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आएंगे फिर लौट कर
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© Tulsi Tiwari

Drama

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जीवन में पहली बार होली पर वे दोनों बच्चों से दूर थे। जब तक नौकरी में रहे या तो गांव चले जाते या गांव वाले उनके पास आ जाते। अम्मा, बाबूजी की हार्दिक इच्छा रहती थी कि होली अपने गांव में ही मनाई जाये। जयन्त ने उनकी इच्छा का हमेशा आदर किया। वह तो जब बच्चे बड़े हो गये और अम्मा-बाबू जी भी परलोक वासी हो गये तब सबका गांव में इकठ्ठा होना कम हो गया। अपने बच्चों में किसी की परीक्षा तो किसी का इंटरव्यु पड़ गया। कभी अपनी ही हिम्मत न पड़े खाली पड़े घर में जाकर त्यौहार की पूरी व्यवस्था करने की। ननदों का स्थान बहू बेटी न ले सकी, बहू मायके जाना पसंद करती और बेटी अपनी ससुराल, शादी के बाद वर्षों वे दोनों ही केन्द्र में रहते थे। सारा परिवार उनके चारों ओर चक्कर लगाता रहता था। बाद में वे किनारे हटते गये, केन्द्र में मधु और मुक्ता आ गये, उनकी पसंद का खाना बनने लगा, उनकी पसंद से मेहमान आने जाने लगे और आज तो केन्द्र भी वे ही है और परिधि भी।

कल रात जयन्त को अचानक ऐसी खाँसी शुरु हुई कि चैन लेना नामुमकिन हो गया। खाँसते-खाँसते लोट पोट हो रहा था। पूरी रात वह कभी पानी गरम करके लाती, कभी पीठ सहलाती, कभी दौड़कर खेत देख आती। बाउंण्ड्री नहीं बन पाई है अभी तक। लोगों के पशु छुट्टा चरते हैं, अपनी फसल बचाने के लिये रखवाली ही एक मात्र चारा है। वैसे लकड़ी के बड़े -बड़े बिजूके बनवाये हैं। उन्हे जगह-जगह खड़ा कर दिया है। आदमी के कपड़े पहने हांडी के ऊपर मुरेठा बांधे हाथ में डंडा थामें आदमी का भ्रम पैदा करते हैं। कुछ पशु मनुष्य की होशियारी समझ जाते हैं और अवसर पाकर सारी फसल चौपट !

खाना भर ही नहीं है, रौंद कर पूरा सर्वनाश कर देते हैं। पता नहीं किस तरफ से नील गायों का झुंड आता है। पलक झपकते ही पूरा खेत खाली कर जाता है। उन्हीं के डर से तो आज दो महीने से वह लाठी लेकर खेत में पड़ी पुरानी कार में ही आराम करती है। ठीक से नींद भी नहीं आती। हर आधे घंटे में उठती है, टॅार्च जलाकर दूर -दूर का जायजा लेती है। जहां कोई काली छाया हिलती डुलती सी लगती है वह हो ऽ रे ऽ ऽ की तेज आवाज के साथ लाठी लेकर बिना ऊपर नीचे देखे, उस दिशा में दौड़ पड़ती है। दिन में जयंत देखते रहते हैं किन्तु रात भर जागना उनके बूते का नहीं था। फिर उसके रहते वे क्यों तकलीफ उठायेंगे, सेवा करना तो पत्नि का कर्तव्य है न ऽ! . अब तो रात की ठंड भी कम हुई है पूस माघ की हाड़ जमा देने वाली ठंड में दमा के मरीज कितने दिन डटे रह सकते थे ? दिन में देख लेते हैं यही बहुत है। घर की साफ सफाई, भेाजन पानी, गाय का दाना-चारा सब कुछ तो उसी के माथे था।

कल रात होली जली थी, उसने बस्ती के आस पास के खाली स्थानों में आग की बड़ी-बड़ी लपटों के साथ मनुष्यों की हर्ष घ्वनि सुनी, नगाड़ो की थाप के साथ होली गीतों की मद्धिम स्वर लहरी सुनते हुए गेहँ के खेतों के ऊपर से हवा के साथ-साथ बादलों के रथ पर सवार चांद चहल कदमी कर रहा था। पूर्णिमा की चांदनी हरे-भरे पेड़ों की फुनगी पर चढ़ी नीचे झांक रही थी। उसे बड़ा अच्छा लगा था सब कुछ। उस तरफ जहां उसके खेत की सीमा महावीर के खेत को छूती है पलाश के कई बड़े-बड़े पेड़ हैं। इस समय तो पत्रहीन टेसू के फूल शाखों पर केसरिया चादर ओढ़े इठला रहे थे। खेत से लगा हुआ आम का एक बाग है, वहाँ बड़े सबेरे से कोयल कुहूकने लगती है। ठंड कम होने से थोड़ी राहत महसूस हुई थी कि देश के उत्तरी इलाके में बर्फ गिरने के कारण यहां भी बादल छा गये। एक झोंका पानी भी बरस गया। ठंड वापस आ गई। जयंत चले गये थे, होलिका दहन स्थल की ओर। सारी उम्र तो नौकरी के कारण कभी शामिल नहीं हो पाये। खदान की कालिमा मे सिर पर बत्ती बांधे अपने परिवार के लिये उजाले का एक टुकड़ा ढुंढते रहे। एस.ई.सी.एल में छुट्टी के दिन काम करने पर तीन गुना वेतन मिलता है, जो ही चार पैसे बने ! क्या रखा है त्यौहार में ? दोनो बच्चों की पढ़ाई-लिखाई, पिता जी की सदाबहार बीमारी, ऊपर से रईशाना शौक ! तीज त्यौहार पर बहनें आस लिये आ जाती थीं, न्योता हँकारी, दिनों दिन बढ़ती महंगाई इसी प्रकार कौड़ी.में कसीदा काढ़ते कैसे पैतींस वर्ष गुजर गये पता ही न चला। अब जब सेवा निवृत्त हुये हैं तो सब कुछ याद कर रहे हैं। बच्चों के बिना कुछ बनाने का मन नहीं था उसका, किन्तु इनका ख्याल करके थोड़ा-थोड़ा सब कुछ बनाया। थोड़े गुझिए, थोड़ी मठरी, थोड़ी पपड़ी ! पसंद तो सब है परंतु शुगर खाने दे तब तो ! लाख सावधानियों के बाद भी दमा उभर ही आया, खदान के धुल, धुएं वाले वातावरण का उपहार है यह बीमारी। अधिकांश क्या 99 प्रतिशत कर्मचारी इस बीमारी से ग्रस्त हो जाते हैं। अभी अभी जरा सी आंख लगी है। उसने तीन चार तकिये लगाकार उन्हें अधलेटा सुला दिया था। खाँसी कम हुई तोे वह धीरे से दरवाजा उढ़का कर बाहर आ गई। दबे पांव झाड़ू -बुहारु, दाना -चारा बर्तन -भाड़ा आदि करने लगी। अभी वह गाय का दुध निकाल कर फारिंग हुई थी कि दरवाजे पर आवाज हुई उसने दरवाजा खोलकर देखा तो मोती खड़ी थी, सिर से पांव तक गूलाल में रंगी।

’’मोंही पोदीना देई देव अम्मा तुम्हार बेटवा परे हें उल्टी -टट्टी होय लागि ही ’’- उसके बिना पूछे उसने अपना मकसद बता दिया। इसका पति छेदी खेती का काम देखता है। न जाने क्या खाया -पिया, तबियत खराब कर ली। कहाँ मदद करता कुछ, तो लो और देखो ! उसने मन ही मन कहा।

’’लई लेव उॅठी हवय।’’ उसने हाथ के इशारे से नल के आसपास फैले पोदिने की ओर संकेत किया।

तुम्हरे पापा भी तो परे है, रात से । मारे खाँसी के दम नहीं ले पा रहे हैं। उसने मोती को बता दिया ।वैसे तो रात में पच्चीसों बार मधु को फोन लगायी परंतु टावर न मिलने के कारण बात नहीं हो पाई, लड़का आये तो इलाज पानी का इन्तजाम हो। यहां तो दूर दूर तक कोई कहने लायक आबादी नहीं है। बस इक्का- दूक्का घास फूस वाले झोपड़े हैं। पचास कि. मी. आगे शहडोल और उतने ही पीछे अनुप पुर। ये शहर भी ऐसे नहीं है जहां स्वास्थ्य सुविधायें बेहतर हो। अच्छा इतना ही है कि मेन रोड के पास ही यह फार्म हाउस है। अभी दो साल पहले तक तक तो यह भूखंड भी पूरा का पूरा बंजर पड़ा रहता था। बरसात में कुछ जंगली पौधे उग जाते थे जो ठंडी के प्रारंभ में ही सूख कर धरती की गोद मेें छिप जाते थे। जब पहले -पहले वह जयंत के साथ इसे देखते आई थी पहली नजर में ही नापसंद कर दिया था। हारी -बिमारी में आदमी किसे पुकारे ? वही भय आज सत्य साबित हुआ। न तो बेटी के पास फोन लग सका न बेटे के पास। चिरमिरी में होते तो वह अकेली भी अस्पताल ले गई होती अब तक। यहां न गाड़ी न घोड़ा, खांसते-खांसते कभी कुछ हो गया तो वह क्या मुंह दिखायेगी दुनिया को ? जयंत ने जब इस खेत को खरीदने की जिद ठानी तब दोनों बच्चों ने विरोध किया। पापा अब तो आप लोगों को डा. के नजदीक रहना चाहिये। इससे अच्छा शहर में एक घर ले लीजिए, बड़े बच्चे पढ़ेंगे और आप लोगों की सेवा भी करेंगे। ये बिदक गये थे। अपना मत देखो न न !............. हमें खेत, खलिहान, जंगल, पहाड़, पानी, गाय, बछड़ा चाहिये। हमें कुछ नहीं होगा ! हमारे शास्त्रों के अनुसार भी अब हमारी वानप्रस्थ की उम्र है। हाँ इतना कर सकते हैं कि तुमसे जितना हो सके हमें सुविधा संपन्न बना दो। जयंत ने दो टुक बात की थी।

बेटे-बेटी की पढ़ाई -लिखाई, शादी- ब्याह, अच्छे रोजगार का इंतजाम करने के बाद वे बची जिंदगी अपने हिसाब से जीना चाहते थे। वह तो फिर हर हाल में उनके साथ थी, तभी से जब से फेरों का अर्थ जाने बिना उनके साथ सात फेरे लिये थे। उसने एक ही अर्थ समझा था जैसे आज उनके पीछे -पीछे चल रही है सबके सामने वैसे ही पूरी जिदंगी चलना है, बस उसका यही एक कर्तव्य है। तेरह साल की कच्ची उम्र थी उसकी। कक्षा सात में पढ़ रही थी। जयंत मैट्रिक करके निकले थे उसी वर्ष। दोनों के लिये विवाह एक उत्सव था जिसमेें घर परिवार, हित मित्र, जात परजात मिलकर एक लड़के से एक लड़की का जीवन सदा के लिये जोड़ देते हैं। ससुराल आने के दूसरे ही दिन पारिवारिक रस्म के अनुसार वह सिर पर गोबर लेकर खेतों की ओर चली थी, जयंत कंधे पर कुदाल लिये उसके साथ- साथ चले थे। उनके साथ बाजे गाजे के साथ घर परिवार टोले मोहल्ले की औरतें सगुन के गीत गाती चल रही थीं। उसने कामदार साड़ी पहन रखी थी, पतली कलाइयां, सुहाग की लाल चूड़ियों से भरी हुई थी। पहली-पहली बार घूंघट डाली थी, वह हवा के साथ उड़-उड़ जाता था, पांव में पाजेब थी, चप्पल नई होने के कारण बार-बार लगता वह अब गिरी तब गिरी। बड़ी नंनद संभाल लेती अपनी गोद में। खेत में विधिवत पूजा अर्चना हुई, जयंत ने पांच कुदाल मारकर प्रतीकात्मक खुदाई की और उसने गोबर फेंक कर खेत को आवश्यक भोजन कराया। उसने घूंघट उठा कर देखा था, दूर -दूर तक फैले खेत जिनमें जानवर चर रहे थे, एकदम उजाड़ पडे़ हुये थे। गेहूँ की कटाई हो चुकी थी, उसकी एक फुट की खूटियाँ सिर ताने खड़ी थीं। उन्हें बचा-बचा कर चलना पड़ रहा था। वह भी गांव की लड़की थी। खेतों तक दौड़ते हुए आना-जाना उसका प्रिय खेल था। बाबू के लिये लोटे में चाय लेकर जाती, जब वे खेतों में कुछ काम कर रहे होते, कटाई के समय मजदूरों को गुड़ पानी देने जाती। खलिहान की रखवाली में भी सहयोग करती, क्योंकि तब तक स्कूल की छुट्टी हो चुकी होती, उसके तरफ के खेत सिंचित थे, दोनों फसल होती थी। अधिकांश खेतों में बोर खुदे हुये थे। यहां तो गोबर डाल कर आने के बाद दुल्हन के सिर पर पीतल का कलशा रखे यही टोली गाते बजाते पुनः लगभग दो किलोमीटर तक पानी लाने गई थी, एक प्राकृतिक नाला था वहीं का पानी आसपास के गांव वाले बारह महीना पीते थे। दुल्हे ने कलश भर कर दुल्हन के सिर पर चढ़ाया था। जिसे प्यास लगी थी पानी पी रहे थे जिनके हाथ में कोई बरतन था उसमें राह के लिये भर लिया था पानी। जब से शादी के कारण मेहमान आये थे बैलगाड़ी में पानी के बड़े-बड़े बरतन रख कर ले जाते और भर कर ले आते थे घर के मर्द लोग। साधारण दिन में यह औरतों का दायित्व था कि वे मुंह अंधेरे से आवश्यकता भर पानी ढोने लगें। उसने भी तो ढोया था कुछ वर्ष। वह तो बाबू जी की खदान में नौकरी थी, कह-े सुने लाजे- लिहाजे उन्हाेंने दुआर पर कुंआ खनवा दिया, भले ही तीन सौ फुट नीचे पानी मिला किन्तु एक दम मीठा ! इस एक ही पुण्य ने उनके सारे पाप धो दिये। अरे नहीं, यही क्यों, जब मेंडिकल अनफिट हुए तब नौकरी भी तो मधु को दिया। बाकी चाहे जैसे भी रहे हो गांव से निकल कर खदान में मजदूर बने थे, खदान के अंदर पीठ पर कोयला ढोने का काम मिला था उन्हें।ड्युटी से लौटते हुए भठ्ठी से पीकर आते। गिरते-पड़ते, गाली-गलौच करते बड़बड़ाते। मनहरण पाण्डेय, जिनके पुरखे गांव भर के लोगों से पांव पुजवाते थे कथा भागवत् में जाते थे आज ऐसा दिन आया कि कोयला ढो रहे हैं। इसी कुंठा ने उन्हें आदतन शराबी बना दिया। शराब के साथ मांस भी तो चाहिये। कहते हैं दोनों भाई-भाई है। आसपास के गांवों की कई औरतों से उनकी यारी थी। छुट्टी के दिन घर आतीं। दिन-रात पत्नि की तरह घर -बार सम्भालतीं और दूसरे दिन अपनी बिदा बिदागरी लेकर घर चली जातीं, ऐसे में कैसे बरक्क्त होती घर में ? सास घर परिवार खेत -खार सम्हाले गांव में रहती, उसने समझा था पति की कुंठा का रहस्य ! जब कभी घर आते कुंए पर ले जाकर मलमल कर नहलाती धुलाती। सारे कलुष कल्मष धोकर वह अपने पति को निष्पाप कर देती, कभी किसी प्रकार की शिकवा- शिकायत या लड़ाई -झगड़ा करते किसी ने भी नहीं सुना था उन्हें। असिचिंत क्षेत्र में खेती से क्या उपजता ? साल भर उन्हीं में लगे रहो ! खाद डालो, जोताई करो, बीज बोओ, पानी नहीं गिरा। सुख गया। ज्यादा गिर गया तो गल गया। दाने पड़ने के समय एक पानी के लिये मार खा गई फसल, हुई भी तो चार माह से ज्यादा नहीं चलती। ऐसे में नौकरी का ही तो सहारा था।

चारों ननदों की शादी के लिये खेत बेचने पड़े उन्हें पढ़ाई बीच छोड़ कर जयंत को भी काम में लगना पड़ा। जब सभी लोग चिरमिरी में रहने लगे तब कुछ सम्हलने लगा। जयंत के मन में अपने खेतों कसक चुपचाप जिंदा रह गई थी। मधु की पढ़ाई बड़े -बड़े शहरो में हुई थी। बेटी माया को डा. बनने का शौक था सो उसे डा. बनाया, मधु खदान में ही लेबर ऑफिसर बन गया। बहू भी पढ़ी लिखी और समझददार मिल गई। माया ने अपने लिये डा. पति पसंद किया। अब वे दिल्ली के एक बड़े असपताल में आपनी सेवाएं दे रहे हैं।ओह ! बेटी दामाद, डाॅक्टर और बाप लग रहा है बिना डाॅक्टर के.....!

अच्छा माया को फेान लगाती हूँ शायद लग जाये। दूध की बाल्टी लिए वह तेज कदमों से कमरे की ओर बढ़ी, जयंत की खाँसी की आवज सुनाई पड़ रही थी। उजाला हो चुका है, काम करने वाले तो आज छुट्टी पर है उन्हें बुलाया भी नहीं जा सकता क्योंकि उनके होशो हवाश पर तो महुए की बेटी का राज होगा, किसी की आवाज उनके कानों में पड़ेगी ही नहीं। गाय को दाना दे ही दिया है उसने। बस अब चाहे जैसा हो जयंत को अस्पताल ले जाना आवश्यक है। नहीं होगा तो किसी बस में बैठाकर शहडोल तक ले जायेगी फिर वहां किसी अस्पताल में भरती कर देगी, यूँ तो नहीं देख सकती उन्हें। शायद अब मधु को फोन लग जाए, यहां टावर की समस्या तो रहती ही है।

आख् ! आख् ! ......... वे सीना पकड़े छटपटा रहे थे। वह दौड़ी थी उनकी ओर।

’’तुझे तो काम से फुरसत नहीं, मैं नहीं रहूंगा तब लिये रहना खेत -खार ! उन्होनें बड़ी मुश्किल से अटक-अटकर कर कहा।

उसने उनका सिर अपने सीने पर रख लिया और सीना सहलाने लगी।

’’क्या करुं भगवान ? उसे बेचैनी ने घेर लिया।

’’कुछ तो करना ही होगा।’’ उसने जैसे कुछ निश्चय किया। धीरे से जयंत का सिर तकिये के सहारे टिका कर माया का नं. मिलाने लगी, संयोग से फोन लग गया।

हलो

’’हां. मम्मी प्रणम , कैसे हैं आप लोग ? उधर से माया बोल रही थी।

’’आशीर्वाद बेटा! इधर पापा को दमा दौरा पड़ गया है मधु को फोन लग नहीं रहा है। कोई साधन नहीं मिल रहा है, कैसे अस्पताल ले जाऊँ ?’’ उसकी आवाज भर्रा गई। अब तक थमी भावनाएं बह चलीं ?

’’मम्मी घबराओ नहीं, उन्हें किसी भी तरह लेकर शहडोल पहुंचो, सड़क पर लिफ्ट लेने की कोशिश करो ! मैं अभी निकल रही हूूँ वहां के लिये, मधु भैया से भी बात कर लेती हूँ। माया ने फोन रख दिया।

’’वह चप्पल पहन कर सड़क की की ओर चल पड़ी। जयंत को लगातार खाँसी आ रही थी।

’’रुकिये ! रुकिये ! यह तो निकल गई, जीप थी कोई परिवार जा रहा था कहीं।

वह आ रही है कार ! वह सड़क के बीच खड़ी होकर रुकने का संकेत करने लगी, परंतु कार फुटपाथ पर उतर कर आगे बढ़ गई। गाड़ियों का आवागमन आज एकदम कम है। त्यौहार के दिन भला कौन ड्यूटी पर जायेगा। और कौन यात्रा करेगा ? उसे निराशा घेरती जा रही थी, उसे सड़क पर खड़े हुये लगभग आधा घंटा हो गया कोई उसकी विपदा सुनने के लिये नहीं रुका।

एक भरी हुई ट्रक आती देखकर वह हाथ फैलाकर खड़ी हो गई, गाड़ी रुक गई। खिड़की से एक दाढ़ी वाले ने झांक कर संकेत से गाड़ी रोकने का कारण पूछा-

’’भैया मेरे पति बहुत बीमार है उन्हें शहडोल तक ले चलो ! मुंह मांगा किराया देंगे।’’ वह हाथ जोड़कर गिड़गिड़ा रही थी।

’’परंतु इस ट्रक में बीमार कैसे जा पायेगा, कोयले की ट्रक है जा तो मैं शहडोल ही रहा हूूँ यदि आप को असुविधा न हो तो आ जाइये।’’ उसने गाड़ी सड़क के किनारे लगाई।

वह दौड़ी कमरे की ओर, मोबाइल, ए.टी.एम. और कुछ नगद था बैग में डाला, जयंत को संभाल कर पलंग से उतारा और कमरे में ताला डाल कर उन्हें सम्हाले धीरे-धीरे सड़क की ओर बढ़ी।

ट्रक ड्राइवर गाड़ी से उतर कर उनके पास आ गया था, उसने जयंत को संभाल लिया।

रिटायरमेंट के बाद मिली सारी पूंजी लगाकर यह खेत खरीदा था जयंत ने। बोर करवाया, दो कमरे बनवाये, दिन रात मेहनत की दोनों ने, अपने सपनो का संसार बसाने के लिए। जहां दो साल पहले बंजर था वहां आज गेहूँ की फसल लहलहा रही है। मजदूरो की यहां सहुलियत है। पिछड़ा इलाका होेने के कारण रोजगार धंधे बहुत कम है आसपास के गांव वाले उनके यहां से पीने का पानी ले जाते हैं, परे हारे गाय का दूध रुपया पैसा देने से कभी पीछे नहीं हटे जयंत, लेकिन आज जब उन्हें सहारे की जरुरत है कोई दिखाई नहीं दे रहा है। बेटे की राय से नहीं चले इसलिये शायदा वह भी मन में खुन्नस रखता हो या फिर हो सकता है वह हमें फोन लगा रहा हो, जब टावर नहीं है तो वह भी क्या जाने।

’’आप तो हमारे लिये भगवान् बन गये भैया ! ’’ वह कृतज्ञ स्वर में बोली थी उसे लग रहा था जयंत की तबियत अवश्य सुधर जायेगी।

’’सब कुछ अल्ला ताला की मर्जी से होता है बैन जी, आप लोगो के त्यौहार के कारण कोई ड्राइवर नहीं आया, माल पहुंचाने की इमरजेंसी आ गई तब मैंने सोचा स्वयं की चलना चाहिये। वह संभाल कर जयंत को गाड़ी की तरफ ला रहा था।

’’यहां हमारी मदद के लिये आप को भगवान् भेज रहे थे भैया।’’

’’हाँ ! अब तो मुझे भी ऐसा ही लग रहा है।’’

उसने गाड़ी से एक बड़ा सा पेन्ट का खाली डिब्बा निकाला और उसी पर पैर रख कर उन दोनों को सामने की सीट पर बैठा लिया।

’’आपको डर तो नहीं लगेगा मेरे साथ ? हल्के से मुस्कुरा कर उसने पूछा।

’’आपको देख कर डर दूर भाग गया।’’

वह जयंत को पकड़ कर बैठ गई। दरवाजा फटाक से’’अरे -अरे रोको गाड़ी ! अरे शीला ! वह देख, हमारे खेत में नील गायों का झुंड घुस आया है !’’ अक्ख-अक्ख जयंत खिड़की से बाहर देख रहे थे उसने एक बार खिड़की से बाहर देखा, सचमुच बीस - पचीस नील गायें उसके खेत को चर रहीं थी। अब तक ट्रक में बे्रंक लग चुका था।

चलिये भैया। जितना तेज चल सकते हैं, उसने उधर से आँखे फेर ली.....

खेत गाँव बच्चे फसल

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