STORYMIRROR

GAURI SINGH

Tragedy

4  

GAURI SINGH

Tragedy

सफेद खून ( भाग 3)

सफेद खून ( भाग 3)

6 mins
16


आपने भाग 2 में पढ़ा था, कि मेरे बचपन के समय में कितनी मुसीबत आई, और अब मेरे पिताजी का भी देहांत हो गया, लेकिन मुसीबतें तो अभी और भी आनी बाकी थी.


अब आगे______


मेरे पिताजी के देहांत के बाद हमारा और कोई सहारा नही था, मेरी मां और हम बच्चे भी अपने आप को बहुत अकेला महसूस कर रहे थे, मां को तो कुछ भी समझ नहीं आ रहा था कि अब उनका और उनके बच्चो का क्या होगा, जब मेरे पिताजी का देहांत हुआ तो मैं सिर्फ 9 साल की थी।


इतनी उम्र में ही मैंने बहुत कुछ देख लिया था, कई लोगो ने मां को दूसरी शादी करने की सलाह भी दी, लेकिन मेरी मां ने मना कर दिया और कहा की अब बच्चे बड़े हो चुके है, मैं दूसरी शादी नही करना चाहती, मैं खुद ही अपने बच्चो को पाल लूंगी, पहले इनके पिताजी के रहते हुए भी तो मैं ही पाल रही थी, फिर मेरी दादी ने कहा की बच्चे अभी छोटे है तुम सब हमारे साथ चलो, मेरी मां को और कुछ समझ नहीं आ रहा था, तो मां ने अपने ससुराल जाना ही ठीक समझा, मेरे दादा और दादी तो अच्छे थे, लेकिन मेरी उन 4 बुआओं के आगे उनकी भी नही चलती थी, मेरी सभी बुआएं बहुत तेज थी, 2 बुआओं ने तो शादी ही नही करी थी इस लिए वो मायके में ही रहती थी और 2 बुआ तलाक लेके मायके में ही रहती थी।


कुछ दिन तो सब बहुत अच्छे से पेश आए, लेकिन जैसे जैसे समय बीतता गया, उन्होंने भी अपने रंग दिखाने शुरू कर दिए, मेरी दादी का परिवार बहुत बड़ा था, तकरीबन 15 - 16 लोग एक साथ ही रहते थे, उन्होंने मेरी मां को नौकरानी की तरह काम में लगा दिया, सुबह 6 बजे उठना और घर के सभी काम खुद अकेले ही करना, एक दिन हमारी पड़ोस की आंटी आई और उन्होंने मां से कहा की तुम अकेले ही सारा काम करती हो, कभी आराम भी कर लिया करो, तब मेरी मां ने बोला मैं जान बूझ कर ही काम में लगी रहती हु, ताकि मैं पुरानी बातो को याद न कर पाऊं, इतना सब कुछ होने के कारण हम तीनो भाई बहनों का पढ़ाई में भी बहुत असर पड़ा, मां ने बुआ और चाचा से कह कर हमे स्कूल में दाखिला दिलवा दिया, मैं उस समय पांचवी कक्षा में थी।


एक दिन जब मैं स्कूल से आई मेरी मां सीढ़ीयो पर से बेहोश हो कर गिर गई, और उनका सिर फट गया, जैसे तैसे करके उनका इलाज करवाया और डॉक्टर ने कुछ दिन आराम करने को कहा, फिर क्या था, मेरी बुआ ने कहा की हमसे किसी की सेवा नही होती, उनका एक घर और भी था तो मेरी मां को दूसरे घर की बालकनी में बिस्तर लगा कर वहा छोड़ आए, और तो और मुझे अपनी मां से मिलने तक नही देते थे, कहते थे उधर बालकनी छोटी है सब वहा नही रह सकते थे, मां वहां अकेले ही बालकनी में पड़ी रहती, मेरी मां जब धीरे धीरे ठीक होने लगी तो मुझे कभी कभी मिलने आ जाती थी, जैसे ही मेरी मां मुझे आवाज लगाती - यामिनी ओ यामिनी देख मैं गई, मेरे आंसू रुकते ही नही थे, मेरे अंदर हिम्मत नही होती थी के मैं अपनी मां से मिलु क्योंकि वो मुझसे कुछ देर के लिए ही मिलने आई है, वो फिर मुझे अकेला छोड़ जाएंगी, इसी डर से मैं बाथरूम मैं अपने आप को लॉक कर लेती थी, 


और जब तक वो चली नही जाती थी मैं बाहर नही आती थी, क्युकी मेरी सभी बुआ और चाचा उनके जाने के बाद मुझे मारने लगते थे, और कहते कैसे मिली तू अपनी मां से, साथ के साथ वो मेरी चोटी खींचते और दुबारा न मिलने को कहते, उस टाइम हम तीनो भाई बहनों को अलग कर दिया था, भाई मां के पास रहता था, मेरी बहन को दादी की सेवा में लगा दिया, और मुझे घर के छोटे मोटे कामो में, और आज मुझे अपनी मां से मिले 3 महीने हो चुके है, आज फिर मेरी मां मुझसे मिलने आई, आज मैं भी हिम्मत कर के उनके पास गई, 


और लिपट कर बहुत रोई, और अपनी मां को जोर से पकड़ लिया और मैंने कहा मुझे भी आपके साथ जाना है, मैं आपके बिना नही रह सकती, मैं खूब जोर जोर से रोई के तभी 1 बुआ आई और बोलने लगी, रो रो के इसने मनहुसियत फैला रखी है, जा लेजा इसे अपने साथ, और मां मुझे अपने साथ उस छोटी सी बालकनी में ले गई जहा वो और मेरा बड़ा भाई रहता थे, तब मेरी कुछ सांस में सांस आई, खाना कम मिला तो भी अब मैं अपनी मां के साथ होने से बहुत ज्यादा खुश थी, 


अब मुझे लगा की चलो कुछ तो मेरी समस्या कम हुई, पर ऐसा अभी कहा मुमकिन था, जिस घर की बालकनी में हम रहते थे, वहा का घर बहुत बड़ा था, टॉयलेट घर के अंदर ही था, वहा 1 टाइम ही टॉयलेट इस्तेमाल कर सकते थे बस, वहा इस घर में मेरे चाचा चाची रहते थे, बुआ ने उनको हिदायत दे रखी थी के इनके लिए बार बार दरवाजा न खोला जाए, और उन्होंने भी ऐसा ही किया, हम सुबह ही सब बाथरूम के काम से फ्री हो जाया करते थे, 


हमारी बुआ ने हमे खाने के कुछ बर्तन दिए थे, ताकि हम खुद ही बना के खा ले, उसमे हमे जान बूझ कर 1 खराब कुकर दिया, जैसे ही हम उसमे कुछ दाल या सब्जी बनाते वो कुकर फट जाता था, 2 - 3 बार तो मां ने उसे ठीक करवाया पर हर बार वो ऐसा ही करता था, एक दिन हमारी नानी हमसे मिलने आई, वो अपने साथ घर का कुछ जरूरी सामान ले आती थी, नानी ने बहुत बार मां से कहा की चलो तुम अब और यहां नही रहोगे, जब तुम्हे कुछ पूछता नही देखता नही तो क्यों अपना और अपने बच्चों का जीवन नरक कर रही है, लेकिन मेरी मां हमेशा मना कर देती थी और कहती थी की अगर मैं आपके साथ गई और मेरी वजह से कभी किसी भईया या भाभी ने आपको बुरा भला कहा या सवाल जवाब किए तो ये भी देखना संभव न होगा और कहीं यहां से हटकर फिर दोबारा यही आना पड़े या ऐसी परिस्थिति हो उससे क्या फायदा. 


क्योंकि कुछ दिन तक तो सब अच्छे रहते हैं पर बाद में सब बदल जाते हैं, आप "मां" हो आपको मेरे दर्द से दर्द जरूर होगा लेकिन किसी दूसरे को नही,, और शायद हर बार ऐसा होना बर्दाश्त ना कर पाऊं, नानी के बहुत कोशिश के बाद भी मां उनके साथ नही गई नानी ने फिर आने का कहकर विश्वास दिलाकर कहा की ईश्वर पर भरोसा रखो सब ठीक होगा और लौट गई, उनका शादी के बाद से हालातों से लड़ते लड़ते विश्वास शब्द में अब विश्वास शायद कम ही बचा था, ये सोचते सोचते हम दोनो को भूख लगी तो हमने खाने के लिए कहा तो उनका ध्यान टूटा तो उन्होंने कुछ खाने के बनाना शुरू किया, हमारा दिन रात भी जैसे फिलहाल उस 4×8 की बालकनी में ही सिमट कर रह गए थे,,


आगे की कहानी भाग 4 में पढ़ें।


Rate this content
Log in

Similar hindi story from Tragedy