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रूह से रूह तक (flash fiction )
रूह से रूह तक (flash fiction )
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© Anima Das

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बाहर छमछम करती बूंदों को अंधेरे की नीरवता मेंं सुनकर ऐसा लगता है कि ये बारिश यूँ ही लगातार होती रहे और ये रात का सफ़र कभी ख़त्म न हो । 


जब पूरी प्रकृति सो जाती थी तब रात की गोद मेंं निढाल हो कर मैं देखती रहती थी मौनता के सौंन्दर्य को और पूरी तरह से डूब जाती थी अपने ही हृदय की गहराई मेंं बसी एक तिलस्मी दुनिया मेंं । उनींदी आँखों मेंं आलसी सपने यूँ ही पलते रहते थें और उनकी खुशबू से महक जाता था मेरा तकिया, बिस्तर, दीवारें और पूरा तन - बदन । खिड़की से झांकते हुए जब बारिश की बूंदों को छूती थी तो एक नमी सी दौड़ जाती थी मेरे लहू में और स्नायुओं को छू कर पंहुच जाती थी पलकों को भिगोने । 

अपने अकेलेपन पर थोड़ा गुस्सा भी आता था और थोड़ा सा विरक्त भी हो जाती थी पर आज इस अकेलेपन का नर्म एहसास भर जाता हैं आगोश मेंं कई स्मृतियाँ जो अतीत की सेज पर थपकियाँ दे कर सुला देती हैं मेरी रूह को । 


जीवन जब प्रेम के कोमल पत्तों पर पलता है तो कितना निखर जाता है उसके हरेपन से? जीवन जब कुआंरी किरणों को छूता है कितना चमकने लगता है ? जब सूखी मिट्टी पर बारिश की पहली बूंद गिरती है तो उस महक से महक उठता है क्षण भर के लिये जीवन । हाँ ..ऐसा ही निखार मिला था मुझे मृणाल से ...हाँ वो कुआंरी किरण सी आस थे मृणाल । पहली बारिश से गीली मिट्टी की सौंधी महक थे मृणाल । यहीं इसी धरा के एक हिस्से मेंं वह थे और दूसरे हिस्से मेंं मैं । बड़ा ही विचित्र था उम्र की अर्धनिशा मेंं हम दोनों का मिलन । पता ही नहीं था कि चरम पड़ाव की ओर बढ़ रहा है दोनों का जीवन । सामजिक प्रतिष्ठा थी सो अलग । कुछ नियमों और श्रृंखलाओं मेंं बंधे रहने के बावजूद कैसे संभव हुआ ये सब ? अनजाने में ही एक नया सा रिश्ता जन्म ले चुका था दो अजनबियों के हृदय गर्भ मेंं। 


पहले तो मैं खुद पर विश्वास नहीं कर पाई क्यों कि मैं खुद के और समाज के बनाये कई नियमों और संस्कारों की श्रृंखलाओं में जकड़ी हुई थी । मेरी छत पर एक कौआ भी बैठने से पहले इजाज़त लेता था कभी । नई सुबह की नई धूप आने से पहले मेरे आंगन मेंं पूँछती थी मेरे घर की दहलीज से । चाँद की परछाई तक मुझे छू नहीं सकती थी बिना इजाज़त के । हाँ इजाज़त देने वाला अगर कोई व्यक्ति था तो वह थे मेरे पति शरद । शरद को पसंद नहीं था प्रकृति की दी हुईं किसी भी वस्तु से मैं कोई भी संबंध रखूँ । यहाँ तक कि हँसना - रोना सब कुछ उनके हिसाब से होता था । पर मेरी सोच पर उनका कोई अधिकार नहीं था । मैं उनसे छुपा कर अपनी सोच को कविताओं में आकार दे देती थी और कैद कर लेती थी एक डायरी मेंं जो मेरे कपड़ों की तह के नीचे एक कोने मेंं छुपी रहती थी । उनके ऑफिस के लिये घर से बाहर निकलते ही हम दोनों साथ हो जाते थे । 


मुझे याद है वो दिन जब अलमारी साफ करते करते मेरी डायरी उनके हाथ लग गई। फिर वो पढ़ने बैठ गये । पढ़ते चले गये फिर अचानक मुझे आवाज दी " अन्नू , ये सब क्या है ?ये सिलसिला कब से चल रहा है ? " मैं जैसे ज़मीन मेंं आधी गड़ सी गई थी । मेरा मन कह रहा था कि यह धरती फट जाये और मैं सीता मैया की तरह उसमे सदा के लिए समा जाऊँ । ऐसा लग रहा था कि मैं अंतर्ध्यान हो जाऊँ या मुझे डोरेमन की कोई जादुई गजेट मिल जाये । पर ऐसा तो कुछ होने वाला था नहीं । डायरी से मुँह उठा कर शरद ने जो कहा उसे सुनकर स्वभाविक है कोई भी गश खा कर वहीं गिर पड़ता । मेरे साथ कुछ ऐसा ही हुआ जब शरद ने कहा "अन्नू तुम अपनी एक अच्छी सी कविता मेरे ऑफिस से निकलने वाली त्रैमासिक पत्रिका के लिये जरूर देना ।" 

मैं ...मैं ...खुश होऊँ कि रोऊँ ..कुछ समझ नहीं पाई । और वह ऑफिस चले गये । 


मेरी पहली कविता 'मैं अभिशप्ता ' छपी थी उनकी ऑफिस पत्रिका मेंं जिसे पढ़ कर एक दिन अचानक एक फ़ोन आया मेरे घर के नंबर पर । मेरे फ़ोन उठाते ही उस तरफ़ से आवाज़ आयी "मैं मृणाल शर्मा बोल रहा हूँ प्रयागराज उत्तर प्रदेश से ।क्या मैं अनुपमा जी से बात कर रहा हूँ? " और मेरा प्रतिउत्तर था "जी हाँ" उस मधुर स्वर झंकार से मेरे अस्तित्व में जैसे एक सिहरन सी दौड़ गई। सहसा मन में सवाल उठा कि इस व्यक्ति को मेरा फोन नम्बर कैसे मिला ? कुछ देर बाद समझ आया कि उन्हें मेरा फोन नम्बर पत्रिका में मेरी कविता के साथ छपे मेरे परिचय से मिला था। फ़िर वह मेरी कविता की हर एक पंक्ति की समीक्षा करते हुए तारीफों के पुल बांधते चले गये । और पहली बार किसी अजनबी को मेरे हृदय की भाषा को पढ़ते हुए, मेरी कल्पनाओं की तितलियों को पकड़ते हुए, और मेरी अनुभूति को समेटते हुए देख मैं कृत्य कृत्य हो गई थी। मेरी खुशी का मानो कोई पारावार नहीं था। उस दिन मृणाल मुझे खुशियों का देवता लगने लगे थे । फ़िर मृणाल ने अपना परिचय देते हुए कहा था कि उन्हें भी कविता लिखने का शौक हैं और वह अक्सर मुझे अपनी पसंदीदा कविताओं की पंक्तियाँ सुनाने लगे । हम दोनों को बातचीत करते हुए कितना अर्सा बीत गया पता ही न चला । मुझे महसूस हो रहा था जैसे आज सदियों के बाद खुद की आवाज सुन रही हूँ ...सुन रही हूँ अपनी दिल की धड़कन जो पहले भयभीत थी पर आज गुनगुना रही है । अचानक उनकी बातों ने मुझे एक ऐसे मोड़ पर ला कर खड़ा कर दिया जहाँ से राह अलग दिशा लेती है । मैं मन ही मन शरद के प्रति आभारी थी कि आज मैं मृणाल से मिल सकी थी तो सिर्फ़ उनकी वजह से । शरद बहुत खुश थे क्योंकि उन्हें लगातार बधाइयाँ दी जा रही थी मेरी कविता के उनके आफिस की पत्रिका में छपने के बाद से । फिर मैं भी रोज़ किसी न किसी बहाने मृणाल से बातें करने लगी । धीरे धीरे दोनों की ख्वाहिशें, पसंद - नापसंद सब मिलते जुलते से लगने लगे । शरद के अनुपस्थिति मेंं हम यूँ ही फ़ोन पर बातें करते रहे कभी कविताओं की, कभी कहानियों की, कभी साहित्य की या कभी अपने अपने जीवन की । दिनों दिन मेरा विश्वास बढ़ता जा रहा था मृणाल पर । ये विश्वास कब दोस्ती और दोस्ती कब प्यार मेंं बदल गई कुछ इल्म ही नहीं हुआ । 


एकदिन मृणाल ने मुझे अचानक "प्रिया" नामसे संबोधित किया और कहा " तुम्हारी रूह अब मेरी प्रिया है । क्या स्वीकार है तुम्हे ?" मैंने बहुत ही भाव विभोर होकर 'हाँ 'कह कर अपनी स्वीकृति दे दी इक नये नवेले नाम को । मेरी रूह का नाम प्रिया हो चुका था और मैं अब सिर्फ़ और सिर्फ़ मृणाल की प्रिया थी । कब अनुपमा से प्रिया बन चुकी थी ..? कब प्रेम की दरिया मेंं लीन हो कर मेरी आत्मा मृणाल की अभिसारिका बन चुकी थी ...? कब दर्पण मेंं मैं प्रिया को देखती थी ? पता न चला ..अनुपमा अब अपनी "प्रिया" नाम की नई पहचान और नई सोच मेंं उतर चुकी थी नई कामनाएं ले कर ....रोज़ रात की आंच मेंं सपनों को निर्दयता के साथ भूनते हुई अन्नू अब इन सपनों को मृणाल के मुलायम एहसासों को समर्पित कर चुकी थी .....।


मेरी खिड़की से खिलखिलाती नर्म धूप आ जाती थी मुझसे मिलने, बात करने,और कभी मेरी कल्पनाओं को सीने से लगाने । झिलमिलाते सपनों से आँखें चमक उठती थीं जो रोशन कर देती थीं मेरी रातों को । कभी - कभी गुदगुदाने लगतीं थी मीठी यादों की उंगलियां । मैं खो जाती थी फिर सुकून से सो जाती थी सुबह के मीठे इंतजार को साथ लिये । धीरे - धीरे मैं शरद के नियमों की श्रृंखलाओं को तोड़ कर दूर उड़ने लगती थी मृणाल के शब्दों के आकाश मेंं, अपनी कामनाओं के पँख लगा कर । पता नहीं कब आँखें भींग जाती थी, कब सहम सी जाती थी, कब मृणाल की बाँहों मेंं सिमटने का एहसास मुझे जकड़ने लगता था कुछ पता ही नहीं चला ।मन ने सहसा तय किया मृणाल से मिलने का । जिस प्रेम पराग ने दोनों को पल्लवित किया था उस पराग को एक बारगी छूने का मन हुआ और तय हुआ हमारे मिलन का माह और दिन जब शरद ऑफिस टूर पर जयपुर जाने वाले थे । मृणाल हमेशा कहते थे "जानती हों प्रिया मैं जहाँ जाता हूँ वहाँ बारिश जरूर होती है और जब हम मिलेंगे तब देखना तुम्हारे शहर मेंं भी बारिश होगी और हम दोनों खूब भीगेंगे उस बारिश मेंं ।" आह्ह्ह ...! जाते समय शरद यह चेतावनी देकर गये थे कि मेरे वापिस आने पर घर का हर कोना और बिस्तर मुझे साफ और बेदाग मिलना चाहिए । दस दिन के बाद मुझे तुम यहीं इसी चौखट पर मिलना जहाँ तुम अभी खड़ी हो । मेरे उसूलों पर चलते हुए थक मत जाना । पति परमेश्वर हूँ तुम्हारा और तुम्हे हर पल पाने का अधिकार है मुझे ...पत्नी हो तुम मेरी ...मेरी कही हर बात पर हामी भरना तुम्हारा धर्म है। भूल मत जाना । फ़िर वो रवाना हो गये जयपुर के लिये । 


मैं अब थी अकेली इन दीवारों से मिलकर गला फाड़ कर रोने चिल्लाने के लिये । उस दिन बहुत रोया था मेरा मन, दहल गई थी मैं अंदर तक । तभी मृणाल का फ़ोन आया और अचानक मैं कह उठी "मुझे आपसे मुहब्बत है , मृणाल !" उस तरफ़ से मृणाल एकदम से शांत हो गये । उस ख़ामोशी मेंं मृणाल की मीठी मीठी बातें जैसे मेरी साँसों मेंं घुल कर एक ख़ूबसूरत एहसास की झील मेंं डूबी जा रही थी । और तभी मृणाल ने कहा "प्रिया इसका एहसास मुझे पहले दिन से हो गया था कि मुझे भी आपसे मुहब्बत है ।" 

ये बसंत बहुत देर से आया था मेरे जीवन मेंं पर फ़िर भी वही रंगीनी थी, वही समर्पण था, वही अंतरंगता थी जैसे हमारी आत्माएं सदियों से एक दूसरे को व्याकुलता से ढूँढ़ रही थी । मेरी सारी आशाएँ उनके आलिंगन मेंं थी । जो अंतर्द्वंद चल रहा था कुछ दिनों से वो आज समाप्त हो चुका था । मन के किनारे मृणाल नाम के फूल खिल रहें थे ..मन की कुमुदनी मृणाल नाम के चाँद को खोज रही थी । मन वाटिका मृणाल नाम से गूँज रही थी और मृणाल को जैसे एक नयी उम्र मिल गई थी । ढेरों वादें हम दोनों को यूँ जोड़ रहें थे जैसे बादलों को बूंद, जैसे हवा को धुंध । हमारी राहें अकसर मिला करती थी गहन रातों मेंं जब पूरी निस्तब्धता छायी होती थी कायनात पर । और मृणाल मुझे हजारों मीलों दूर बुलाने चले आते थे अवचेतन अवस्था मेंं । इतनी गहराई थी इन एहसासों मेंं कि अक्सर यही लगता था कि जैसे सब कुछ हकीकत है कोई कल्पना नहीं । इतने करीब आ चुके थे हम दोनों कि एक पल के लिये भी नहीं लगता था कि हम सामाजिक स्तर पर, उम्र की दहलीज पर एकदम अलग - अलग परिवेश से थे । किसी ने सच कहा है कि प्रेम कभी भी, कहीं भी और किसी से भी हो सकता है और ये हो चुका था । 


मृणाल मुझसे मिलने दिल्ली आ रहे थे जिन्हे सिर्फ़ फ़ोन पर जानती थी । एक दूसरे को देखे बिना जो रिश्ता जन्म लिया था उसे हम दोनों बहुत ही कोमलता और सतर्कता से पाल रहें थे क्यों कि यह बिल्कुल नैसर्गिक था । इसमें देह को पाने की लालसा नहीं थी ..बस मानसिक स्तर पर आत्माओं का चिर मिलन ही कहा जा सकता है इसे, जिसे हम दोनों भरपूर जी लेना चाहते थे । दिसम्बर महीना 22 तारीख , मृणाल के पहुंचने का वक्त हो गया था । प्रतीक्षा के पल धीरे धीरे कम होते जा रहे थे । एक डर भी था क्या मैं उन्हे पसंद आऊँगी ..? क्या वो मुझे अच्छे लगेंगे ! ! मैं ये सब सोचते सोचते स्टेशन पहुंच चुकी थी । बारह किलोमीटर की दूरी घर से स्टेशन तक कब ख़त्म हो गई पता नहीं चला । एक दूसरे को पहचानने का कोई चिन्ह नहीं रखा था हम दोनों ने । आत्मा से पहचानते थे हम दोनों एक दूसरे को । स्टेशन पंहुचते ही मेरे सामने एक ऐसा व्यक्तित्व साक्षात खड़ा था जिसके बारे में मैंने स्वप्न मेंं भी नहीं सोचा था । अचानक प्लेटफार्म पर उन्होने मुझे देखते ही पूछा "आप प्रिया ही हैं ना ?" और मैं "हाँ" कहते हुए शरमा गई थी। वह मेरे शहर मेंं नये थे तो मैंनें उन्हें अपने घर ले आना तय किया और टैक्सी मेंं बैठ गये हम दोनों , एक कोने मेंं वह और दूसरे कोने मेंं मैं । टैक्सी मेंं खामोशी छाई हुई थी । मैं कांच के बाहर देख कर यह सोच रही थी कि मृणाल कितने सरल और साधारण लगते हैं । एक स्वच्छ निर्मल हृदय जैसे मेरे बहुत करीब धड़क रहा था । उन्होने मेरी तरफ़ देख कर बड़ी ही शालीनता से मुस्कुरा कर कहा "क्या यूँ ही दूर बैठना है ?" मैं सिहर उठी मन ही मन । एक बिजली सी दौड़ गई मेरे तन बदन मेंं और मैंने सिर झुका दिया ।कुछ ही देर में घर पंहुच गये थे हम । घंटो यूँ ही बैठे ढ़ेर सारी बातें करते रहे । मुझे जीवन बड़ा नया नया सा लग रहा था । जैसे सारे सितारें मिलकर मेरे घर को रोशन कर रहें हों, जैसे सारी ऋतुएं मिलकर फूल बरसा रहीं हों, जैसे मंदिर की घंटियां एक साथ बज उठीं हों या फिर जैसे कड़क ठंड मेंं कुनकुनी सी धूप । अचानक मृणाल ने कहा "प्रिया ! आपको देख कर मैं स्वयं के आत्मिक प्रेम से मिल लिया । क्या आप भी ऐसा ही महसूस कर रहीं हैं ?" यह कहकर उन्होंने अपनी उँगलियों मेंं मेरी उँगलियों को जकड़ लिया था और मेरे होंठ थरथरा उठे पर कुछ कह न सके ..मैंनें धीरे से सहमति में सिर हिला दिया। इस खामोशी में मेरी आँखें आँसुओं से भीगती जा रहीं थी । मेरे अकेलेपन के इस महाद्वीप पर मृणाल कदम रख चुके थे। 

आज यहाँ भीड़ है। कोलाहल है । लग रहा था ये पल, ये आसमां, ये धरती यहीं इसी वक्त रुक जाएँ और मैं समा जाऊँ उस रूह मेंं जो न जाने कितने जन्म की प्रतीक्षा के बाद मिली है । मेरा शरीर निढ़ाल हों चुका था ..मेरी रूह न जाने कब से मृणाल की रूह के आगोश मेंं थी । न जाने कितनी उम्र जी लिये हम दोनों उस पल.... न जाने हमारी रूहें क्या क्या शपथ ले चुकी थीं.... न जाने कब तक हम दोनों यूँ खामोशी की राह पर सुकून से चलते रहे... चेतन जगत में लौटते हुए बहुत तकलीफ महसूस हुई क्यों कि ये एहसास हो चुका था ...ये दो शरीर आज जमीन पर जिंदा और भिन्न तो हैं पर हमारी आत्मायें सांसारिक इच्छाओं से दूर कहीँ क्षितिज के उस पार मिल रहीं हैं । ये मानव देह सामजिक रिश्तों के बंधनों में प्राण शेष रहने तक आबद्ध रहेगी। जब तक ...पंचभूतों मेंं समाविष्ट है पर प्रेम के जिस एहसास ने दो आत्माओं को उन्मुक्त कर दिया था उनका कालांतर में मिलना अवश्यंभावी है यह दृढ़ विश्वास था हमें। बाहर घनघोर बारिश हो रही थी वो भी दिसम्बर मेंं ! ! 

अब मृणाल का जाने का वक्त हो चला था । कुछ भी शेष नहीं था । एक परिपूर्णता थी । एक शांत स्थिरता थी ...मेरी शून्यता मेंं मृणाल का होना मुझे संपूर्ण होने की अनुभूति करा रहा था । इसी भावना के साथ दो शरीर अलग हो रहे थे । टैक्सी गेट के पास थी और मैं मृणाल की शरीर से उनकी रूह से अलग नहीं हो पा रही थी जैसे सब कुछ आँखों के सामने ढह रहा था जैसे रात की बाँहों मेंं अंधेरा और अंधेरे की देह पर दो परछाइयां । मैं अपने हृदय को विदा कर रही थी आँखों में आसुँओ का सैलाब लिये ...भींग रही थी उस बारिश मेंं जो मेरे अंतस को निचोड़ कर क्रूरता से जुदाई के बादल सी बरस रही थी ....मैं साँसों को रोक ही नहीं पा रही थी । भारी मन से ...मैं मृणाल की कमीज के एक कोने को पकड़तें हुए निःशब्द हो चुकी थी ...आज जीवन की ये कैसी घड़ी है ...? क्यूँ मैं इतना असहाय हूँ ...? क्यूँ आज मैं खुद को शून्य समझने लगी हूँ ...क्यूँ ...? क्या चला जा रहा है? क्या मुझसे छूट रहा है ........? और मृणाल लगातार मुझे प्यार से मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए समझा रहे थे।सान्त्वना देकर आश्वस्त कर रहे थे कि हम बहुत जल्द मिलेंगे पर मैं कुछ भी समझने को जैसे तैयार ही न थी। कब जा कर टैक्सी मेंं मृणाल के साथ बैठ चुकी थी । रात फिर से गहराने लगी थी ..टैक्सी की धीमी रोशनी मेंं हम दोनों बैठे थे पर इस बार एकदम करीब । जन्म जन्मांतर के कसमें- वादों ने इस तरह बाँध लिया था कि हमारे मध्य कोई निर्वात नहीं था और ड्राइवर की परवाह किये बिना ही मैंने मृणाल को अपनी बाँहों मेंं भर लिया था और अधीरता व्याकुलता से कहती चली जा रही थी "मृणाल.. ले जाना मुझे ....इस संसारिक रिश्तों से दूर ...ले जाना मुझे अपने साथ ....मैं इंतजार करूंगी .....ये संगम देह का नहीं आत्माओं का है मृणाल .....ले जाना मुझे ....प्लीज़ ले जाना मुझे ...." हम दोनों की आँखें थम नहीं रही थीं बरसते हुए ....स्टेशन मेंं उतर कर दो निष्प्रभ आँखें मुझे अपलक निहारते कहीँ अंधेरे मेंं गुम हो गई । 


दस दिन के बाद शरद तो लौट आए पर अन्नू नहीं मिली उन्हें । एक शरीर के साथ तो वो पहले से थे और वह शरीर अब सिर्फ़ एक निर्जीव मांस पिंड भर रह गया था । 

वक्त गुजरते गुजरते हमारी उम्र को भी साथ ले गया था । मृणाल से किये हुये वादे और वो मिलन के स्वर्गीय मुहूर्त को हृदय से लगा रक्खा था मैंने क्यों कि ये वादा आने वाले कई जन्मों का था । जब हम मिले थे पहली बार तो एक सोनेट लिखा था हम दोनों ने मिलकर ...जो हमेशा कमरे के निभृत कोने मेंं गूँजता रहा था अब तक ......


"हैं मदिर से नैन, स्मित हास अधरों पर खिला । 

मैं भ्रमर मकरंद याचक, पुष्प कलिका से मिला ॥ 

गर्व परिलक्षित सा होता, शांत मंथर चाल में 

दृग उलझ कर रह गये दो, मेघ कुंतल जाल में ॥ 


निविड़ता है आलिंगन मेंं, अमृतमय है सायंकाल 

प्रेम मंत्रित हृदय स्पंद, है प्रणय भरा प्रातःकाल ॥ 

इन्द्रजाल सा लगे उन्मत्त, आकाश है स्वप्नालोक

मोहित रूप लावण्य निशा का, नैन कल्पनालोक ॥


प्रीति में आसक्ति परवर्तित अगन, मन व्यथित सा 

विरह की ये वेदना सह कर, हुआ अति थकित सा 

युगों से है तृषित देह दो प्रेम जनित आतुर क्षुधा 

आत्मिक संतोष पा मानो लगे सब कुछ वृथा।।


कोमल पुष्प सेज पर बिखरी आज चंद्र किरण 

हो रहा आत्माओं की सानिध्य मेंं अग्नि स्फुरण ।"


#मृणाल प्रिया *




जब आत्माएं मिलती हैं तो संसार को कहाँ पता चलता है? 

प्रेम, रीति रिवाज, कोई बंदिश कुछ नहीं मानता ...हम दोनों की आत्माएं एक दूसरे को स्पर्श कर चुकी थीं उस दिन....बस सामाजिक दूरियाँ रह गई थीं हमारे बीच ....


आज इन बारिश की बूंदों मेंं खुद को सिमटते हुए देख कर अच्छा लगा । मृणाल की रूह मुझे ढूंढ़ते हुए यहीं इसी कमरे मेंं पंहुचेगी जहाँ दो रूहों ने मिलकर जन्मों तक साथ रहने की कसमें खाई थीं । खिड़की के उस पार घना अंधेरा है। रह रह कर आकाश में कड़क रही बिजली की चमकती हुई लकीर पड़ जाती है निस्तब्ध राह पर । 


सदियाँ बीत चुकी हैं इस कमरे मेंं और मैं प्रतीक्षा मेंं हूँ । मृणाल उसी तरह मुझसे मिलने आते हैं कल्पनाओं मेंं और वादा कर जातें हैं ठीक उसी दिन की तरह जब वो मुझे मिले थे इसी कमरे मेंं पहली बार और जाते हुए कहा था "प्रिया एक दिन तुम्हारी रूह को मेरी रूह ले जाएगी देखना ।" ....मृणाल से मिलने पर बारिश होती थी कभी । आज भी वो ही दिसंबर की रात है और घनघोर बारिश भी , कहीँ ...मृणाल तो नहीं ....! !




विश्वास प्रकृति बारिस प्रेम रूह

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