे यानी  भारतीय राष्ट्रीय ध्वज अनेक पड़ावों से गुजरा है। इस विकास में यह भारत में राजनीतिक विकास का परिचायक भी है। आईए मेरे यानी भारतीय राष्ट्रीय ध्वज के इन पड़ावों की बात कर ली जाये। 

 

              प्रथम चित्रित ध्वज १९०४ : स्वामी विवेकानंद की शिष्या भगिनी निवेदिता द्वारा बनाया गया था। 07 अगस्त, 1906 को पारसी बागान चौक (ग्रीन पार्क) कोलकाता में इसे कांग्रेस के अधिवेशन में फहराया गया था। इस ध्वज को लाल, पीले और हरे रंग की क्षैतिज पट्टियों से बनाया गया था। ऊपर की ओर हरी पट्टी में आठ कमल थे और नीचे की लाल पट्टी में सूरज और चाँद बनाए गए थे। बीच की पीली पट्टी पर वंदेमातरम् लिखा गया था।

 

           द्वितीय ध्वज  १९०७ :कोमैडम कामा और उनके साथ निर्वासित किए गए कुछ क्रांतिकारियों द्वारा पेरिस में फहराया गया था। कुछ लोगों की मान्यता के अनुसार यह १९०५ में हुआ था। यह भी पहले ध्वज के समान था; सिवाय इसके कि इसमें सबसे ऊपर की पट्टी पर केवल एक कमल था, किंतु सात तारे सप्तऋषियों को दर्शाते थे। यह ध्वज बर्लिन में हुए समाजवादी सम्मेलन में भी प्रदर्शित किया गया था। 

 

               तृतीय चित्रित ध्वज १९१७ : डॉ॰ एनी बीसेंट और लोकमान्य तिलक ने घरेलू शासन आंदोलन के दौरान तृतीय चित्रित ध्वज को फहराया। इस ध्वज में ५ लाल और ४ हरी क्षैतिज पट्टियाँ एक के बाद एक और सप्तऋषि के अभिविन्यास में इस पर सात सितारे बने थे। ऊपरी किनारे पर बायीं ओर (खंभे की ओर) यूनियन जैक था। एक कोने में सफेद अर्धचंद्र और सितारा भी था।

 

          चौथा चित्रित ध्वज  :कांग्रेस के सत्र बेजवाड़ा (वर्तमान विजयवाड़ा) में किया गया यहाँ आंध्र प्रदेश के एक युवक पिंगली वैंकैया ने एक झंडा बनाया । यह दो रंगों का बना था। लाल और हरा रंग जो दो प्रमुख समुदायों अर्थात हिन्दू और मुस्लिम का प्रतिनिधित्व करता है। गांधी जी ने सुझाव दिया कि भारत के शेष समुदाय का प्रतिनिधित्व करने के लिए इसमें एक सफेद पट्टी और राष्ट्र की प्रगति का संकेत देने के लिए एक चलता हुआ चरखा होना चाहिए।

 

           पंचम चित्रित ध्वज १९३१ :वर्ष १९३१ तिरंगे के इतिहास में एक स्मरणीय वर्ष है। तिरंगे ध्वज को भारत के राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाने के लिए एक प्रस्ताव पारित किया गया और इसे राष्ट्र-ध्वज के रूप में मान्यता मिली।  यह ध्वज जो वर्तमान स्वरूप का पूर्वज है, केसरिया, सफेद और मध्य में गांधी जी के चलते हुए चरखे के साथ था। 

 

            वर्तमान ध्वज 1949 :२२ जुलाई १९४७ को संविधान सभा ने वर्तमान ध्वज को भारतीय राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाया। स्वतंत्रता मिलने के बाद इसके रंग और उनका महत्व बना रहा। केवल ध्वज में चलते हुए चरखे के स्थान पर सम्राट अशोक के धर्म चक्र को स्थान दिया गया। मुझमे यानी  भारत के राष्‍ट्रीय ध्‍वज की ऊपरी पट्टी में केसरिया रंग है जो देश की शक्ति और साहस को दर्शाता है। बीच की पट्टी का श्वेत धर्म चक्र के साथ शांति और सत्य का प्रतीक है। निचली हरी पट्टी उर्वरता, वृद्धि और भूमि की पवित्रता को दर्शाती है। सफ़ेद पट्टी पर बने चक्र को धर्म चक्र कहते हैं। इस धर्म चक्र को विधि का चक्र कहते हैं जो तृतीय शताब्दी ईसा पूर्व मौर्य सम्राट अशोक द्वारा बनाए गए सारनाथ की लाट से से लिया गया है। इस चक्र में २४ आरे या तीलियों का अर्थ है कि दिन- रात्रि के २४ घंटे जीवन गतिशील है और रुकने का अर्थ मृत्यु है।

 

              २६ जनवरी २००२ को भारतीय ध्वज संहिता में संशोधन किया गया और स्वतंत्रता के कई वर्ष बाद भारत के नागरिकों को अपने घरों, कार्यालयों और फैक्ट्रियों आदि संस्थानों में न केवल राष्ट्रीय दिवसों पर, बल्कि किसी भी दिन बिना किसी रुकावट के मुझे यानी भारतीय राष्ट्रीय ध्वज को फहराने की अनुमति मिल गई। अब भारतीय नागरिक मुझे यानी भारतीय राष्ट्रीय ध्वज को कहीं भी और किसी भी समय फहरा सकते है, बशर्ते कि वे ध्वज की संहिता का कड़ाई से पालन करें और तिरंगे के सम्मान में कोई कमी न आने दें।

 

            मुझे यानी भारतीय राष्ट्रीय ध्वज को फहराने के कुछ नियम और विनियमन हैं। 

 मुझे यानी भारतीय राष्ट्रीय ध्वज को शैक्षिक संस्थानों (विद्यालयों, महाविद्यालयों, खेल परिसरों, स्काउट शिविरों आदि) में ध्वज को सम्मान की प्रेरणा देने के लिए फहराया जा सकता है। विद्यालयों में ध्वज-आरोहण में निष्ठा की एक शपथ शामिल की गई है।

किसी सार्वजनिक, निजी संगठन या एक शैक्षिक संस्थान के सदस्य द्वारा मुझे यानी भारतीय राष्ट्रीय ध्वज का अरोहण/प्रदर्शन सभी दिनों और अवसरों, आयोजनों पर अन्यथा मेरा यानी भारतीय राष्ट्रीय ध्वज के मान सम्मान और प्रतिष्ठा के अनुरूप अवसरों पर किया जा सकता है।

सभी निजी नागरिकों अपने परिसरों में मुझे यानी भारतीय राष्ट्रीय ध्वज को फहराने का अधिकार देना स्वीकार किया गया है।

मुझे यानी भारतीय राष्ट्रीय ध्वज को सांप्रदायिक लाभ, पर्दे या वस्त्रों के रूप में उपयोग नहीं किया जा सकता है। अब मुझे यानी भारतीय राष्ट्रीय ध्वज को दिन और रात में भी फहराया जा सकता है.

 

पहले मुझे यानी भारतीय राष्ट्रीय ध्वज को खादी के कपड़े का होना चाहिए. लेकिन अब पॉलिएस्टर के झंडे की भी अनुमति भी दे दी गई है.

   मुझे यानी भारतीय राष्ट्रीय ध्वज को आशय पूर्वक भूमि, फर्श या पानी से स्पर्श नहीं कराया जाना चाहिए।   मुझे यानी भारतीय राष्ट्रीय ध्वज को वाहनों के हुड, ऊपर और बगल या पीछे, रेलों, नावों या वायुयान पर लपेटा नहीं जा सकता।

   मुझे यानी भारतीय राष्ट्रीय ध्वज को  किसी अन्‍य ध्वज या ध्वज पट्ट को राष्ट्रीय ध्वज से ऊँचे स्थान पर लगाया नहीं जा सकता है। तिरंगे ध्वज को वंदनवार, ध्वज पट्ट या गुलाब के समान संरचना बनाकर उपयोग नहीं किया जा सकता।

 

 भारतीय कानून के अनुसार ध्वज को हमेशा 'गरिमा, निष्ठा और सम्मान' के साथ देखना चाहिए। । मुझे यानी भारतीय राष्ट्रीय ध्वज को किसी अन्‍य ध्वज या ध्वज पट्ट को राष्ट्रीय ध्वज से ऊँचे स्थान पर लगाया नहीं जा सकता है। मेरा यानी भारतीय राष्ट्रीय ध्वज का प्रयोग मेजपोश के रूप में, या मंच पर नहीं ढका जा सकता, इससे किसी मूर्ति को ढका नहीं जा सकता न ही किसी आधारशिला पर डाला जा सकता था। 

              सन २००५ तक इसे पोशाक के रूप में या वर्दी के रूप में प्रयोग नहीं किया जा सकता था। पर ५ जुलाई २००५, को भारत सरकार ने संहिता में संशोधन किया और ध्वज को एक पोशाक के रूप में या वर्दी के रूप में प्रयोग किये जाने की अनुमति दी। हालाँकि ।मेरा यानी भारतीय राष्ट्रीय ध्वज का प्रयोग कमर के नीचे वाले कपड़े के रूप में या जांघिये के रूप में प्रयोग नहीं किया जा सकता है।

       ।मेरा यानी भारतीय राष्ट्रीय ध्वज को तकिये के रूप में या रूमाल के रूप में करने पर निषेध है।] झंडे को जानबूझकर उल्टा रखा नहीं किया जा सकता, किसी में डुबाया नहीं जा सकता, या फूलों की पंखुड़ियों के अलावा अन्य वस्तु नहीं रखी जा सकती। किसी प्रकार का सरनामा झंडे पर अंकित नहीं किया जा सकता है।

         शोक के समय, राष्ट्रपति के निर्देश पर, उनके द्वारा बताये गए समय तक झंडा आधा प्रवाहित होना चाहिए। जब झंडे को आधा झुका कर फहराना हो तो पहले झंडे को शीर्ष तक बढ़ा कर फिर आधे तक झुकाना चाहिए। 

 

      


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