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काया पूजन
काया पूजन
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© Mamta Kraina

Abstract Comedy

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अच्छा, सबको परसाद और पैसे मिल गए ना? कोई रह तो नहीं गया? दरवाजे के पास खड़े होकर उन्होंने घर से जाते हुए एक एक बच्ची के पैर छुए। उनकी पत्नी बच्चों के हाथ में पैसे और फल थमाती जा रही थी। हर साल की तरह इस बार भी नवरात्रे का आखिरी दिन उनके घर में धूम-धाम से मनाया गया। उनकी पत्नी पूरे नवरात्रों के व्रत रखती और नवमी के दिन कन्या पूजन करती थी। बड़ी श्रद्धा भाव से माता की चौकी लगाई जाती और मोहल्ले के लोगों को बुलाकर भजन कीर्तन किया जाता।

उनके घर की नौकरानी अपनी बस्ती में रहने वाली गरीब लड़कियों को बुला लाती कन्या पूजन के लिए क्योंकि साहब का मानना था की गरीब गुरबों की सेवा से भगवान खुश होते है और उनपर किया खर्च सौ गुना होकर वापस लौटता है। उस दिन झकाझक सफ़ेद कुरता पायजामा पहने सर पे रूमाल बाँध साहब उन गरीब लड़कियों को अपने हाथों से पत्तल परोसते, बड़ी श्रद्धा थी उनकी कन्या पूजन के पर्व पर।

 चिलचिलाती धूप में चलते-चलते उस लड़के का गला सूख चला था , जोरों की प्यास सताने लगी। उसकी छोटी बहिन उसके साथ ही चल रही थी, दोनों के कंधों में बड़े से बोरे लटक रहे थे जिनमें वे जो कुछ भी उनके काम का लगता सड़क से उठा कर डाल लेते। दोनों भाई-बहन झुग्गियों में रहते थे और सुबह सुबह कचरा बीनने निकल पड़ते थे घर से, ये उनका खानदानी काम था। जिस उम्र में आम बच्चे स्कूल जाते है, इन झुग्गी में रहने वाले बच्चे दो वक़्त की रोटी का जुगाड़ करने शहर के गली मोहल्ले में कूड़ा बीनने निकल पड़ते थे।

“झुमकी, बहुत जोर की प्यास लग रही है” लड़के ने अपना गला सहलाते हुए कहा।

“पानी कहाँ मिलेगा हमको अभी?”  झुमकी ने आस पास पानी के लिए नज़रें दौड़ाई।

“अरे रुक! देख सामने वो बड़ा सा घर, चल वहां चलते है, वहां पानी मिल जाएगा।

“पागल है क्या? वो चौकीदार भगा देगा।

“अरे तू चल ना! मैं बोल रही हूं ना, पानी मिल जायेगा” झुमकी उत्साह से आगे बड़ी।

“ए!!!!!! क्या चाहिए?” मूंछों वाले चौकीदार की कड़क आवाज़ दोनों के कानों में पड़ी।

“पानी पिला दो साबजी, मेरे भाई को बहुत प्यास लगी है,” झुमकी को पूरा विश्वास था मूँछों वाला चौकीदार बंगले के अन्दर से ठंडा-ठंडा पानी लाकर देगा अभी।

चौकीदार ने दोनों की तरफ दयनीय नजरों से देखा और पास में रखे घड़े की तरफ लपका ही था कि गाड़ी का हॉर्न सुनायी दिया, उसने घड़ा छोड़ झट से गेट का दरवाज़ा खोला।

गाड़ी में बैठे साहब ने दो भिखारी बच्चों को गेट के पास खड़े देखा तो चौकीदार को लताड़ा।

“क्या है ये सब? ये भिखारियों का यहाँ जमघट क्यों लगा रखा है? भगाओ इन्हें यहाँ से!

“साहब वो पानी के लिए? चौकीदार ने सफाई देनी चाही मगर साहब गुस्से में दहाड़े।

“साले!!!! यहाँ क्या धर्मशाला खोल रखा है भगाओ इन्हें जल्दी से, आज के बाद कोई दिखना नहीं चाहिए गेट के सामने, समझा” और गाड़ी आगे बढ़ गयी।

“भागो यहाँ से, कोई पानी वानी नहीं है, यहाँ क्या धर्मशाला है?” चौकीदार ने पास रखा डंडा उठा लिया।

सहमी सी झुमकी भाई का हाथ पकड़ के तेज़ कदमों से सड़क की तरफ दौड़ पड़ी।

“पागल तेरे चक्कर में आज डंडे पड़ जाते और तू बोल रही थी पानी पिलाएगा” रघु हाँफते हुए बोला।

बेचारी झुमकी समझ ही नहीं पा रही थी कि जिस साहब जी ने दो दिन पहले ही माता वाले दिन पैर छूकर खाने को हलवा पूरी दिया था, आज पानी मांगने पर इतनी बुरी तरह से क्यों भगा दिया।

 

पाखंड स्वार्थ और दोहरे मापदंड समाज की बदसूरत सच्चाई है |

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