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जिजीविषा
जिजीविषा
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© Kavita jayant Srivastava

Drama Inspirational

10 Minutes   605    49


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सुबह से एक मिनट का भी टाइम नही मिला सपना को, 5 बजे सुबह से उठकर एक के बाद एक काम निपटाती गयी ..दो बार चाय रखी रखी ठंडी हो चुकी थी और वो किसी काम मे उलझ जाती जब ध्यान आता तब तक चाय के प्राण निकल चुके होते ..साफ सफाई, बर्तन, चाय नाश्ता, लंच की तैयारी और बच्चो के टिफिन से लेकर बाबू जी की चाय और माता जी के पूजा पाठ तक की सारी जिम्मेदारियाँ उसी पर थी ..इतने में पड़ोस की सखी सुषमा आ गयी ..घर पर सत्यनारायण की कथा हेतु आमंत्रण देने ..!

'अरी सपना ये क्या अब तक चाय नहीं पी तुमने ? '

''नही यार चाय पीने का समय ही नहीं मिला, कल चावल के सेव बनाये थे, रुको तुम्हें खिलाती हूँ ..तुम्हारे साथ मैं भी खा लूँगी ...ऐसे तो फुर्सत मिल नहीं पाती ..!

"हाँ ठीक है बना लो चाय..! कहकर सुषमा बैठ गयी।

सपना ने चावल के सेव तले और सुषमा को दे दिए ..

चाय का पानी रखने गयी, अदरक व चायपत्ती डाल कर उठी, ..तब तक अजीत नहा कर आ गए ...

"सपना जरा मेरे कपड़े निकाल दो !"

पूरे घर मे अदरक व चायपत्ती की तीखी सुगन्ध फैली हुई थी..भूख ने फिर से अंगड़ाई ली पर अजीत की आवाज पर-

''आ रही हूँ।'' कहकर सपना ने सुषमा से कहा दो मिनट में आती हूँ ..! सुषमा ने कहा .."सपना मुझे ऑफिस के लिए देर हो रही है मैं निकल रही हूँ, तू कल समय पर आ जाना !"

"अच्छा ठीक है.." कहकर सपना ने , माता जी और बाबू जी को सेव और चाय दिए और अपने हिस्से के सेव रखे और अजीत की तैयारियों में जुट गई ..लगभग एक घंटे बाद उसने सोचा जाऊँ, दूध ले आऊँ तब सुकून से खाऊँ ..!

दूध लेकर सपना घर पहुँची, भूख के कारण उसे चक्कर आ रहे थे उसने सोचा कि बस घर पहुँच के सबसे पहले अपनी पसंद के चावल के सेव खाऊँगी और उसने अब अपनी ठंडी चाय और सेव लेने को जब किचेन में झांका तो देखा, प्लेट तो खाली है ..! सामने बरामदे में सासू माँ ने उसके हिस्से की प्लेट के सेव भी खत्म कर दिए थे ..!

उसका मन भर आया ..बारह बज रहे थे, शरीर थक चुका था, भूख के कारण आँखें मुंदने लगी थी उसकी ताकत जवाब दे चुकी थी ..वह आँखें मूंदे वहीं सोफे पर निढाल हो गयी ..!

उसकी जिंदगी सालों से यूँ ही चल रही थी ..दिन भर चकरघिन्नी की तरह वो घूमती रहती और जब खुद के खाने की बारी आती तब तक या तो सब कुछ खत्म हो जाता या फिर कुछ और कारण से उसके हिस्से पर संकट आ जाता और तब तक दोबारा बनाने के लिए उस की हिम्मत खत्म हो चुकी होती..! सच तो ये था कि वो काम करने की मशीन बन गयी थी उस मशीन में ईंधन है या नहीं इसकी फिक्र किसी को नहीं थी ..पर हाड़-माँस की इस मशीन की कुछ शारीरिक जरूरतें थी जो उपेक्षा के कुचक्र में फँस कर रह गयी थी।

पर उस दिन जब थकान के कारण वो सो गयी तो उठ ही न पायी . .12 बजे दोपहर की पड़ी हुई, सुबह से कुछ खाये बगैर .. और जब उठी तो देखा कि 4:30 हो चुके हैं .. सिर में भयानक दर्द था, बुखार से शरीर तप रहा था..उठने की कोशिश की तो पाँव लड़खड़ा से गए ..गला सूख कर काँटे सा हो गया था..उल्टियाँ आ रही थी, और वो बेहोश सी हो गयी ..!

शाम होने को आयी, बच्चे आ गए अब भी..जब वो न उठी तो सास से न रहा गया ..! सास ने पूछा - आज सोती ही रहोगी क्या ?

कोई काम नहीं किया रसोई का ! पूरी रसोई फैला रखी है, एक मैं थी सब समेट कर लेटती थी, वरना मुझे तो बिस्तर काटने लगता था कि काम पड़ा है और मैं सो रही हूँ ..पर आज कल की बहुएँ तो बस ..'

'बस भी करो , देखो उसको कोई तकलीफ तो नहीं ? ऐसे तो नहीं लेटती कभी !" बाबू जी दबे स्वर में बोले

'जाओ आज तुम्ही चाय बना लो, बच्चो को देख लो ,शायद कोई दिक्कत है उसे ..' वो दोबारा हिम्मत करके बोले

सपना का मन रो उठा ..आत्मा द्रवित कि कैसे उठूँ ?

उसके शरीर में ताकत ही नहीं थी ..तभी बेटी आयी और माँ को छू कर बोली ..'' मम्मी आपको तो बुखार है ..!"

बिटिया दौड़ कर दादी को बता आयी..दादी झुंझला कर उठी ..पूरे समय बड़बड़ाती रही ..बच्चो को ब्रेड थमा दी ..और पति को चाय ब्रेड ..! अजीत आये तो भी वही हाल ..! सबने ब्रेड चाय से काम चलाया ..पर सपना को पूछना ही भूल गए..!

अजीत कमरे में आये ..' क्या हुआ तुम्हें ?

"कुछ नहीं फीवर है ..!"

"दवा खाई ?''

"नहीं, वो सुबह से कुछ खाया नहीं था तो खाली पेट कैसे ..'

क्यों सुबह से कुछ खाया नहीं ? करती क्या हो तुम दिन भर ?

''अरे काम के चक्कर में भूल गयी ..चक्कर आने लगा..तो ..'

उसकी बात बीच मे ही काटकर

''काम ? फिर काम का ताना ? ..'' हर वक़्त तो तुम बीमार रहती हो ? जाने कितना काम है तुम्हें ? अरे सारी औरतें घर पर काम ही करती हैं, तुम कोई अलग नहीं हो ..महीने के बीस दिन तुम बीमार रहती हो, और दोष देती हो कि काम के कारण तुम बीमार हो .. अब एक काम मत करना तुम, सब तुम्हारे बिना भी जी सकते हैं, पहले कैसे रहते थे सब ? सबकी कर्ता धर्ता तुम ही हो क्या !

सपना चुप ..सोचने लगी ..आज मैं काम नहीं कर पा रही इसलिये ही तो इतना सुन रही हूँ ..! क्यों बीमार पड़ गयी मैं, क्यों शक्ति नहीं उठने की , क्रोध में उठने की कोशिश की तो फिर दर्द की एक लहर ने उसके शरीर को कँपा दिया, उसने हार कर सब निश्चय त्याग दिए और निढाल सी पड़ी रही..मानो अजीत के शब्दों ने उसे और घायल कर दिया ..उसे याद आने लगा वो पल जब वो मायके में बीमार होती थी तो पूरा घर, माँ-बाबूजी, भाई-बहन सब उसकी चिंता करने लगते थे, जो उसकी इच्छा हो वो बनाती थी माँ और बीसों विकल्प देती थी कि, लाडो ये खा ले, ये मत कर वो मत कर, लेटी रहना, उठना नहीं ..बाबू जी दफ्तर से आते ही कमरे में आकर पूछते दवाई खाई ? माथा छूकर देखते ..सब याद आता रहा और आँखों के कोर गीले हो उठे.. "

किसी तरह शाम का इंतजाम हुआ, होटल से रोटियाँ खरीदी गई और सबने दूध, घी और गुड़ जिसको जिससे मन था, उससे खाया ..! सासू ने देखा तो एक रोटी मात्र बची थी, किसी को ध्यान ही नहीं आया कि अभी तक सपना ने कुछ नहीं खाया है.." अजीत ने झुंझला कर कहा अब नहीं जाऊँगा मैं ढाबे पर दोबारा ..! '' सपना सब कुछ सुन रही थी ..और सोच रही थी कि मेरा हिस्सा ? क्या इस स्थिति में भी, मुझे बिना काम किये अपने हिस्से का निवाला खाने का भी अधिकार नहीं ?

तभी बेटी कमरे में एक रोटी और गुड़ लेकर आई ..और सपना को देकर कहा ..'' मम्मी ये रोटी बची है खा लो ..!'' बेटी के ये शब्द उसे लग से गये ..की चलो शुक्र है किसी ने ये तो सोचा कि मम्मी ने कुछ नहीं खाया है..!

अपने हिस्से की उस कीमती आखिरी रोटी को सपना जल्दी जल्दी मुँह मे भरने लगी ..उस रात बहुत दिनों बाद उसने अपनी डायरी खोली ,क्योंकि मन की बातों को किसी से बाँटना था ..!

दूसरे दिन सुबह उठ गई और अजीत उसे डॉक्टर के पास ले गए ..

डॉक्टर ने टेस्ट वगैरह किये , कहा बहुत कमजोर हैं ये, प्रोटीन, विटामिन, आयरन सबकी कमी के कारण, लो ब्लड प्रेशर है ..हीमोग्लोबिन भी बहुत कम है ..!

और इन सबको एक पूरी तरह से स्वस्थ आहार ही दूर कर सकता है..फिलहाल इन्हें एडमिट करिये, ड्रिप चढ़वाइये और तब ही घर ले जाइए।

जब वो अस्पताल में भर्ती हुई तब उसी दिन कपड़ों की अलमारी में, खुद के लिए टाई ढूंढ रहे अजीत को उसकी डायरी मिल गयी जिसमे उसके पिछले बारह वर्षों के तिरस्कार और घुटन का जिक्र था ..एक दुलारी बेटी के ससुराल आते ही उपेक्षित बहू बन जाने का दुख लिखा गया था ..कभी मनपसन्द डिश खत्म हो जाने का वृत्तांत तो कभी सब अच्छा बनाया था पर अंत मे खुद के न खा पाने का जिक्र .. कहने को तो वो उसकी जीभ की लालसा थी किन्तु इस बचपने में उसके भीतर की उस बच्ची का दमन था जो यदि आज जीवित होती तो शायद स्वस्थ होती ..इस डायरी में उसने अपनी उन इच्छाओं का दमन उकेरा था जिसे जिजीविषा कहते हैं ..कुछ नया पहनने से लेकर, मनपसन्द चीज न खरीद पाने तक का दुख ..जो अंत मे खुद को महत्व न देने पर खत्म हुआ और कुछ इस तरह से खत्म हुआ कि आज वो अस्पताल में भर्ती हो गयी !"

ये सब पढ़कर अजीत को लगा कि, सपना का दोषी तो वास्तव में वो ही है, उसने कैसे अपनी अन्नपूर्णा के निवाले और उसके हिस्से पर ध्यान नहीं दिया ? क्या वो इतना स्वार्थी है कि थाली में व्यंजन परोसने वाली अपनी अर्धांगिनी को उपेक्षित कर दिया, उसकी भूख प्यास, जरूरतें और ख्वाहिशों सबको भूल गया ..' बात सिर्फ निवालों की नहीं, खुशियों की थी ..काश उसने अपनी जीवनसंगिनी की थाली में सम्पूर्ण आहार का ध्यान रखा होता ..तानो-उलाहनों, जिम्मेदारियों और कर्तव्यों के भार के साथ उसके हिस्से में उसकी खुशी इच्छाओं और पसन्द नापसन्द का भी ध्यान रखा होता तभी तो वो ''सम्पूर्ण '' हो पाता।

अजीत समझ गया कि ये रोग 'तन' के नहीं बल्कि 'मन' के हैं ..सपना दूसरों की उपेक्षा देख देख के स्वयं खुद को उपेक्षित करने लगी ..क्योंकि हर स्त्री तभी खुद को महत्व देती है जब देखती है कि कोई उसकी परवाह कर रहा है..उसे यही लगा कि उसको ये कर्तव्य निभाने हैं ..इसके पीछे कब उसका आत्म खत्म हो गया इसका भान ही नहीं हो पाया .."

अजीत की आँखों में पछतावे के आँसू थे ..मगर दिल मे अपनी बाल-मना सहचरी के लिए अगाध प्रेम..।

दो तीन दिन अस्पताल में जरूरी उपचार, इंजेक्शन व ग्लूकोस चढ़वाने के बाद सपना की हालत कुछ सुधरी।

घर आते वक़्त सपना के मन में यही भय था कि इन तीन दिनों में किसी को न तो ढंग से खाना मिल पाया होगा न ही घर की देख रेख ..उफ्फ कैसा हो गया है घर ..! जैसे सालों से झाड़ू का मुँह नहीं देखा फर्श ने ..गन्दे कपड़ों के अम्बार और बेतरतीब फैला हुआ घर ..कहीं रसोई में खुले डिब्बे और फ़टे पैकेट के ढेर ..! सोच सोच कर सपना का मन व्यथित था कि अब कैसे क्या करेगी वो ..?

घर मे घुसते ही चकाचक चमकती फर्श ने उसका स्वागत किया, रसोई घर मे करीने से सजा कर रखे डिब्बे व चमकते साफ बर्तन, सलीके से सजे हुए बैठक वाले कमरे के सोफे व कुशन उसका स्वागत करने को जैसे हाथ जोड़े हुए थे ..!

उसने अविश्वास से अजीत को देखा ,मानो पूछ रही हो 'अरे ये किसने किया ?' ..अजीत ने मुस्कुरा कर इशारो में ही उसे आश्वस्त किया '' हाँ मैंने ही किया ..!"

सपना भौचक्की सी घर देखती रही ..तभी अजीत ने फ्रिज खोल कर कहा "चलो सपना, सबसे पहले तुम जूस पियो ..उसके बाद हम शाम को खाना खुद बनाएंगे तुम्हारे लिए .. वो भी तुम्हारे पसन्द का .."

सपना को विश्वास नहीं हुआ कि ये उसकी आँखों का धोखा है या सच ?

"ये क्या कह रहे हैं आप ? होश में तो हैं ..? मेरे होते आप क्यों काम करेंगे ?' वो कहने को सोच ही रही थी पर होंठ खुले ही नहीं उसके..तब तक अजीत ने जैसे उसके मनोभाव पढ़ लिए।

अरे सोच क्या रही हो ? जूस पियो ! पूरे बारह साल बाद होश में आया हूँ ..अब ये गलती दोबारा नहीं करूँगा..!

"अरे नहीं, आप पी लो ये जूस, तीन दिन से कुछ खाया पिया नही होगा ढंग से ..! मैं तो अब ठीक ही हूँ ..अपना गिलास आगे बढ़ाते हुए सपना ने कहा-

"नही सपना , ये तुम्हारे लिए है ..अपने हिस्से का निवाला हो या हक ..उसे खुद के लिए ही रखो, अपनी ये आदत बदलो, जान है तो ही जहान है सपना ..मैं शर्मिदा हूँ कि तुम्हारा ख्याल नहीं रख पाया ..पर अपना ख्याल खुद से रखो, खुद को महत्व दो ..अपनी खुशी का ख्याल रखो ..! जिस इंसान के जीवन में खुद के प्रति चाव नहीं , वहाँ जिजीविषा नहीं हो सकती ..और इसी ने तुम्हें आज इस स्थिति में पहुँचा दिया है ..मुझे माफ़ कर दो सपना ..! गलती मेरी है कि मैंने अपने आधे अंग पर ध्यान क्यों नहीं दिया यदि दिया होता तो तुम यूँ मुरझा तो न जाती ..! "

कहकर अजीत ने सपना को अपने अंक में भर लिया ..दूर कहीं क्षितिज में मानो, अंधकार छंट गया था और एक उषा की किरण के रूप में एक नवीन जीवेषणा का संचार हो चुका था।

इंसान बेटी बहू

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