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तेरे जैसा यार कहां
तेरे जैसा यार कहां
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© Alok Phogat

Drama

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तेरे जैसा यार कहां

रोहन एक अच्छे घर का लड़का था पापा का बिज़नस सम्हालने के बजाय वह खुद अपनी पहचान बनाना चाहता था, इसलिए मां बाप को भी कोई आपत्ति नहीं थी | उनका सोचना था कि हमारे बाद सब कुछ तो हमारे बेटे का है, अत: वो जो करना चाहे करने दो | उसके हर फैसले में वे भी उसका साथ देते थे |

उधर दूसरी तरफ दिवाकर एक गरीब घर से था | उसके पिताजी साईकिल रिक्शा चलाते थे | जब वह आठ साल का था तभी उसके पिताजी का एक्सीडेंट में देहांत हो गया था | तभी से वह अखबार बेचता था | माँ ने घर में चूल्हा-चौका, झाड़ू-पोछा करके उन दोनों भाई-बहन को पाला था | घर में उसकी माँ, दिवाकर और उसकी बहन शालू थी | शालू उन्नीस साल की थी, कॉलेज में पढ़ती थी, पढने में होश्यार थी, घरेलू कामों में दक्ष व् समझदार भी बहुत | माँ और दिवाकर को उसकी शादी की चिंता सताती थी |

रोहन और दिवाकर की जोड़ी भी खूब थी | दोनों पूरे ऑफिस में सबसे हंसी-ठिठोली करते और दोनों की पटती भी खूब थी | दोनों साथ खाना खाते साथ घूमने जाते और ऑफिस का काम भी पूरा रखते थे | रोहन और दिवाकर दोनों एक दूसरे को कहते “यार यहाँ आकर तेरे जैसा दोस्त मिल गया बहुत बड़ी बात है” |ऑफिस में घुसते ही अपनी आदतानुसार रोहन ने बेग रखते ही सिटी बजाते हुए सबका हाल पूछा जब दिवाकर की टेबल पर पहुंचा तो देखा वह नहीं है, “अरे दिवाकर कहाँ है”, जूली ने कहा कि उसे केंसर है, स्वस्तिक हॉस्पिटल में एडमिट है, हमे भी अभी आते ही पता लगा है, रामू काका ने बताया |

अरे, यार वो तो सबसे खुशदिल बन्दा है, सबको हंसाता है, तो उसने हमे क्यों नहीं बताया ! तुम सब बैठे कैसे हो, सुनते ही जाना चाहिए था | वह हर सुख-दुःख में वो सबके साथ खड़ा रहता है, रोहन ने चिल्लाते हुए कहा और वापस बैग उठाकर “मै दिवाकर के पास जा रहा हूँ”, सिसकते हुए निकल गया |

सब एक-दूसरे की और देखने लगे | सब महसूस कर रहे थे कि हाँ हमे भी जाना चाहिए, किन्तु कोई पहल नहीं कर पा रहा था | रोहन के जाने के बाद रोहित भी खड़ा हो गया, फिर शीतल, फिर आनंद और इस तरह एक के बाद सब खड़े हो गये और इकठ्ठा होकर दिवाकर को देखने चल

पड़े |

बात यह थी कि दिवाकर का हाल सुन कर किसी का काम में मन नहीं लग रहा था |

जब सब होस्पिटल पहुंचे, तो उनको देख कर दिवाकर, मुस्कुराते हुए बोला, “अरे तुम सब” ! “हाँ दिवाकर हम तुम्हे देखने आये हैं”| जूली ने मुस्कुराते हुए कहा |

“अरे मुझे क्या हुआ है भला चंगा तो हूँ” |

“तुमने हम सब को क्यों नहीं बताया” ! आनन्द ने चुटकी काटते हुए कहा |

“अरे यार मै रात को हस्पताल आया था, किसे तंग करता” !

“देख गुस्सा मत दिला, रोहन ने आँखें तरेरते हुए कहा” |

“ओ के बाबा”, दिवाकर ने कानों को हाथ लगते हुए कहा |

दिवाकर के चेहरे पर उसी तरह स्माइल खेल रही थी और अपने अंदर की पीड़ा वह किसी को दिखाना नहीं चाहता था |

रोहन दिवाकर की माताजी को, जो उसके पास ही बैठी थीं, उनको एक तरफ ले जाकर उसका हाल पूछने लगा तो वह फूट-फूटकर रोने लगीं और बोलीं कि क्या बताऊं बेटा, डाक्टर ने कहा है कि आखरी स्टेज है दो या तीन महीने ..........और फिर फूट-फूट कर रो पड़ीं | रोहन ने उन्हें सांत्वना दी और डाक्टर से मिलकर सारा हाल जाना उसे ब्लड-केंसर था |

रोज ऑफिस आने से पहले और ऑफिस से घर जाने के बाद रोहन अस्पताल में ही रहता, जो भी काम पड़ता वह दौड़ कर करता था | अंतिम समय में जहाँ से भी कोई उम्मीद होती वह आकर दिवाकर की मां और बहन को बताता था | दिवाकर को ठीक होने के लिए वह रोज़ भगवान से प्रार्थना करता था | सारे खर्चे वही वहन कर रहता था माँ जब पूछती तो वह टाल जाता था एक रात दिवाकर ने रोहन को अपने पास बुलाया बोला दोस्त मुझे अपनी गोद में लिटाओ | रोहन उसके पलंग पर बैठ कर उसका सर अपने गोद में रख लिया दिवाकर की आँखों से लगातार आंसू बह रहे थे | वह रोहन से बोला कि दोस्त मै तो जा रहा हूँ, तू मुझे एक वादा कर कि तू माँ और शालू का ध्यान रखेगा, उन्हें खुश रखेगा | मां ने अपनी जिंदगी में सुख की एक झलक भी नही देखी है | अब मुझे इस काबिल बनाया तो मै भी छोड़ कर चल दिया | रोहन ने रुंसा होकर कहा कि नहीं तुझे कुछ नहीं होगा | किन्तु दिवाकर बोलता रहा कि वादा कर मेरे पास समय नहीं है, रोहन ने हाथ पकड़ कर जैसे ही बोला, “ठीक है मै वादा कर........., उसकी बात पूरी भी न हो पाई थी कि दिवाकर ने प्राण छोड दिए | उसका हाथ जो रोहन ने थाम रखा था, लटक गया और गर्दन एक और झुक गई | दिवाकर ने जैसे-तैसे खुद को सम्हालकर डाक्टर को बुलाया | डाक्टर ने कहा की अब इनमे कुछ नहीं बचा है, इनकी यात्रा यहीं तक थी |

रात का समय था, रोहन ने सोचा कि माँ और शालू सो रही होंगी | अभी बताऊंगा तो घबरा जाएंगी कल सुबह बताना ही ठीक होगा | खुद उसके सिरहाने बैठ कर रात भर रोता रहा |

अगली सुबह आफिस के लोग व् रिश्तेदार सब इकठे हो गये | माँ और शालू को उसने ढाढ़स बंधाया | उसने बड़े धेर्य से काम लेकर होस्पिटल के सभी काम से लेकर अंतिम संस्कार तक सम्हाला | और खुद ही सारे खर्चे उठाए | मां बोली, “भगवान ने एक बेटा छीन लिया और दूसरा बेटा दे दिया | माँ ने पूछा बेटा मै तुम्हारा एहसान कैसे उतारूंगी !

उसने कहा कि माँ समय आने पर बता दूंगा और अब रोहन ही माँ और शालू का ध्यान रखता था |

कुछ समय बीतने के पश्चात रोहन बोला माँ जी अब आपका एहसान उतरने का समय आ गया है, इसलिए शालू का हाथ आप मेरे हाथ में दे दीजिए | माँ को यकीन ही नही हुआ जिस बात की चिंता में वह दिन रात घुलती थी, वह इतनी आसानी से सुलझ जाएगी, उसे यकीन न हुआ | रोहन बोला हाँ माँ मैंने दिवाकर को वादा किया था कि मै आप दोनों को खुश रखूंगा | शालू जैसी सुशील, घरेलू, दक्ष लडकी पाकर तो मै भी धनी हो जाऊँगा | माँ ने शालू की तरफ देखा तो शरमा कर अंदर भाग गई मन ही मन वह भी रोहन को पसंद करने लगी थी | रोहन के मात-पिता की सहमति से दोनों की शादी हो गई |

रोहन ने नोकरी छोड कर बिज़नस सम्हाल लिया था, जिसमे रोहन के पापा, रोहन और शालू के एम् बी ए करने के बाद बराबर सहयोग से बिज़नस दिन दूना-रात चुगुना फलने लगा था |

दिवाकर का सपना पूरा हो गया | सब सुखी थे, सब खुश थे |

आलोक फोगाट

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