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बस स्टैंड
बस स्टैंड
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© Pradeep Soni प्रदीप सोनी

Drama

3 Minutes   1.8K    23


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शाम के 6 बज चुके थे और घनघोर बारिश ने सड़क को नदी में बदल दिया था, मैं बस स्टॉप पे खड़ा अपनी बस के इन्तजार में था, उसी बीच आस पास कुछ ऐसा माहौल था।

"लोगो को अपनी टाट पर हाथ रख कर भागते देखना अपने आप में अनोखा अनुभव होता है,और तेज गति से जाती गाड़ी से उडती छीटे जब किसी के वस्त्रो को भीगा दे,तब उस सज्जन पुरुष के मुख से गाड़ी वाले के प्रति निकलते सांस्कृति श्लोको को सुनना भी काफी सुकून दे होता है। और भीगी-भीगी सड़कों पर हाथ में छाता लिए जाती बालाओं को देखना तो ठीक उसी प्रकार होता है जैसे इंद्र लोक में अप्सराओ का नृत्य चल रहा हो"

हाँ तो मैं बस का इंतज़ार करते करते परेशान हो गया, मन हुआ की अभी ऑटो कर के निकलूं तभी एक सुंदर बाला पीछे आकर खड़ी हो गयी और वो भी बस का इंतजार करने लगी. फिर मैंने ऑटो ना करने का फैसला लिया और कानो मे इयरफोन लगा कर गाना लगा दिया

“ एक लड़की भीगी -भागी सी – सोती रातो में जगी सी “

और फिर से शुरू कर दिया आस पास के माहौल का आनंद लेना।

अब काफी देर हो गयी और सर में दर्द शुरू हो गया घंटा हो गया रात भी होती जा रही है पता नहीं बस कहाँ मर गयी कम्बखत।

धीरे धीरे किसी के सिसकने की आवाज़ आने लगी. पीछे देखा तो वही लड़की हाथ में रुमाल लिए सर नीचे करके रोने का प्रोग्राम

“लगता है कोई पीड़ा होगी “

ये सोच के अपन फिर सर उठा करके बस को देखने लगा।

लेकिन उसी प्रकार की ध्वनि लगातार आ रही थी।

मैंने हिम्मत करके पूछ ही लिया

मैं : “ अरे क्या हुआ .... ?”

अब ये सुनते ही वो और जोर जोर से रोने लग गयी और मैं मन ही मन सोचने लगा

बेटा आज तो पुलिस ही बतायगी क्या हुआ..??

मैं : “ अबे यार क्या हो गया.... ???

वो कुछ बोले ही नहीं बल्कि और तेज रोने लग जाये. फिर मैंने कहा

मैं : “ अरे बहन क्या हो गया....???”

बहन शब्द सुनने के बाद वो थोड़ा सहज हो गई।

वो : “मेरा फोन स्विच ऑफ हो गया और पापा को बताना हैकि मैं यहाँ हूँ “

मेरा मन तो ऐसा किया की अभी इसकी जुल्फे सवार दूँ पर ठण्ड रखते हुए मैंने फोन निकला और उसे दे दिया.

मैं : “लो कर लो फोन”

उसने फोन किया

वो : “ पापा मैं घंटा नगर बस स्टॉप पे हूँ और फोन बंद हो गया आप वही लेने आ जाओ “

उसने फोन देते हुए कहा शुक्रिया भैया “

मैं : अरे कोई नहीं दीदी

फिर 10 मिनट बाद उसके पापा नई बजाज चेतक लेकर आये और वो हल्के लहजे में बाय करके चल पड़ी।

फिर मैं इस सोच में उलझा रहा कि ऐसा क्यों हुआ की जब मैंने उसे बहन कहा तो वो सहज हो गई शायद कारण ये भी था की तक़रीबन रात हो चुकी थी, फोन भी बंद, ऊपर से बारिश, और ऊपर से बस भी ना आये तो कोई भी घबरा जाये वो तो फिर भी लड़की थी. और उस टाइम मुझे थोड़ा थोड़ा जिम्मेदारी का अहसास हो रहा था चलो जो भी है.कुछ देर में बस आ गयी और मैं बस में अपलोड हो गया पर जाते टाइम थोड़ा अजीब सा सुकून मिला किसी अनजान बहन से मिलकर।

बरसात डर अनजान विश्वास रिश्ता इंसानियत

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