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वीर सैनिक राजू
वीर सैनिक राजू
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© यवधेश साँचीहर

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आज कोरणा गाँव में काफी चहल पहल है। सभी लोग रावले पर इकठ्ठा हुए हैं। कुछ तो बात है अचरज की।

रामियो बोला- "आज क्या बात हो गयी गाँव में कि इतनी उधम मची हुई है ?"

फलाणा व्यक्ति-"अरे वेन्डा, इतना भी नहीं पता, आपणा सीतारामजी के लड़के को राजकीय सम्मान मिला है, कोई ऐसा वैसा नही, कोई राष्ट्रपति से सम्मान प्राप्त हुआ है कल।"

रामियो -"विया क्या है, हुना है कि बोड्डर पे जबर लड़ाई हुई थी ?"

फलाणा व्यक्ति - "सीतारामजी, आपके छोरे ने तो गाँव का नाम ऊसा कर दिया, कई कहनी हि ? म्हाने भी बताओ स्याने री कहानी ?"

सभी जन कान लगा के बैठ गये, जैसे अब तो चक्रवात भी नहीं हिला सकेगा।

सीताराम जी -"तो वात ये है कि आज उ ६ महिना पहले, आपाणो राजू नॉशेरा (कश्मीर्) में तैनात था अपने साथियों के साथ।"

फलाणा व्यक्ति -"दण्डोत गुरुजी, उनके पास बन्दूक भी थी ?"

रामियो -"अरे गधा। लड़ाया गाजर मूली से नहीं लड़ी जावे।"

सभी हँसी के चटकारे लेते हुए, उस व्यक्ति को खतरनाक दृष्टि से देखते हुए, इस पर फलाणा व्यक्ति ने चुप होने में ही भलाई समझी।

सीतारामजी -"हाँ तो हुआ ये की रात की ३ बजे विपरीत दिशा से भयङ्कर गोलीबारी होने लगी, ढाय ढाय,और ऐसा प्रकाश था उस फायरिङ्ग में मानों बिजली कडक रही हो। राजू के साथी सङ्ख्या में कम थे, राजू ने तुरन्त वॉकिटॉकि उठाया और बोला कि रोजर देट, फायर इन द होल, सप्पोर्ट भेजिये और वो अपने साथियों के साथ इस आतङ्कवादी हमले का उत्तर देने मे जुट गया। इधर ठाय, उधर ठाय, बस गोलियाँ ही गोलियाँ। पूरे पैंतालिस मिनट चली गोलियाँ और हमारे गाँव के शेर ने ३ आतङ्कवादीयो को ढेर कर दिया और ये आक्रमण विफल कर दिया । राजू को २ गोलियाँ लगी थी।"

सीतारामजी भावुक होते हुए नम होते हुए।

"अरे राजू क्या मैं तो अपने देश के लिये सब कुछ न्यौछावर कर दूँ।" बस अब उनकी साँसें चलने लगी और आँसुओं का पैगाम साफ-साफ एक देशभक्त पिता होने का सङ्केत कर रहा था। अचानक से चिल्लाते हुए बोले-"

दो गोलियाँ लगी थी, दस भी लगती तो वो पीछे नही हटता, वो मेरा पुत्र है, वो मेरे कुल गौरव है।"

अब वे फूट-फूट के रोने लगे थे। रामियो आगे आकर ढाँढ़स बँधाते हुए बोला- "हुकूम, हमारी मूँछों का ताव है वो, हमारे गाँव का अभिमान है, वो सिर्फ़ आप ही की नहीं हमारी भी सन्तान है।"

शायद राष्ट्रभक्त निरे मूर्ख होते हैं, इतने साफ अपने आँसू भी कोई दिखाता है। बस एक वेग या कटाक्ष भर में देश के लिये मरने मारने हेतु तैयार हो जाते हैं, क्यों करते हैं ऐसा ये लोग, इतना प्यार अपनी मातृभूमि से कोई भला करता है ? दूसरों के लिए भी कोई जीता है भला ?

इतने मे सरपञ्च जी आक्षेप करते हुए (माइक पर)- "सीतारामजी, आपके पुत्र ने हमारा नाम रोशन किया है। हम सभी आपके और आपके आदर्शों का आदर करते हैं। कृपया आइये और एस पी साहब से सम्मान ग्रहण कीजिए।"

सभी जानते हैं सीतारामजी की आय बहुत अल्प है और दो ही बेटे हैं, और दोनों बोड्डर पर ? एक साधारण सा भारतीय नागरिक इतनी उच्च स्तरीय सोच कैसे ? ये कौन सामान्य लोग है जो गरीबी के बावजूद भी देशगान गाते रहते हैं। शायद इन्हीं के कारण देश जुड़ा हुआ है।

सीतारामजी मञ्च पर आकर- "बस इतना ही कहूँङ्गा, जीया था तो देश के लिये, मरूङ्गा तो देश के लिए, और अगर मर कर भी उठना पडा तो उठूँङ्गा बस मेरे देश के लिये, और मैंने अपने राजू को यही सिखाया है।

जय हिन्द, जय भारत"

इतने शक्तिशाली शब्दों को सुनकर लेखक का भी मन रोने को हो आया।

राजू भी आ पहुँचा, और बात सुनकर पिताजी को मञ्च पर लेने जाता है।

राजू- "मेरे पिताजी से मैंने राष्ट्र श्रद्धा सीखी है, पिताजी जो खुद एक सैनिक रह चुके हैं, मुझे याद है वो भी कभी छुट्टी नहीं लेते थे। देश पे मर मिटने के स्वप्न देखा करते थे। ये परम वीर चक्र इस बात का प्रतीक है कि आज भी देश जुड़ा है एक प्यार के बन्धन से अपनी भारत माता से।"

लेखक भी सोचने लगा कि ये २४ वर्ष का बालक जो कह रहा है सत्य है, आजकल मीडिया जो दिखाता है सब कुछ गलत है, क्योंकि उनके लिये तो आज देश मे गृह युद्ध चल रहा है पर वास्तविकता ये है कि आज भी दिल भारत माता के जयगाण करता है। इन्हीं छोटी-छोटी बातों से शायद देश महान बनता है।

लेखक -

"आज मैं जमाने से ऐलान करता हूँ,

वीर सैनिकों को मैं सलाम करता हूँ।

देश प्रेम की मैं हुंकार भरता हूँ,

ऐसे मित्रों को मैं प्रणाम करता हूँ।"

देश सैनिक गौरव सम्मान

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