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Arunima Thakur

Inspirational

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Arunima Thakur

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जाबांजी की अनोखी दास्तान

जाबांजी की अनोखी दास्तान

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यह कहानी काल्पनिक है या सच, मैं नहीं जानती। मुझे तो मेरे नानाजी मेजर मथुरा सिंह ( भारत की ओर से पहली बार पैराशूट से कूदने का सम्मान उनके नाम भी है तब वे हवलदार थे) ने सुनायी थी। यह कहानी 1965 की है, मम्मी बताती है कि युद्ध विराम के तीन महीने बाद नाना जी घर वापस आये थे वह युद्धबंदी थे। हाँ कहानी बचपन मे सुनी थी, कुछ गलतियां भी होंगी । नाम तो आज एक भी याद नहीं है पर नानाजी का सुनाने का ढंग और हमारे रोम रोम ने खड़े होकर कहानी सुनी थी इसलिए कहानी अब तक याद है। नाना जी के शब्दों में ....


सितंबर की किसी तारीख में पाकिस्तानी सेना ने भारत पर कई मोर्चो पर हमला किया था। पाकिस्तानी सेना ने हमारी बटालियन एरिया पर हमला करके हमारे द्वारा एक दिन पहले जीती गयी पोस्ट से हमें पीछे हटने को मजबूर किया। हमारे पीछे हटने की वजह हमारी कायरता नही हमारी कम संख्या और पाकिस्तानी सेना के पीछे आने वाले टैंक थे। यह पोस्ट हम भारतीयों के लिए बहुत महत्वपूर्ण थी। पर हमारे पास सिर्फ रायफल और मशीनगन थी, एन्टी टैंक हथियार नहीं। हमारे कर्नल को इस परिस्थिति में लड़ना सामूहिक आत्महत्या जैसा लग रहा था। वह कायर नही थे पर टैंक के आगे अपने वीर सैनिकों को कुचलता हुआ देखना, वह भी दुश्मन को कोई नुकसान पहुचाये बगैर, वह नही चाहते थे । वह चीते की तरह दो कदम पीछे लेकर फिर छलाँग लगाने के पक्षधर थे शायद तब से मदद भी आ जाती। 


पर ऊपर से कमांडर ने कर्नल को आदेश दिया। हम प्रतीक्षा नहीं कर सकते । किसी भी हाल में हमें हमला करके यह पोस्ट वापस लेनी है। एक बार टैंक इस पोस्ट तक पहुँच गए फिर बहुत मुश्किल हो जाएगी। अधिकारियों की मन्त्रणा के बाद यह निर्णय लिया गया कि टैंक से बचने का एक ही उपाय है लैंड माइंस लगाना। अगर हम उस पोस्ट के पास जाकर लैंड माइंस लगा देते है तो काफी हद तक हमारी पोस्ट सुरक्षित हो जाएगी। पर इस वक्त हमारे पास माइंस लगाने के लिए कुशल और पर्याप्त सैनिक नहीं थे। सिर्फ एक व्यक्ति सेकंड लेफ्टिनेंट (नाम नही याद आ रहा) ही माइंस लगाना जानते थे। कहना गलत न होगा कि वह माइंस लगाने और निकलने के विशेषज्ञ थे। अब सबसे बड़ी परीक्षा थी माइंस लगाने का काम पाकिस्तान के कब्जे वाले इलाके में करना था । वह भी रात को और आज ही समय बहुत सीमित था। सभी सिपाहियों में से साठ सिपाहियों को चुना गया जिन में से मैं भी एक था। शाम के धुंधलके में हजारों माइंस ट्रकों में सावधानीपूर्वक लोड किये गए। रात के अंधेरे में बिना हेडलाइट जलाए हमारी सेना के कुशल सैनिक ड्राइवरों ने दुश्मन की नज़र में आये बिना रास्ता पूरा किया। हमने ट्रकों की पार्किंग लाइट को भी ढक दिया था। सबसे कुशलता की बात तो यह थी कि अंधेरी रात में ट्रक उछलने भी नहीं चाहिए थे नहीं तो माइंस के फटने के खतरा था । 


(हम सब बच्चे मुँह खोले कहानी सुन रहे थे। क्या ऐसा सम्भव है कि ट्रक ना उछले ? कैसे वीर जवान थे जो मौत के ढेर पर बैठ कर मौत के लिए मौत लिखने जा रहे थे। )


खैर नसीब साथ था, पर दुश्मन सतर्क था, फायरिंग की आवाजें, बमो के धमाके, इन सबके बीच पूरी टीम सकुशल मंजिल तक पहुँच गयी थी। ऐसी परिस्थियों में जब सामान्य इंसान का दिल, गुर्दा, फेफड़ा उछल कर मुँह में आ जाता है, हम सब पूरी तन्मयता और सतर्कता से माइंस बिछाने में सहयोग दे रहे थे। पाकिस्तानी गोलियों का रुख कभी भी हमारी तरफ हो सकता था। पर शायद उन्होंने सपने में भी नही सोचा होगा कि भारतीय वीर अपनी माँ की रक्षा के लिए रात के अंधेरे में पाकिस्तान के कब्जे वाली पोस्ट के पास माइंस भी लगा सकते है। जवानों और लेफ्टिनेंट जयंत (हा उनका नाम जयंत था शायद ) की कुशलता और जाबाज़ी का अंदाज़ा लगाओ कि उन्होंने पाकिस्तानी कब्जे वाली पोस्ट से कुछ हजार तेरह सौ मीटर की दूरी तक माइंस बिछायी थी। 


(नानाजी आप लोगों को डर नहीं लग रहा था ? नातिन जो डरते है वो भारतीय सेना का हिस्सा नहीं होते। वर्दी पहनते ही एक जुनून आ जाता है। लगता ही नहीं है कि रणभूमि में है लगता है माँ की गोद में खेल रहे है, मरे तो भी माँ की गोद मिलेगी।) 


हमने सारी आठ साढ़े आठ हजार माइंस ..


( कितनी नानाजी...? कुछ हजार का मतलब आठ हजार से ज्यादा माइंस था ? वो भी सिर्फ एक रात में ? नहीं नातिन सिर्फ कुछ घंटों में, शायद पाँच या छः घण्टे। क्योंकि हमें उजाला होने से पहले बेस पर वापस पहुँचना भी था। क्योंकि भारत माँ की रक्षा की तरह साथी सैनिकों की रक्षा भी हमारा पहला कर्तव्य होता है। दुश्मन बचने ना पाये पर साथी मारने न पाए।)


हाँ तो हमने माइंस मुख्यतः सड़क पर और हर सम्भव ऐसी जगह लगाई कि टैंक इस इलाके से बाहर नहीं निकल पाने चाहिए। हमने माइंस को बिछाने के साथ साथ उनको घास फूस सूखी पत्तियों , हर सम्भव तरीके से छुपाने की कोशिश भी की। ट्रक के टायरों के निशान हमारे जूतों के निशान, मतलब हर संभव प्रयास किये की हमारी यह रणनीति पाकिस्तानी सैनिकों की नज़र में ना आये। हम सभी साठ सैनिक आधी रात से पहले काम खत्म करके अपने बेस के लिए निकल गए। 


सुबह हमने एक निर्णायक लड़ाई लड़नी थी। जबकि हमारे पास सिर्फ रायफल और मशीनगन थी और सैनिकों की एक छोटी टुकड़ी। बाकी की सेना पहले से ही अन्य मोर्चो पर लड़ रही थी। इतनी जल्दी हमारे पास मदद नहीं आ सकती थी। पर हम अब थोड़े सुकून में थे कि टैंक इस तरफ नही आ पाएंगे बाकी सैनिकों की कोई फिक्र नहीं थी उनके बीस सैनिकों के लिए हमारा एक सैनिक काफी था। जैसी की अपेक्षा थी पाकिस्तानी सैनिक एक दिन पहले हमारे पीछे हटने के कारण बहुत उत्साहित थे। इसी उत्साह में उन्होंने जमीन पर बिछी माइंस पर ध्यान ही नहीं दिया। लड़ाई लगभग एकतरफा हो गयी थी। माइंस के कारण उनके टैंको सैनिकों को भारी नुकसान हुआ। हमने अपनी पोस्ट पर वापस कब्जा कर लिया। बोलो भारत माता की जय।


नानाजी को इस बात का बहुत अफसोस रहा ज़िन्दगी भर कि उनके इतने जाबांज़ लेफ्टिनेंट को कोई वीरता पुरस्कार नही मिला। यहाँ तक कि वह पहचान भी नहीं मिली जो उन्हें मिलनी चाहिए थी। आज भी हम भारतीय उनकी इस जाबांजी से परिचित नहीं है। यह भले ही एक छोटी पोस्ट (बेस ) थी पर उसकी रक्षा के लिए किए गए उपाय, प्रयत्न निःसंदेह बहुत बड़े थे। 


मैं समस्त भारतवासियों की ओर से नमन करती हूँ उन सभी वीर जाबांज़ सैनिकों को जिनके प्रयत्न और शहादते इतिहास के पन्नों में भले ही अंकित न हो पर हर हिन्दोस्तानी के दिलों में अवश्य ही अंकित होनी चाहिए। हम सभी अपने दिल की गहराइयों से आप सभी सैनिकों के ऋणी है। ।



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