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Vivek Mishra

Abstract Classics

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Vivek Mishra

Abstract Classics

वहम

वहम

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किसी वहम में जीना हमें गवारा भी नहीं,
तेरे हिसाब से जीने में मेरा गुज़ारा भी नहीं।

अब किसी ग़ैर से क्या कहें अपने हिज़्र का हाल,
कभी वो भी शरीक-ए-ग़म था,कोई अनजाना भी नहीं।

वो जिसके लिए हमने सारी दुनिया ताक पे रख दी, उसने आज मुझे देखा — और पहचाना भी नहीं।

हमने ज़ख़्म दिखाए थे उसके भरोसे में आकर,
मरहम तो बहुत दूर, वो पास आया भी नहीं।

तन्हाई ने सिखाया है हमें चुप रहने का हुनर,
किसी कम-ज़र्फ़ से अब हमको टकराना भी नहीं।

जो कभी जान से बढ़कर मानते थे हमको,
अब उनके लिए मेरा होना–न–होना भी नहीं।

हमने माना कि बदलते हैं सभी वक़्त के साथ,
पर ये क्या कि मिलने पे मुस्कुराना भी नहीं।
  


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