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Radha Gupta Patwari

Abstract

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Radha Gupta Patwari

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घर कैद

घर कैद

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आज फिर स्वच्छंद उड़ रहें हैं परिंदे

शायद उनकी आजादी का दिन है।

बाघ शहरों में निडर यूँ बिचर रहे,

मानों शहरों में मंगल का दिन हो।

कल कल करती समीर बह रही,

निर्मल जल भी अब इतराता है।

प्रकृति भी खुश रहती है ऐसी,

घूंघरू बांध नाच रही हो जैसी।

पर्यावरण का तो कहना ही क्या,

हरा-भरा हो रहा बिन सावन के।

साफ शब्दों में कह रहे जीव-जंतु,

पर्यावरण हम मनुष्य ने बिगाड़ा है।

रहने का अधिकार नहीं है हमको,

यूँ ही घर कैद रहो हो स्वार्थी सब ।



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