सफेद खून (भाग 1)
सफेद खून (भाग 1)
#कहानी - सफेद खून ( भाग 1)
(सूना बचपन और टूटी हुई साइकिल)
मैं यामिनी, जब मैं पैदा हुई तो शायद मानो मुझे लगा की मैं पहली ऐसी बच्ची हूं जिसके पैदा होने की खुशी किसी को नही थी, मेरा 1 बड़ा भाई और 1 बड़ी बहन थी, मेरे पिता की आर्थिक स्थिति कमजोर थी, पर उनको कोई फर्क नहीं पड़ा था की अब तीसरा बच्चा हो गया था, क्योंकि उनको पीने की आदत थी तो उनको तो वैसे भी कोई फर्क पड़ना भी नही था, उनको सिर्फ अपने से प्यार था, हर रोज़ घर में कलेश करना और मां को मारना,
रही बात मेरी मां की तो हर मां के लिए उनके बच्चे एक बराबर ही होते है, जब मैं पैदा हुई तो मेरे मामा जी को बहुत गुस्सा आया अपनी बहन पे,
मामा जी ने कहा की इनकी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है तो तीसरा बच्चा करने की क्या जरूरत थी, उनका कहना भी ठीक था, इतनी महंगाई में 1 बच्चा ही पाल लो वो भी गनीमत है! खैर मामा जी ने यामिनी को गोद तक नहीं लिया और गुस्से से बिना देखे ही हॉस्पिटल से चले गए, लेकिन मेरी मां बहुत खुश थी, उन्होंने मुझे बहुत लाड़ से पाला, और जितना हो सका मेरी हर ख्वाहिश पूरी भी की,
जैसे जैसे मैं बड़ी हुई तो मैं भी और बच्चों की तरह साइकिल की जिद्द ले बैठी, लेकिन मेरी मां के पास इतने पैसे नहीं थे की वो मुझे एक साइकिल दिला सके, और पिता जी तो बस पीने में लगे रहते थे, उन्हें कोई फर्क भी नहीं पड़ता था की मेरे बच्चों ने खाना खाया भी है या नहीं, इस दुनिया में पहला ही बाप होगा जो बच्चों को देखता तक नहीं था,
एक दिन मेरी मां ने हिम्मत कर के पिता जी से कहा की बच्चों की छुट्टियां हो गई है मैं सोच रही हूं की अपने मायके हो आऊँ, और पिताजी ने इजाज़त दे दी,
उस दिन हम सब बहुत खुश हुए, क्युकी नानी के घर जाने की जो खुशी होती है वो तो सब जानते ही होंगे, वहाँ मैंने नाना नानी, मामा मामी, मामा के बच्चों के साथ खूब मजे किए, उनके साथ खूब खेली, मानो जैसे मैं अपने घर की परिस्थितियों को भूल चुकी थी, ये भी भूल चुकी थी की कुछ दिन बाद मुझे वापस अपने घर जाना होगा, खेल खेल में इतनी मगन हो गई की सब दुख भूल बैठी, एक दिन मैं नानी के घर की छत पर गई तो वहाँ मैंने मामा के लड़के की टूटी हुई पुरानी साइकिल देखी, उस साइकिल की गद्दी नहीं थी, लेकिन पता नहीं क्यों मुझे वो साइकिल इतनी अच्छी लगी के मन ऐसे हुआ की मैं इसे अपने साथ ले जाऊं, आखिर कार मैंने अपनी मां को उपर छत पे बुलाया और कहा की मां आप मेरे लिए नई साइकिल नहीं खरीद सकते लेकिन इस साइकिल को तो मामा जी से कह के इसे घर ले जा सकते है, मेरी मां ने कहा की बिटिया ये साइकिल तो टूटी हुई है, मैंने कहा कोई बात नहीं मां, मैं ये साइकिल ऐसे ही चला लूंगी, फिर मां ने मामा जी से कहा की ये साइकिल मैं ले जाऊं, तो उन्होंने इजाज़त दे दी, क्युकी वो यामिनी को पसंद नहीं करते थे, तो उसको नई साइकिल नहीं दिलाना चाहते थे,
फिर भी मेरी खुशी का ठिकाना ही नहीं था, मानो जैसे मुझे कोई कीमती चीज मिल गई हो, छुट्टियां
खत्म होने को आ गई और हम वापस अपने घर आ गए, मैंने मां से कहा मां में इस साइकिल को चलाना चाहती हूँ, मेरी मां ने उस साइकिल की गद्दी की जगह एक लकड़ी का फट्टा लगा दिया और उसपर कपड़ा सिल दिया, और वो मेरे बैठने लायक हो गई,
मैंने उस साइकिल को अच्छी तरह चमका कर साइकिल चलाना शुरू ही किया था की तभी मेरे पिता जी आ गए
और पिताजी पूछने लगे ये साइकिल किस की है
मेरी मां ने बोला इसके मामा के लड़के की, मेरे मायके में ये बेकार ही पड़ी थी तो ये जिद्द करके यहाँ ले आई, उस दिन मेरे पिता जी का मूड बहुत खराब था, क्युकी उनके पास पीने के लिए पैसे नहीं थे, उन्होंने मुझे उस साइकिल से उतारा और मेरी साइकिल किसी कबाड़ी को बेच आए, उस साइकिल को बेच के इतने पैसे उन्हें मिल ही गए थे के उनके पीने के पैसे तो पूरे हो गए, लेकिन मेरी खुशी दुख में बदल गई,
आगे की कहानी आपको (भाग 2)में पढ़ने को मिलेगी,
आपको यह कहानी कैसे लगी, please comment करके जरूर बताएं, क्युकी यह कहानी कोई कहानी नहीं एक बच्ची की सच्ची घटना है
क्रमशः
