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महिला कल्याण समिति(WWA)
महिला कल्याण समिति(WWA)
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© Mitali Paik Akshyara

Drama

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जब से इनकी पोस्टिंग चेन्नई में हुई है,पता नही क्यों ये महिला कल्याण समिति की सेक्रेटरी बार बार फोन करके समिति में जॉइन करने की बात कर रही है ! कैसी नौकरी है ये,कितना तनख्वाह देंगे और तो और बिना किसी इंटरव्यू के मेरा चयन भी हो गया ।

ये सब सवालों में जूझ रही थी कि मेरे पति दोपहर के खाने के लिए घर आये तो मैने उनको पुछा की ये WWA होता क्या है? कैसी नौकरी है? जोर से हँस दिये वो और बोले अरे पगली! ये एक संस्था है जहाँ विकास के काम किए जाते हैं । हम लोग सरकारी ऑफिसर है, इसीलिए हमारी धर्मपत्नियों को ये संस्था चलाने को दिया जाता है । इधर क्या काम है ये तो पता नही लेकिन तुम कुछ औरतों से पूछ के देखो ।ये तो चले गये ऑफिस, फिर में तुरंत एक जान पहचान की भाभी जी को फ़ोन लगाई जो कि इधर लगभग दस साल से हैं । उनको मैने जैसे ही ये सवाल पूछा वो तुरंत बोली बिल्कुल जॉइन मत करना,ये लोग ऐसे ही परेशान करेंगे,कल्याण के नाम पर सब पार्टी करते हैं,खाना खाते हैं,उच्चपदाधिकारी ऑफिसर की पत्नियों की चपलुसी करते हैं ,गाड़ी लेके घूमते हैं,नई नई साड़ियाँ पहन के स्टाइल मारते हैं । ये सब उन्होंने मुझे एक सांस में बता दिया । फिर एक बार सांस भरी और बोली तुम्हारी शुभ चिंतक हूँ इसीलिए बोल रही हूँ,तुम्हारा छोटा बेटा है,घर के कितने काम होंगे और ये भी सुनी हूँ कि तुम एक इंजीनियर हो और MBA कर रखी हो, तो अच्छी नौकरी ढूंढो । ये सब फालतू के काम में तनख्वाह तो मिलता नही, समय भी बर्बाद होता है ।उनको बीच में काट के बोली भाभी फ़ोन रखती हूं कोई आया है। वो फिर बोली मिताली बिल्कुल जॉइन नही करना । उनकी बात दिमाग में घूमती रही । फिर ये भी लगा शायद ये औरत सही बोल रही है,बिना तनख्वाह में कोई क्यों काम करेगा।मेरे पति से इस बारे में बात की तो ये बोले मिताली तुमको सिक्के के दोनों पहलुओं को देख के विचार करना और निर्णय लेना ।

अगले दिन फिर से फोन आया तो इस बार सोचा एक बार जॉइन करके देख ही लेती हूँ, नही ठीक लगा तो आगे से नही जाऊँगी ।

फिर सारे समिति के सदस्यों के सामने मुझे पुष्पगुच्छ दे कर स्वागत किया गया और बिना बताए जॉइंट सेक्रेटरी बना दी गई । मन में बहुत सवाल थे फिर अपनी दोस्त सेक्रेटरी से पूछी मुझे क्या करना है ? वो थोड़ा मुस्कुराई और बोली कल तुमको सारे केन्द्र दिखाउंगी फिर तुम सब समझ जाओगी, मैने भी हामी भर दी । रात भर बहुत सारे सवाल थे मन में ,कैसा होगा,कैसे काम होता होगा वगैरह वगैरह ॥

अगले दिन मेरे घर के सामने एक गाड़ी आ कर खड़ी हो गई ।मै गाड़ी में बैठ के सेक्रेटरी और बाकी कुछ सदस्यों के साथ पहुंच गई पहले केन्द्र में जो मेरे बेटे का नर्सरी स्कूल भी था ।

सभी कक्षाओं में जा कर जांच किए कि पढ़ाई कैसी चल रही है ?बच्चों के विकास के लिए क्या क्या साधन ज़रूरी हैं ? बच्चों के लिए कौन सा सांस्कृतिक कार्यक्रम करना है? कब पेरेंट्स डे मानेगा?कब चिल्ड्रेनस डे,टीचर्स डे और बच्चों को पिकनिक ले जाना,बाप रे बाप, कितना सारा काम सब था WWA में । फिर अगले केन्द्र में गई जो कि क्रेच था जिसमें दो साल की बच्चे से ले के दस साल तक के बच्चे तक थे जिनकी मम्मियां नौकरी करती हैं ।उन लोगों के लिए कितनी सुंदर वयवस्था थी मानो बच्चे घर पर ही हैं । फिर गैस आफिस और बाकी के सब केंद्र गई ,जहाँ कम दाम में औरतों और बच्चों को स्वाधीन रहना सिखाते हैं ।गरीब बच्चों के लिए टयूशन भी चलती थी ताकि वो लोग बस दस रुपये दे के महीने भर पढ़ सकें और कुछ अच्छा कर सकें जीवन में । बहुत अच्छा लगा देख कर ये सब ।

अब जिस केंद्र में पाँव रखी थी वो विकलांग बच्चों का विद्यालय था ।जैसे ही अंदर गई तो देखा कितने बड़े बड़े बच्चे थे, और ऐसे व्यवहार कर थे जैसे कि कोई छोटे बच्चे से आप मिल रहे हो । हमें देख के मुस्कुराये और उन्हें देख मैं अपने आसुओं को रोक नही पाई और पूछी इनको क्या सिखाते है,तब वो बोली इनको हम सजावट सामग्री,छोटी मोटी बुनाई, कढाई सिखाते हैं ताकि ये लोग स्वावलंबी बन सके और इनके माँ बाप को इनके भविष्य को ले कर कोई चिंता ना हो । बाहर से एक नामी प्रोफेसर को भी बुलाते हैं जो इनके मानसिक विकास के लिए हमें कैसे करना है वो बताते हैं । हमको इन सभी केंद्रों में जा कर देखते रहना पडता है कि सब काम सही से चल रहे हैं कि नही और कही कुछ ज़रूरत तो नहीं ।उन विकलांग बच्चों से मानो विदा लेने की इच्छा ही नही हो रही थी । उनके चेहरे की मुस्कान मुझे आकर्षित कर रही थी । दुनिया दारी से अनजान थे,मन मे कोइ दोष नही था ,कोइ बैर नहीं ।उनके पास बेपनाह एक चीज की कोइ कमी नही थी और वो थी सच्ची खुशी और प्रेम ।

उधर से लौटते समय लगा कि मै किसी धार्मिक स्थल से लौट रही हूँ । करीबन दो बजे घर लौटी,तब मेरे पति खाने के लिए मेरी प्रतीक्षा कर रहे थे और मुझे देखते ही पूछे,मिताली कैसा रहा आज का दिन ? दौड़ के उनके सीने मैं सिर छुपा के रोने लगी और बोली कि आज तो सारे केंद्र देख कर मुझे लगा कि मेरे चारों धाम की यात्रा हो गई । आप सब तो सरकारी काम करके तनख्वाह लेते हो लेकिन ऑफिसरों की धर्म पत्नियों को देखो कितना अच्छा काम करती हैं , घर संभालने के साथ, समय निकाल के वो लोग समाज के हित और विकास मे काम कर रहे हैं।

आज के समय में सबसे कीमती कोई चीज़ है तो वो है वक़्त ,जो ये औरतें समाज को देती हैं ,काम करते करते में भी अच्छा भाषण देना सीख गई । बहुत सारी चीजों की जानकारी मिली जो शायद मै नौकरी करने से भी नही सीख सकती थी । बड़े बड़े कार्यक्रम की मंच संचालिका भी बन गई ।काम और समय को कैसे बैलेंस करते हैं वो सीख गई,WWA ने मुझे और सहनशील व समझदार बनाया । विपरीत परिस्थिति को कैसै संभालना है वो और भी अच्छे से जान गई। लोगों को और अच्छे से समझना सीख गई। एक अच्छे समाज की शुरुआत खुद से ही होती है,पहले हमे खुद को संवारना है ।

कुछ दिन बाद मुझे वो महिला मिली जिन्होंने WWA के बारे में मुझे जानकारी दी थी बडे ही व्यंगात्मक ढंग में पूछने लगी क्या बात है मिताली आज कल बहुत छाई हुई हो !

उनको मैने एक ही जवाब दिया कि जो मुझे नौकरी करने से नही मिलता वो मुझे WWA में काम करके मिला और वो है आत्मिक संतुष्टि, मन की सच्ची खुशी और ये भावना कि मैने भी अपने समाज के लिए कुछ अच्छा किया, पर जाने दिजीए ये बात आप जैसा सोच रखने वाले लोग कभी नहीं समझेंगे ,जो कुछ अच्छा नही करना चाहते बस कमियां ही ढूढने मे लगे रहते हैं। रहने के लिए अच्छा समाज तो चाहते हैं पर उसको अच्छा करने के लिए कुछ करना नही चाहते ।

वो महिला मेरा मुंह देखती रहीं और मै शान से आगे बढ गई ।

ये WWA कब मुझे साधारण मिताली से स्मार्ट मिताली बना गया पता ही नही चला ।

Women Issues Society

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