जिंदगी की डगर
जिंदगी की डगर
जिंदगी की ये डगर
होगी इतनी खूबसूरत कभी
होगी इतनी वीरान भी कभी
यह न जाना था।
कभी पाया इसे
घने पेड़ों की छाँव तले
कभी तरस ही गये
किसी हमराही के लिये।
यह जीवन क्यों है
धूप-छाँव की दौड़
यह न पढ़ा कभी किताबों में
यह नहीं जान सके किसी से।
यह अनुभव तो होगा
रफ्ता रफ्ता
खुद ही जीकर
इस पहेली को सुलझाना होगा।
इसलिए जिये जाओ
इस सफर को हँसते हँसते
रफ्ता रफ्ता।
