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विडम्बना

विडम्बना

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मेरा आना जाना अक्सर बैंक (नाम गुप्त रखना चाहता हूं।), में लगा रहता था। बैंक में एक लड़का (ऑफिस बॉय), उम्र यही होगी कोई सोलह या सत्रह के आस पास आया था। अक्सर आने की वजह से मुझे बैंक के सारे कर्मचारी मुझे पहचानते थे। वह भी बाबूजी कह कर पानी और चाय ले आता था। मैं उससे उसका ओर उसके घर के बारे में हाल चाल लेता रहता था। उसने बताया पापा नहीं हैं। वही तीन छोटे भाई बहन हैं, माँ बीमार रहती है, इलाज चल रहा है।

एक दिन मैं जब बैंक गया तो देखा कि बैंक के सब कर्मचारी उसे पीटने में लगे हैं। उसे काफी चोट लगी थी। मैने बीच बचाव करते हुए पूछा तो बैंक का कैशियर बोला कि सर ये सफाई करते समय मेरी टेबल से पांच सौ रुपये उठा कर ले आया।

मैने जब उससे पूछा तो वो बोला कि बाबूजी मेरी तनखाह कम है, गुजारा भी मुश्किल से चलता है। माँ को इलाज के लिए पैसा भेजना था। इसलिए मैंने टेबल से पाँच सौ का नोट उठाया।

"तो बेटा तूने पांच सौ करोड़ क्यों नहीं उठाए। यही विडम्बना है हमारे देश की 500 रुपये उठाने वाला सारेआम पिटता है। और 500 करोड़ या 5000 करोड़ उठाने वाले का बाल भी बांका नहीं होता, वो विदेश जाकर अय्याशी करता है।

अब तक सभी बैंक कर्मचारियों के मुँह लटक गए थे। और वह बालक डर के मारे मुझ से लिपट हुआ था।


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