ऐतिहासिक पैतृक हवेली मुलाकात
ऐतिहासिक पैतृक हवेली मुलाकात
एक टूटी हुई छत, टूटी हुई छत भले घर की हो, या हवेली की, हो या पुराने समय के महल, की हो।
मगर वह अपने आप में बहुत कुछ कहानियां समेटे हुए होती है.। और बहुत कुछ दर्द समेटे हुए होती है ।
मैं जब मेरी दीदी के साथ पहली बार अपनी पैतृक हवेली को देखने गई।
और दीदी के मना कर करने के बावजूद मैं वहां ऊपर गई। मैंने सब तरफ उसकी छत पर ।और सारे कमरे और टूटी हुई छतें ।टूटे हुए पट्टिया वाले कमरों में आड़ी पड़ रही थी। सब देखा। और वहां के टूटे हुए पत्थर जिन पर बहुत सारे कार्विंग करी हुई थी। वह देखी ।
मन में ऐसी इतनी अच्छी अनुभूति हुई कि हम 200 साल पुराने अपने पैतृक घर को देख रहे हैं ।जिसने कितने कितने धूप छाए देखी होगी।
कितने लोग इसमें रहे होंगे ।और यह हवेली कितनी ऐतिहासिक है। इसका भव्य इतिहास रहा है। जिसका दरवाजा इतना शानदार है ।जो आज भी अड़ी खम खड़ा है ।और अपने इतिहास की कहानी कह रहा है।
उसी तरह उसके छत और कमरों के सिवाय चारों तरफ की दीवारें वगैरा सब आज भी एकदम वैसे के वैसे ही हैं ।तो मन में एक बहुत ही जोरदार अनुभूति हुई की यह हमारी है। और हम एक अच्छे ऐतिहासिक परिवार से वास्ता रखते हैं।
बहुत अच्छा लगा। उस अनुभूति को मैं शब्दों में बयां नहीं कर सकती हूं।
