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हरि शंकर गोयल "श्री हरि"

Romance Classics Inspirational

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हरि शंकर गोयल "श्री हरि"

Romance Classics Inspirational

ययाति और देवयानी (भाग-67)

ययाति और देवयानी (भाग-67)

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ययाति को आश्चर्य हुआ कि देवयानी शुक्राचार्य की पुत्री है और वह कुंए में गिरी पड़ी है। दैत्य राज वृषपर्वा के गुरू शुक्राचार्य की पुत्री एक निर्जन स्थान पर निर्वस्त्र कुंए में कैसे गिर सकती है ? यह बात ययाति को समझ में नहीं आ रही थी। उसकी इस मानसिक दशा को देखकर देवयानी कहने लगी 

"संभवत: सम्राट सोच रहे हैं कि मैं इस कुंए में कैसे गिर गई ? क्यों यही सोच रहे हैं न सम्राट" ? देवयानी अपने नयन तिरछे करते हुए उनमें मादकता घोलते हुए एक मोहक मुस्कान बिखेर कर बोली। इससे ययाति चौंक गया और बोला 

"प्रतीत होता है कि आपको दूसरों के हृदयों को पढ़ना भली भांति आता है तभी तो आपने मेरे हृदय के भाव पढ़ लिये हैं। मैं वास्तव में यही सोच रहा था किन्तु पूछने का साहस नहीं जुटा पा रहा था"। ययाति देवयानी के तिरछे नयनों के घातक वार से घायल होकर मुस्कुराते हुए बोला। "वैसे एक बात और है मेरे मन में"। ययाति सकुचाते हुए बोला। 

देवयानी ने एक गहरी दृष्टि ययाति पर डाली जैसे वह ययाति की आंखों के रास्ते उसके हृदय में उतर कर उसकी थाह ले रही हो। जब उसने ययाति के हृदय की गहराई में उतर कर उसके मन की बात जान ली तो वह लजा गई और गर्दन नीची करके खड़ी हो गई। 

ययाति को उसकी यह भंगिमा बहुत पसंद आई। पानी से भीगा हुआ उसका बदन कमल के पुष्प सा चिकना प्रतीत हो रहा था। जिस प्रकार कमल पुष्प पर जल की एक भी बूंद नहीं ठहरती है , उसी प्रकार उसके बदन से पानी की बूंदें ऐसे फिसल रही थीं जैसे बड़े बड़े तपस्वियों का मन मेनका, उर्वशी जैसी देवांगनाओं को देखकर फिसलता है। गीले बदन पर ययाति का दिया हुआ उत्तरीय लिपटा हुआ था जो पानी में भीगकर देवयानी के बदन से लिपटा हुआ था जिसमें से देवयानी के सुडौल वक्ष स्पष्ट दिखाई दे रहे थे। बेचारे उत्तरीय में इतनी ताकत कहां जो देवयानी के उन्नत उरोजों को अपने वश में कर ले ! जिस प्रकार उन्नत चोटी प्राकृतिक आवरण का सीना फाड़कर निकल आती है उसी प्रकार देवयानी के कुच भी उत्तरीय से बाहर निकल कर अपने अस्तित्व का अहसास करा रहे थे। जगह जगह से उसका सौन्दर्य उत्तरीय की पकड़ से बाहर निकल कर ययाति को ऐसे रिझा रहा था जैसे मेरूतुंग मेघों को अपनी ओर आकृष्ट करते हैं। इसी प्रकार विशाल नितम्ब भी उत्तरीय की कैद से छूटने को लालायित हो रहे थे। ययाति देवयानी के मदमस्त सौन्दर्य की घाटियों में विचरण करने लगा था। देवयानी ययाति के द्वारा अपने बदन को इस प्रकार निहारते हुए देखकर आत्म मुग्ध हो गई और उसे अपने सौन्दर्य पर गर्व होने लगा। जिस ययाति को एक अप्सरा नहीं रिझा सकी उसे एक नारी ने मंत्र मुग्ध कर दिया। देवयानी का सौन्दर्य था ही ऐसा। पुरुष एक भ्रमर की भांति उस पर मंडराने को विवश हो ही जाता था। देवयानी ययाति की लोभी निगाहों को ताड़ गई और उसने उसकी दृष्टि पर ब्रेक लगाते हुए कहा 

"लगता है कि सम्राट यह सोच रहे हैं कि मैं इस प्राकृतिक अवस्था में कुंए में क्या कर रही थी" ? लजाते हुए देवयानी ने उत्तरीय को कसकर अपने बदन से लपेटते हुए कहा। 

"अरे, आप तो सचमुच अंतर्यामी निकलीं। आपने तो मेरे मन की थाह पा ली है। अब मुझे आपसे सावधान रहना पड़ेगा क्योंकि आप तो मन की हर बात पता कर लेती हैं"। हंसते हुए और विनोद करते हुए ययाति ने कहा। 

"हां, सावधान तो रहना ही होगा आपको। मैं पुरुषों का मन बहुत अच्छे से पढ़ना जानती हूं। वैसे भी स्त्रियां पुरुषों के मन को पढना बहुत अच्छी तरह जानती हैं पर पुरुष स्त्रियों का मन कभी नहीं पढ पाते हैं"। देवयानी भौंहों का कुशलता पूर्वक संचालन करते हुए तीखा कटाक्ष करते हुए बोली। यद्यपि उसकी बात सही थी किन्तु पुरुष इसे स्वीकार कैसे कर लेता ? उसे श्रेष्ठ होने का दंभ जो है। इसीलिये ययाति ने पूछा 

"ऐसा क्यों होता है देवि" ? 

"सच बात तो यह है कि स्त्रियों का मन एक विशाल सागर की तरह होता है। जिस तरह सागर में अनेक रत्न छिपे हुए होते हैं ऐसे ही स्त्रियों के मन में भी अनेक रहस्य छिपे हुए होते हैं। जैसे पुरुष अपने पुराने प्रेम का प्रदर्शन अपनी पत्नी के समक्ष कर देता है किन्तु एक पत्नी अपने पुराने प्रेम का प्रदर्शन जीवन में कभी किसी के समक्ष कभी नहीं करती है" 

कहते कहते अचानक देवयानी को कच की याद आ गई। देवयानी ने कच से प्रेम किया था किन्तु उसने यह बात अब तक ययाति से छुपाकर रखी थी और उसने तय कर लिया था कि अपने जीवन में कभी इस रहस्य का उद्घाटन नहीं करना है, चाहे कुछ भी हो जाये। क्योंकि कोई भी पुरुष स्वयं चाहे जितनी स्त्रियों से प्रेम कर ले लेकिन वह अपनी पत्नी से यही अपेक्षा करता है कि उसके मन में किसी अन्य पुरुष के लिए कोई स्थान न हो। वैसे भी स्त्री के मन में इतनी जगह होती है कि वह अपने पति के पुराने प्रेम को वहां आराम से रख सकती है पर पुरुष का मन बहुत छोटा होता है। वहां पर अपनी पत्नी के पुराने प्रेम को रखने की रत्ती भर भी जगह नहीं होती है। 

"आपने बताया नहीं कि आप अनावृत अवस्था में इस कुंए में कैसे गिर गईं" ? ययाति ने बात को वापस वहीं मोड़ दिया जहां पर यह आकर रुक गई थी। 

"ओह ! वह बात बड़ी विचित्र है। आप उस पर विश्वास नहीं कर पायेंगे" ? देवयानी चौंकते हुए बोली।

"अजी, आप हमारी परीक्षा मत लीजिए। हम बहुत सी परीक्षाऐं उत्तीर्ण कर चुके हैं। आप कहकर तो देखिये, फिर तय कीजियेगा कि हम विश्वास कर पायेंगे या नहीं" ? ययाति देवयानी को प्रोत्साहित करते हुए बोला। 

थोड़ी देर तक देवयानी सोचती रही कि वह सारी बातें बताये या नहीं ? उसने सोचा कि कच से संबंधित समस्त बातों को छोड़कर शेष बातें बताने में कोई समस्या नहीं है अत: वह अपना भूतकाल बताने लगी। 


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