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Anamika

Horror Romance

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Anamika

Horror Romance

वो जो मर चुकी थी,"एक झलक और मैं दीवाना"

वो जो मर चुकी थी,"एक झलक और मैं दीवाना"

9 mins
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शहर के सबसे भीड़-भाड़ वाले चौराहे पर आरव रोज़ शाम 6 बजे खड़ा होता था। वजह थी उसकी नई नौकरी।

 अमीनाबाद में एक मोबाइल शॉप पर सेल्समैन लगा था वो। 25 साल का लड़का, बी.कॉम पास, पर अच्छी नौकरी नहीं मिली तो फिलहाल मोबाइल बेच रहा था। घर की ज़िम्मेदारी भी थी। उस दिन मंगलवार था।

14 जून।

गर्मी इतनी ज़्यादा थी कि सड़क का तारकोल चमक रहा था। आरव अपनी पुरानी स्प्लेंडर के साइड स्टैंड पर टेक लगाकर माज़ा की बोतल पी रहा था।

सामने रेड लाइट पर गाड़ियां रुकी थीं। तभी वो दिखी। पहली नज़र में आरव के हाथ से माज़ा की बोतल छूटते-छूटते बची।

उसकी आँखें बस सामने सड़क पार कर रही उस लड़की पर जम गई थीं।

 गुलाबी सूट, सफेद दुपट्टा, कानों में छोटे-छोटे झुमके। रंग गेहुआं था, पर उस रंग में ऐसी कशिश थी कि गोरा रंग भी फीका लगे। सबसे खास थे उसके बाल। कमर तक लंबे, हल्के कर्ल वाले, कदम-कदम पर हवा में उड़ रहे थे।

 और आँखें... आँखों में काजल था, पर काजल के नीचे एक अजीब सी उदासी थी। जैसे कोई बहुत पुराना दर्द छुपा हो।

 लड़की ने सड़क पार की और सामने बने "आदर्श बुक डिपो" में घुस गई। आरव वहीं का वहीं खड़ा रह गया। 5 मिनट तक।

जब तक पीछे से किसी गाड़ी के हार्न की आवाज़ से होश नहीं आया। "भाई साइड हो जाओ, जाम लगा रहे हो।" पीछे से एक ऑटो वाला चिल्लाया।

 आरव हड़बड़ा के बाइक साइड में लगा दी। पर दिमाग में बस वही चेहरा घूम रहा था।
 कौन थी वो?
नाम क्या होगा?
 फिर दिखेगी या नहीं?
 क्यों एक झलक में ही दिल अजीब सा हो गया?

 उस रात आरव को नींद नहीं आई। जब भी आँख बंद करता, वही गुलाबी सूट सामने आ जाता। वो चाल, वो बाल, वो आँखें।

25 साल की ज़िंदगी में ऐसा पहली बार हुआ था।
 दूसरा दिन - बुधवार

 आरव आज जानबूझकर 5:30 बजे ही चौराहे पर आ गया। वजह खुद को भी नहीं पता थी।

बस मन कह रहा था कि शायद आज फिर दिख जाए। वो दुकान के बाहर खड़ा होकर कस्टमर का इंतज़ार करने का नाटक कर रहा था।

पर नज़रें बार-बार बुक डिपो के गेट पर जा रही थीं। 6 बज गए। वो नहीं आई। 6:10... नहीं आई। 6:20... आरव का दिल बैठने लगा।

शायद कल बस इत्तेफाक था। रोज़ थोड़ी ना दिखेगी। तभी दूर से वही गुलाबी सूट नज़र आया।

इस बार लड़की के हाथ में एक फाइल थी। वो तेज़ कदमों से चल रही थी। बुक डिपो के सामने से बिना रुके निकल गई और आगे मेडिकल कॉलेज वाली रोड पर मुड़ गई।

 आरव से रहा नहीं गया। उसने दुकान के मालिक से बोला, "भैया 10 मिनट में आया।" और बाइक स्टार्ट करके धीरे-धीरे उसके पीछे चल दिया।

 20-25 मीटर का फासला रखकर। दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। "कहीं पलटकर देख ले और गलत समझ ले तो? कहेगी पीछा कर रहा है।"

 पर लड़की ने एक बार भी पीछे मुड़कर नहीं देखा। वो सीधे मेडिकल कॉलेज के बड़े गेट के अंदर चली गई।

 आरव ने गेट के बाहर बाइक रोक दी। अंदर जाने की हिम्मत नहीं हुई। गार्ड घूर रहा था। 10 मिनट तक वहीं खड़ा रहा। फिर ये सोचकर वापस आ गया कि कल फिर यहीं दिखेगी।

 रात को बिस्तर पर लेटे-लेटे आरव ने तय कर लिया। "जब तक नाम नहीं पता चल जाता, जब तक दो बात नहीं हो जाती, चैन नहीं पड़ेगा।"

 तीसरा दिन - गुरुवार

 आज आरव ने तैयार होने में 20 मिनट ज़्यादा लगाए। नई सफेद शर्ट पहनी। बालों में जेल लगाया। थोड़ा सा डियो भी।

शीशे में खुद को देखकर सोचा - "आज बात करके रहूंगा।" ठीक 6 बजे वो चौराहे पर था।

आज प्लान पक्का था। अगर दिखी तो "एक्सक्यूज़ मी" बोलकर टाइम पूछने के बहाने बात शुरू करूंगा।

 6:05 पर वो आई। आज सफेद कुर्ती और ब्लू जींस में थी। कंधे पर एक कॉलेज बैग टंगा था। कल से भी ज़्यादा अच्छी लग रही थी।

सादगी में भी क्या कयामत ढा रही थी। वो रेड लाइट पर आकर रुकी। आरव की बाइक ठीक उसके बगल में थी। बस 2 फीट का फासला।


आरव के हाथ कांप रहे थे। "बोल आरव बोल... हेलो बोल दे बस।" उसने मुंह खोला ही था कि लाइट ग्रीन हो गई। लड़की फटाफट सड़क पार कर गई। मौका हाथ से निकल गया।

 आरव ने बाइक के हैंडल पर हाथ मारा। "बस... एक सेकंड की देर हो गई।" आज उसने ठान लिया कि पीछा नहीं छोड़ेगा। वो बाइक धीरे-धीरे उसके पीछे ले गया।

 लड़की बुक डिपो में घुसी। 7-8 मिनट बाद बाहर निकली। हाथ में दो नॉवेल थे - "गुनाहों का देवता" और "मुझे चांद चाहिए"। आरव ने देख लिया। "पढ़ने का शौक है इसे।"

 लड़की फिर मेडिकल कॉलेज की तरफ चल दी। आज आरव हिम्मत करके गेट के अंदर तक चला गया। दूर से देखा - वो लाइब्रेरी वाली बिल्डिंग में चली गई।

 "तो कॉलेज में पढ़ती है या जॉब करती है यहाँ।" आरव ने अंदाज़ा लगाया। वापस आकर उसने बुक डिपो वाले भैया से पूछने की कोशिश की। "भैया वो जो लड़की अभी गई है गुलाबी सूट वाली... रोज़ आती है क्या यहाँ?" दुकानदार ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा।

"कौन सी लड़की भाई? यहाँ तो पूरा दिन लड़कियां आती रहती हैं। नाम बताओ।" आरव चुप हो गया। नाम ही तो नहीं पता था।

 चौथा दिन - शुक्रवार

 आज मौसम खराब था। काले बादल थे आसमान में। आरव को लगा आज नहीं आएगी। पर फिर भी वो 6 बजे चौराहे पर पहुंच गया। आदत सी हो गई थी। 6:15 पर बूंदाबांदी शुरू हो गई। तभी सामने से वो आती दिखी।

 आज उसके पास छतरी नहीं थी। सफेद कुर्ती हल्की-हल्की भीग रही थी। वो तेज़ कदमों से बुक डिपो की तरफ जा रही थी, शायद बारिश से बचने।

 आरव से देखा नहीं गया। वो भागकर बगल की दुकान से एक छतरी खरीद लाया।


 फिर हिम्मत जुटाकर लड़की के पास पहुंचा। "एक्सक्यूज़ मी... ये ले लीजिए। आप भीग रही हैं।" लड़की रुकी।

 पहली बार उसने पलटकर आरव को सीधा देखा। उस एक नज़र में आरव को लगा जैसे वक्त रुक गया हो।

इतनी गहरी, इतनी शांत, और इतनी उदास आँखें उसने कभी नहीं देखी थीं। उन आँखों में जैसे कोई समंदर ठहरा हुआ था। "थैंक यू। पर मुझे आदत है भीगने की।"

उसकी आवाज़ बहुत धीमी थी। मानो बोलने की आदत ना हो। न गर्मी थी उस आवाज़ में, न नरमी। बस एक अजीब सी बेरुखी। वो छतरी लिए बिना आगे बढ़ गई और बुक डिपो के शेड के नीचे जाकर खड़ी हो गई।

 आरव का दिल टूट गया। हाथ में छतरी लिए वो वहीं खड़ा भीगता रहा। "इतना एटीट्यूड? एक थैंक यू भी ठीक से नहीं बोला।" उस दिन आरव गुस्से में घर चला गया।

तय कर लिया - "बहुत हो गया। कल से नहीं आऊंगा। कौन है वो? घमंडी कहीं की।"

 पांचवा दिन - शनिवार

 आरव ने कसम खाई थी कि आज चौराहे पर नहीं जाएगा। वो शॉप पर बैठा मन लगाकर काम कर रहा था। एक कस्टमर को नया फोन दिखा रहा था। तभी दुकान के कांच के दरवाज़े से उसकी नज़र सड़क की दूसरी तरफ गई।

 वो खड़ी थी। भीड़ में। और आरव को ही देख रही थी। दोनों की नज़रें मिलीं। सिर्फ 2-3 सेकंड के लिए। पर उन 3 सेकंड में आरव का सारा गुस्सा, सारी कसम, सब कुछ बह गया।

उसकी आँखों में कोई शिकवा नहीं था। बस एक सवाल था। फिर वो पलटकर चली गई। भीड़ में गुम हो गई।

 आरव का फोन दिखाता हाथ रुक गया। कस्टमर पूछ रहा था "भैया ये वाला कैमरा कैसा है?" पर आरव का दिमाग कहीं और था। "भैया... भैया!" कस्टमर ने हिलाया। "हां हां... सॉरी। ये लीजिए, बहुत अच्छा कैमरा है।"

आरव ने जबरदस्ती ध्यान लगाया। पर दिल जान चुका था - वो लड़की उसे इग्नोर नहीं कर रही। वो कुछ कहना चाहती है। पर कह नहीं पा रही।

 छठा दिन - रविवार

 संडे था। शॉप बंद थी। आरव का घर पर मन नहीं लग रहा था। सुबह 10 बजे वो नहा-धोकर तैयार हो गया।

 माँ ने पूछा "कहाँ जा रहा है छुट्टी वाले दिन?" "बस दोस्त से मिलना है माँ।" झूठ बोलकर वो बाइक लेकर चौराहे पर पहुंच गया।

 धूप बहुत तेज़ थी। 11 बज गए। 12 बज गए। कोई नहीं आया। आरव खुद पर हंस रहा था। "पागल हो गया हूँ मैं। संडे को कौन आएगा।" 1 बजे उसने हार मान ली। बाइक स्टार्ट करने लगा घर जाने के लिए।

तभी पीछे से किसी की आवाज़ आई। "एक्सक्यूज़ मी..." आरव का हाथ किक पर ही रुक गया। ये आवाज़... ये वही आवाज़ थी। उसने धीरे से पलटकर देखा। वो खड़ी थी।

 आज हल्के पीले रंग के सूट में। माथे पर पसीने की बूंदें थीं। चेहरे पर परेशानी साफ दिख रही थी। "लिफ्ट मिल जाएगी क्या? मेरी बस निकल गई। चारबाग जाना है। बहुत ज़रूरी इंटरव्यू है 2 बजे। और ऑटो वाले बहुत ज़्यादा पैसे मांग रहे हैं।"

 6 दिन की तपस्या, 6 दिन का इंतज़ार, 6 दिन की दीवानगी... आज सफल हो गई थी। पहली बार उसने खुद आरव से बात की थी। मदद मांगी थी।

 आरव के चेहरे पर बिना चाहे मुस्कान आ गई। "हाँ... हाँ क्यों नहीं। बैठिए आप। चारबाग ही ना?" अनाया जल्दी से बाइक पर पीछे बैठ गई। उसने आरव की शर्ट का किनारा हल्के से पकड़ लिया।

 बाइक चली। आरव की पीठ पर जहाँ अनाया का हाथ लगा था, वहाँ अजीब सी सिहरन हो रही थी।

पहली बार वो उसके इतने करीब थी। उसके बालों से बहुत अच्छी हल्की हल्की खुशबू आ रही थी। "थैंक यू सो मच। आप नहीं होते तो मेरा इंटरव्यू छूट जाता। बहुत ज़रूरी था मेरे लिए।"

अनाया की आवाज़ में अब वो बेरुखी नहीं थी। फिक्र थी, एहसान था। "कोई बात नहीं। वैसे आपका नाम क्या है?" आरव ने हिम्मत करके पूछा।

रियर व्यू मिरर में से उसने देखा - अनाया की आँखें झुकी हुई थीं। "अनाया। अनाया वर्मा।"

 नाम सुनते ही आरव के दिल ने एक बीट स्किप कर दी। "अनाया... कितना प्यारा नाम है।" "और आपका?" अनाया ने पूछा। "मैं आरव। आरव शर्मा।"

 चारबाग आ गया। एक बड़ी बिल्डिंग के सामने अनाया उतर गई। वो पर्स खोलने लगी। "कितने पैसे हुए आपके?" आरव हंस पड़ा। "कैसे पैसे? हम दोस्त हैं अब। दोस्तों से पैसे नहीं लेते।

जाइए इंटरव्यू दीजिए ऑल द बेस्ट।" अनाया ने पहली बार जी भर के आरव को देखा। उस देखने में थैंक्यू था, और कुछ ऐसा भी था जो आरव समझ नहीं पाया।

एक अजीब सी कशमकश। "तो फिर एक चाय उधार रही आप पर। इंटरव्यू के बाद यहीं मिलते हैं। ठीक है?" अनाया ने कहा। "पक्का प्रॉमिस? छोड़कर नहीं जाओगी ना?" आरव ने बच्चों की तरह पूछा।

 अनाया के होंठों पर पहली बार हल्की सी मुस्कान आई। "पक्का प्रॉमिस।" कहकर वो बिल्डिंग के अंदर भाग गई। आरव वहीं खड़ा रह गया। बाइक का हैंडल पकड़े हुए।

6 दिन में पहली बार उसे लगा कि ज़िंदगी में कुछ अच्छा होने वाला है। उसे क्या पता था कि ये "चाय की उधारी" उसकी ज़िंदगी बदल देने वाली है।

कि अनाया वर्मा नाम की ये खूबसूरत, उदास लड़की एक ऐसा राज़ लेकर घूम रही है जो आरव के होश उड़ा देगा।

कि मोहब्बत की ये कहानी कब्र तक जाएगी... बल्कि कब्र के बाद भी चलेगी। पर अभी तो बस एक नई शुरुआत थी। एक लड़का और एक लड़की। एक बाइक और एक उधार की चाय। 

क्या होगा इन दोनों की कहानी में आगे जानने के लिए मुझे फॉलों करें।


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