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शहीद की बेटी
शहीद की बेटी
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© Meena Bhandari

Action Drama Inspirational

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“दाSSSSदी ! देखो, हमारी गुड़िया ! अब हम जल्दी इसकी शादी करेंगे।” – कहकर चहकती हुई आन्या दादी के पास आई।

दोपहर का एक बजने वाला है। आज रविवार है और आन्या अपनी सहेली मीशा के साथ खेल में व्यस्त थी। माँ लता भीतर रसोई में थी और दादी यहीं आँगन में बैठी स्वेटर बुन रही थी। पास ही में लेटा हुआ अमन हाथ-पैर मारकर अपनी मौज़ूदगी दर्शा रहा था। आन्या बीच-बीच में आकर अपने भाई से भी बातें कर लेती थी। वह कुछ समझ तो नहीं पाता, लेकिन किलकारी ज़रूर मारने लगता।

आन्या के पापा लांस नायक अमरजीत परमार काश्मीर की सीमा पर तैनात है। वे उसके हीरो हैं। वर्ष में दो बार छुट्टियाँ लेकर लगभग 15 दिनों के लिए अपने परिवार के पास आते हैं। यह परिवार नवी मुंबई के पनवेल में रहता है। जब भी पापा घर आते, परिवार एक नई ऊर्जा से भर जाता।

आन्या है तो मात्र छः वर्ष की, लेकिन उसकी बातों से ऐसा लगता है जैसे वह सोलह वर्ष की समझदार बालिका हो। अभी पिछले सप्ताह की ही बात है, वह अपनी सहेली रीनू की जन्मदिन की पार्टी में गई थी। व्यंजनों की भरमार के साथ-साथ सजावट पर भी दिल खोलकर खर्च किया गया था। आने वाले मेहमान रीनू को बधाई के साथ उपहार भी देने लगे। इसके पश्चात वे सभी भोजन की टेबल की तरफ़ बढ़े। जितना खाया जा रहा था, उतना ही बर्बाद भी हो रहा था। यह देख नन्हीं आन्या स्वयं को रोक न सकी रीनू के पापा के पास जाकर बोली- “अंकल क्या आप इन सबसे आवश्यकतानुसार ही भोजन प्लेट में लेने के लिए कह सकते हैं ? बचा हुआ अच्छा खाना पड़ोस की बस्ती में जाकर गरीब बच्चों को खिलाया जा सकता है।” छोटी सी बच्ची के मुख से ऐसी बात सुनकर उन्हें आश्चर्य तो हुआ, लेकिन बात उन्हें जँच गई। आन्या की पीठ थपथपाते हुए उन्होंने मेहमानों के बीच जाकर सभी को उसके विचारों से अवगत करवाया। मेहमानों ने भी इस बात का समर्थन करते हुए ज़ोरदार तालियाँ बजाईं।

इस समय आन्या अपनी सहेली मीशा के साथ बहुत प्रसन्न थी क्योंकि अगले ही माह 6 दिसंबर को उसके पापा का जन्मदिवस है और वे 4 दिसंबर को यहाँ आ रहे हैं। उसने तो परिवार वालों के साथ यह चर्चा भी कर ली थी कि वह वृद्धाश्रम जाकर पापा का जन्मदिवस मनाएगी। पापा सबको उपहार देंगे और वे लोग उन्हें ढेर सारा आशीर्वाद देंगे। पापा के साथ-साथ देश के किए भी तो शुभकामनाएँ होंगी।

“आन्या बेटा ! खाना टेबल पर लग गया है। दादी के साथ अंदर आ जाओ।” माँ की आवाज़ आई ।

“आई माँ !” – कहकर आन्या ने खेल बंद कर दिया और वे लोग अंदर चले गए। खाने की टेबल पर पापा और उनके जन्मदिवस की ढेर सारी बातें होती रहीं।

स्कूल में उसने अपनी सहेलियों और शिक्षिका को भी बता दिया था कि उसके पापा आ रहे हैं और 6 दिसंबर को वह स्कूल नहीं आएगी। उस दिन वह क्या करने वाली है, यह भी उसने बताया। सभी आन्या की खुशी में खुश थे। आखिर वह एक हीरो, एक जांबाज़ की बेटी जो है।

लंबे इंतज़ार के बाद आखिर रविवार 4 दिसंबर आ ही गया। शाम को पापा आ जाएँगे इसलिए सुबह जल्दी उठकर उसने माँ के साथ घर की विशेष सफ़ाई की और उसे सजाया। अब कुछ ही देर में वह अपना स्कूल का काम करेगी। अमन तो सो रहा है और दादी आँगन में बैठी हैं। लता भीतर के कमरे में किसी काम में व्यस्त है। आन्या स्टूल पर चढ़कर अलमारी में से अपनी किताबें निकालने लगी। इतने में फोन की घंटी घनघना उठी। “ट्रिन - ट्रिन ...” एक बार पूरी बजकर पुनः बजने लगी। बाहर से दादी की आवाज़ आई– “अरे भई ! कोई तो फोन उठाओ।”

लता हाथ पोंछते हुए आई और फोन को कान से लगाया – “हैलो ! ........ जी हाँ, मैं लता अमरजीत बोल रही हूँ।”

“...........”

आगे की बात सुनते ही रिसीवर उसके हाथ से छूटकर गिर गया। वह सिर पकड़कर नीचे बैठ गई।

“क्या हुआ माँ ?” कहते हुए आन्या तेज़ी से माँ की तरफ़ लपकी। लता बेहोश हो चुकी थी। आन्या चिल्लाई – “ दाSSSSSदी देखो, माँ को क्या हो गया ?”

दादी अंदर आईं। उन्होंने भी बहू को पुकारा – “ बहूSSSS ! क्या हुआ ? किसका फोन था ? वे तेज़ी से रसोई से एक गिलास में पानी ले आईं। उसके मुँह पर छीटें मारे। लता के शरीर में हरकत हुई।

“ माँSSSS !” – कहकर आन्या उनसे लिपट गई और ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी। दादी को अपना दिल बैठता हुआ सा महसूस होने लगा।

“बेटी अब कुछ बोलोगी ! कहीं अमर को ....” उनकी बात अधूरी ही रह गई। लता के आँसू थम ही नहीं रहे थे।

“माँ इनके रेजीमेंट से फोन था। कल रात आठ आतंकवादियों ने इनके कैंप पर हमला बोल दिया। ये अपने दो साथियों के साथ गश्त पर थे। सभी ने डटकर मुकाबला किया। मुठभेड़ में सभी आतंकवादी मारे गए, परन्तु ये और इनका एक साथी शहीद हो गए।”

यह सुनते ही दादी की आँखों के आगे अँधेरा सा छा गया। आन्या को भी समझ नहीं आया कि वह क्या करे। उसने किसी तरह दादी को सँभाला और माँ को चुप कराने लगी। उनकी आवाज़ सुनते ही पड़ोस की दुबे आंटी भी वहाँ आ गई। वे सब समझ गईं। उन्होंने सहारा देकर दादी को पलंग पर बिठाया और माँ को ढाढ़स बँधाने लगी। कुछ ही देर में आस-पास के लोग भी वहाँ एकत्रित हो गए। अमन जाग गया और भीड़ को देखकर वह रोने लगा। आन्या ने उसे उठाकर माँ की गोद में दे दिया। दादी भी वहीं सबके बीच में आकर बैठ गई।

शाम को मुम्बई सेना के उच्च अधिकारी वहाँ आ गए। उन्होंने बताया कि अंतिम समय तक लांस नायक अमरजीत आतंकवादियों से भिड़े रहे। शरीर छलनी होता रहा, परन्तु अपने साथियों के साथ उन्होंने एक-एक आतंकवादी को ढेर कर दिया। इस मुठभेड़ में उन्होंने अपने दो जांबाज़ खो दिए। कल शाम तक अमरजीत का पार्थिव शरीर यहाँ पहुँच जाएगा एवं 6 दिसंबर को पूरे सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा। यह सुनते ही आन्या तेज़ी से भीतर चली गई।

6 दिसंबर ......! पापा का जन्मदिन ........! उनका अंतिम संस्कार ........! माँ, दादी, अमन ........ इन सबका अब क्या होगा ? उसके नेत्रों से अश्रुधारा बह निकली। आज उसे लगा कि वह छः वर्ष की नहीं अपितु सचमुच ही सोलह वर्ष की है। अब उसे ही अपने परिवार को सँभालना है। वह न तो स्वयं टूटेगी और न किसी को टूटने देगी। बहादुर पापा की बहादुर बेटी है। उसने अपने आँसू पोंछे और बाहर सबके बीच में आकर बैठ गई।

वहाँ अमरजीत की ही बातें हो रही थी। जब भी आता था, पूरे सेक्टर में रौनक-सी छा जाती थी। सभी के चेहरे खुशी से खिल उठते थे। नवी मुंबई का यह पनवेल क्षेत्र लांस नायक के कारण पूरे देश की पहचान बन चुका था।

रिश्तेदार आने शुरू हो गए। रात गहराने लगी परन्तु सबकी आँखों से नींद गायब थी। कल आन्या के पापा आ जाएँगे। अब वह पहले की तरह दौड़कर उनकी गोद में नहीं चढ़ पाएगी। पापा के आने पर कितना मज़ा आता था। वे उसे कंधे पर बिठाकर पूरे घर का चक्कर लगाते और पूरा घर हँसी-ठहाकों से गूँज उठता था।

आखिर सोमवार 5 दिसंबर आ ही गया। सबके लिए एक-एक पल भारी हो रहा था। आन्या के दादाजी भी फ़ौज में ही थे। उसका तो अभी जन्म भी नहीं हुआ था, जब वे कारगिल युद्ध में शहीद हो गए थे। दादी ने कैसे स्वयं को एवं पूरे परिवार को सँभाला होगा ? और ......... आज उनका बेटा ! घर में आने वालों का ताँता लगा था। शाम हो गई। पापा के आने की सूचना भी मिल गई।

दरवाज़े पर सेना की विशेष गाड़ी आकर रुकी। तिरंगे में लिपटे पापा के पार्थिव शरीर को सम्मान के साथ घर के भीतर लाया गया। बहादुर बेटी ने स्वयं को मज़बूत किया। अमन दादी की गोद में था। उसे तो कुछ समझ ही नहीं आ रहा था। पापा को देखते ही माँ बिलख पड़ी। दादी ने उन्हें अपने सीने से लगा लिया।

6 दिसंबर ...आज पापा ऐसी यात्रा के लिए निकलने वाले हैं, जहाँ से कोई लौटकर नहीं आता। अंतिम दर्शनों के लिए भीड़ थी। सभी पापा के चरण स्पर्श कर रहे थे। अमन ने भी किए। दादी ने अपने आँसुओं को नियंत्रित करके अपने बेटे का मस्तक चूमा। आज बेटे का जन्मदिन भी तो था और अंतिम विदाई भी। उनके बलिदान एवं साहसिक कारनामे से पूरे राज्य ही नहीं, अपितु पूरे राष्ट्र का मस्तक गर्व से ऊँचा हो गया।

आन्या अपने पापा को जन्मदिवस का अंतिम उपहार देना चाहती थी। मन ही मन कुछ प्रण करके वह उनके पास आई। चरण स्पर्श करते हुए बोली – “पापा, मैं एक सच्चे शहीद की बेटी हूँ। आप ही की तरह बहादुर सिपाही बनूँगी। मैं आज आपको देश से आतंक समाप्त करने का वचन देती हूँ। आपका सपना मैं पूरा करूँगी। आप हमेशा मेरे हीरो रहेंगे। मैं आपसे बहुत प्यार करती हूँ।” – कहते हुए उसने पापा के गालों को चूम लिया।

शहीद आतंकवादी जन्मदिन

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