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हरि शंकर गोयल "श्री हरि"

Romance Classics Inspirational

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हरि शंकर गोयल "श्री हरि"

Romance Classics Inspirational

ययाति और देवयानी (भाग-77)

ययाति और देवयानी (भाग-77)

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शर्मिष्ठा ने अपने पिता और माता की जो शारीरिक और मानसिक स्थिति देखी तो वह दंग रह गई। जैसे किसी नगर सेठ को डाकू लूट लें तो जो उसकी स्थिति होती है, किसी सुहागिन स्त्री के सामने उसके पति की हत्या कर दी जाये, किसी "सौन्दर्या" का उसके माता पिता के सम्मुख बलात्कार किया जाये तो जो उसकी स्थिति होती है वही स्थिति महाराज वृषपर्वा और महारानी प्रियंवदा की हो रही थी। जैसे यमराज ने उनके शरीर से सारी शक्ति निकाल ली हो, बस प्राण छोड़ दिये हों।

महाराज और महारानी निश्चेष्ट पड़े हुए थे पलंग पर। उनकी आंखों से आंसू नहीं बह रहे थे अपितु आंसू उनके गालों पर सूख गये थे। आंसू भी कहां तक आते बेचारे ? उनकी भी तो कोई सीमा होगी ? बेचारे आंसू ! बहते बहते थक गये थे इसलिए गालों पर पड़े पड़े ही विश्राम करने लग गये और वायु का साथ पाकर वहीं पर ही सूख गये। पलकें झपकना भूल गईं इसलिए खुली की खुली रह गईं। ओंठ इतने कांपे कि उन पर पपड़ी पड़ गई। तालू सूखकर अकालग्रस्त तालाब की तरह हो गया था। जिव्हा बोलना भूल गई। केश वेदना से अस्त व्यस्त हो गये। वस्त्रों की कोई सुधि नहीं रही। दोनों मरणासन्न स्थिति में पहुंच गये। वैद्यजी उनकी लगातार सेवा कर रहे थे फिर भी वे कुछ कहने की स्थिति में नहीं थे। उनकी आंखें ऊपर छत को देखती हुई स्थिर हो गई थीं।

शर्मिष्ठा ने जब वैद्य जी से पूछा कि उन्हें क्या हुआ है तो वैद्य जी कहने लगे "महाराज और महारानी जी को गहरा आघात लगा है राजकुमारी जी। किसी की कोई बात इन दोनों के दिलों में ऐसी अटकी है जो बाहर निकलने का नाम नहीं ले रही है। जब तक उस बात का पता नहीं लग जाता और उसे इनके मन मस्तिष्क से निकाल नहीं दिया जाता, तब तक ये इसी स्थिति में रहेंगे। वह बात इनको तब तक विचलित करती रहेगी जब तक वह इनके मन में रहेगी। इसलिए अब आप ही उस बात का पता लगा सकती हैं राजकुमारी जी"। वैद्य जी ने अपने हाथ खड़े कर दिये थे।

शर्मिष्ठा को अभी राज काज का कोई अनुभव नहीं था। लेकिन सिंह शावकों को शिकार करने का कोई प्रशिक्षण नहीं दिया जाता है। वे अपने माता पिता को देख देखकर ही शिकार करना सीख जाते हैं। शर्मिष्ठा ने भी अपने माता पिता को राज काज पर चर्चा करते हुए अनेक बार देखा था इसलिए वह विचार करने लगी।

"पिता श्री और माते शुक्राचार्य को मनाने के लिए गये थे। जब वे गये थे तब बिल्कुल स्वस्थ थे। जबसे आये हैं मरणासन्न अवस्था में लेटे हुए हैं। इसका अर्थ है कि शुक्राचार्य के साथ अवश्य ही उन दोनों में कोई ऐसी बात हुई है जिसका आघात इतना गहरा लगा है कि ये विक्षिप्तों की तरह व्यवहार कर रहे हैं। अब इस बात का पता लगाना होगा कि वहां पर बात क्या हुई थी ? पर इसका पता कैसे लगाया जाये ? हां, याद आया, सारथि काका को शायद कुछ पता हो" ? उसमें एक ऊर्जा सी आ गई।

शर्मिष्ठा ने सारथि को बुलवाया। वह दौड़ा दौड़ा आया और शर्मिष्ठा के सम्मुख हाथ जोड़कर खड़ा हो गया।

"सुमरथ काका ! आप महाराज और महारानी जी को कहां लेकर गये थे" ? 

"उन्हें शुक्राचार्य के पास लेकर गया था राजकुमारी जी"।

"वहां पर क्या बातें हुईं" ? 

"ये तो मुझे पता नहीं। महाराज ने मुझे वहां से चले जाने को बोल दिया था इसलिए मैं वहां नहीं था। मुझे ज्ञात नहीं है कि वहां क्या हुआ था, राजकुमारी जी"।

शर्मिष्ठा सोचे में पड़ गई कि अब वह किससे पूछे ? कुछ सोचने के बाद उसे कुछ याद आया और उसने एक सेविका को महामात्यासर्प को बुलवाने के लिए भेज दिया। थोड़ी देर में महामात्यासर्प आ गये। शर्मिष्ठा ने उन्हें महाराज और महारानी की स्थिति के बारे में बताया तो महामात्यासर्प बोले 

"मुझे ज्ञात है राजकुमारी जी"।

महामात्यासर्प की बातें सुनकर शर्मिष्ठा चौंकी "इन्हें कैसे पता हुआ महाराज और महारानी की हालत के बारे में" ? उसने पूछ लिया "आपको कैसे पता महामात्यासर्प जी" ? 

"हमारा तो कार्य ही गुप्तचरी का है इसलिए हमें हरेक घटना का पता रहता है। हमने ही राज वैद्य को भेजा था महाराज और महारानी के उपचार के लिए"। मुस्कुराते हुए वे बोले।

"फिर तो आपको ये भी पता होगा कि महाराज और शुक्राचार्य के बीच में क्या क्या बातें हुईं थीं" ? शर्मिष्ठा ने अधीरता से पूछा।

महामात्यासर्प ने कुछ नहीं कहा। वे चुपचाप ही बैठे रहे। उनकी चुप्पी शर्मिष्ठी की अधीरता बढाने वाली थी। शर्मिष्ठा उनके और पास आकर बोली "कहिये न महामात्यासर्प जी, शुक्राचार्य ने ऐसा क्या कह दिया कि महाराज और महारानी की यह हालत हो गई है ? बताइये ना ? आप चुपचाप क्यों हैं" ? शर्मिष्ठा उन्हें झिंझोड़ते हुए बोली। 

महामात्यासर्प से अब और अधिक सहन नहीं हुआ । वे कहने लगे "सब अनर्थ हो रहा है राजकुमारी जी। पता नहीं ये नियति क्या चाहती है। हरे भरे आंगन में विषबेल उग आई है। अब ये विषबेल सारी हरियाली नष्ट कर देगी। जो नहीं होना चाहिए वो सब होगा। किसको दोष दें ? शुक्राचार्य को, देवयानी को या ... " कहते कहते अचानक चुप हो गए महामात्यासर्प।

"या क्या तात् ? सच सच बताइये कि ये "या" क्या है ? क्या "या" मैं हूं ? शायद इसी कारण महाराज और महारानी को तीव्र आघात लगा है। आप सच सच बताइये कि आचार्य शुक्र ने क्या कहा था" ? शर्मिष्ठा विक्षिप्तों की भांति व्यवहार करने लगी थी।

"शुक्राचार्य ने कहा कि शर्मिष्ठा ने देवयानी के प्रति अपराध किया है इसलिए उसे दंडित होना होगा"। महामात्यासर्प ने धीरे से कहा।

यह सुनकर शर्मिष्ठा स्तब्ध रह गई। यह तो एकतरफा निर्णय है। बिना उसका पक्ष सुने कोई कैसे निर्णय सुना सकता है ? पर निर्णय तो हो चुका है। वह अपराधी ठहरा दी गई है। बस अब तो दंड की मात्रा जानना शेष है। शर्मिष्ठा जैसे निद्रा से जागी और बोली "क्या दंड निर्धारित किया है आचार्य ने मेरे लिए। मैं अपने परिवार की भलाई के लिए वह हंसते हंसते स्वीकार कर लूंगी। बताइये तात् शीघ्र बताइये"। शर्मिष्ठा अधीरता के कारण खड़ी हो गई।

"शुक्राचार्य ने कहा कि शर्मिष्ठा देवयानी की अपराधी है इसलिए दंड देने का अधिकार केवल देवयानी को है"।

यह जानकर शर्मिष्ठा को बड़ी खुशी हुई कि दंड देवयानी ने निर्धारित किया है। वह उत्साहित होकर बोली "मेरी सखी ने मेरे लिये क्या दंड सुनाया है तात् ? यही ना कि एक बार फिर से देवताल में जलक्रीड़ा का आयोजन किया जाये और सभी सखियों को फिर से बुलाकर खूब धमाचौकड़ी मचाई जाये ? क्या यही दंड सुनाया है मेरी देव ने" ? 

शर्मिष्ठा जैसे कल्पना लोक में उड़ने लगी। महामात्यासर्प उसकी खुशी देखकर दुख के सागर में डूब गये। वे सोचने लगे "एक सखि तो ये शर्मिष्ठा है जो निष्पाप है, मासूम है, भोली है, प्यारी है। और दूसरी सखि वह अभिमानी देवयानी है जो ईर्ष्या-द्वेष से पूर्णत: लबरेज है, पाषाण सी कठोर है, परपीड़क है, दर्प से चूर चूर है। कितना अंतर है दोनों सखियों में"।

उनकी आंखों से अश्रु बहने लगे। उनके आंसू देखकर शर्मिष्ठा शंकित हो गई। "तो क्या देवयानी ने सचमुच में कोई दंड सुना दिया है" ? वह सोचने लगी।

"सुनाइये तात, मेरे लिए क्या दंड निश्चित किया है मेरी सखि ने" ? शर्मिष्ठा अपना मन कड़ा करके बोली।

महामात्यासर्प धर्मसंकट में फंस गये। सुनायें या नहीं ? दंड सुनने पर शर्मिष्ठा न जाने क्या कर बैठे ? इस बात का भी डर था। वे कहने लगे "दंड सुनाने से पहले देवयानी ने महाराज से वचन लिया था"।

"वचन ! कैसा वचन" ? शर्मिष्ठा को नई बात पता लगी।

"यही कि दंड का पालन वे अवश्य करवायेंगे"। महामात्यासर्प ने नजरें नीचे करते हुए कहा।

"क्या देव को मुझ पर विश्वास नहीं था" ? शर्मिष्ठा का चेहरा कठोर हो गया था।

शर्मिष्ठा की बात पर महामात्यासर्प क्या कहते ? यदि देवयानी को विश्वास ही होता तो फिर वह महाराज से वचन क्यों लेती ? पर यह बात वह अपने मुख से नहीं कह सकते थे। महामात्यासर्प को चुप देखकर शर्मिष्ठा कहने लगी 

"पिता श्री ने वचन दे दिया होगा तात् ! फिर क्या हुआ" ? 

महामात्यासर्प के पास दंड की मात्रा बताने के अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प नहीं था। वे कहने लगे "देवयानी ने कहा है कि आपको आजीवन उसकी दासी बनकर रहना होगा"।

शर्मिष्ठा को ये वाक्य सुनकर ऐसा लगा जैसे उसके चारों ओर एक साथ कई ज्वालामुखी फट पड़े हों।


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