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Anamika

Horror

4.5  

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पीपल की डायन

पीपल की डायन

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मेरा नाम अनामिका है. मैं उदयपुर के पास धामपुर में रहती हूं. ये कहानी मेरी नहीं है. ये उस लड़की की है जो अब इस दुनिया में नहीं है. उसका नाम था कोमल. कोमल मेरी सहेली थी. 12वीं में साथ पढ़ते थे. 2024 की बात है. जून की गर्मी. कोमल को लिखने का बहुत शौक था. डायरी में रोज भूतों की कहानी लिखती थी. एक दिन उसने मुझे बताया. "अनामिका, हमारे गांव के बाहर जो पुराना पीपल है न, उसके बारे में लिख रही हूं. सुना है वहां एक डायन रहती है. 100 साल पुरानी." मैं हंस दी. "पागल है क्या. डायन-वायन कुछ नहीं होती." कोमल बोली, "होती है. मेरी दादी ने देखी थी. काले कपड़े, लंबे नाखून, उल्टे पैर. जो भी रात को 12 बजे पीपल के नीचे से निकलता है, उसे वो पकड़ लेती है. फिर उसकी कहानी अधूरी रह जाती है." मुझे डर नहीं लगा. पर कोमल को लगा. वो रोज रात को 11 बजे उस पीपल के पास जाती थी. कहती थी, "डायन को देखूंगी. फिर असली कहानी लिखूंगी. फेमस हो जाऊंगी." मैंने मना किया. "मत जा कोमल. मम्मी डांटेगी." वो बोली, "एक दिन बस. आज अमावस्या है. डायन आज जरूर निकलेगी." 7 जून 2024. अमावस्या की रात. 11:45 बजे. कोमल का फोन आया. उसकी आवाज कांप रही थी. "अनामिका... वो... वो सच में है. मैं पीपल के नीचे हूं. वो मेरे पीछे खड़ी है. काले कपड़े... उल्टे पैर... वो हंस रही है." फिर फोन कट गया. मैं भागी. मम्मी-पापा को उठाया. गांव वाले इकट्ठे हुए. टॉर्च लेकर पीपल के पास पहुंचे. कोमल वहां नहीं थी. सिर्फ उसकी डायरी पड़ी थी. खुली हुई. आखिरी पन्ने पर खून से लिखा था: "डायन मिली. पर कहानी पूरी नहीं कर पाई. वो कहती है, अब तुम पूरी करना." पुलिस आई. खोजा. कोमल नहीं मिली. आज तक नहीं मिली. 2 साल हो गए. पर कहानी यहीं खत्म नहीं होती. कोमल के जाने के 13 दिन बाद रात को 2 बजे मेरे फोन पर मैसेज आया. अनजान नंबर. लिखा था: "कहानी पूरी करो. पीपल के नीचे आओ. रात 12 बजे. अकेले. वरना अगला नंबर तुम्हारा." मैं कांप गई. पापा को दिखाया. नंबर बंद था. पुलिस ने कहा Fake है. पर अगले दिन रात 12 बजे मेरे घर के बाहर किसी के हंसने की आवाज आई. औरत की आवाज. फिर दरवाजे पर खरोंचने की आवाज. सुबह देखा तो दरवाजे पर लिखा था: "कच्ची कलम - 13 दिन बाकी" मैं समझ गई. डायन को कहानी चाहिए. पूरी कहानी. कोमल की अधूरी कहानी. मैंने कोमल की डायरी पढ़ी. 50 पन्ने. सब डरावनी कहानियां. आखिरी कहानी का नाम था "कच्ची कलम". उसमें लिखा था: "गांव में एक लड़की थी. उसे लिखने का शौक था. डायन ने उसे कहा, मेरे बारे में लिख. पर लड़की ने झूठ लिख दिया. डायन गुस्सा हो गई. उसने कहा, अब जो भी मेरी कहानी झूठी लिखेगा, मैं उसकी कहानी का आखिरी पन्ना खून से लिखूंगी. और वो पन्ना हमेशा कच्चा रह जाएगा." मैं डर गई. कोमल ने डायन के बारे में झूठ लिखा था? मैं अगले दिन पीपल के पास गई. दिन में. वहां एक बूढ़ी औरत मिली. वो बोली, "कोमल को जानती हो?" मैंने हां कहा. बूढ़ी बोली, "वो मेरी पोती थी. पर वो डायन नहीं थी. वो बस अकेली थी. गांव वाले उसे डायन कहते थे क्योंकि वो काली थी. उल्टे पैर? बचपन में पोलियो हुआ था. वो रात को पीपल के नीचे बैठकर कहानी लिखती थी क्योंकि घर में लाइट नहीं थी." मेरे पैरों तले जमीन निकल गई. "तो कोमल को किसने मारा?" बूढ़ी रोने लगी. "किसी ने नहीं. वो डर गई. तुम लोगों ने उसे डायन बना दिया. वो भाग गई. मुंबई चली गई. पर डर के मारे वापस नहीं आई." "तो मैसेज? दरवाजे पर खरोंच?" बूढ़ी ने मेरी डायरी निकाली. कोमल की डायरी. "ये लो. आखिरी पन्ना पढ़ो." मैंने पढ़ा. खून से नहीं, लाल स्याही से लिखा था: "अनामिका, मैं जिंदा हूं. मुंबई में. लेखिका बन गई. पर डर लगता है. गांव वाले मुझे अब भी डायन बुलाएंगे. इसलिए मरने का नाटक किया. तू मेरी सच्ची कहानी लिख. दुनिया को बता, डायन नहीं होती. नफरत होती है. और नफरत ही सबसे बड़ी डायन है. कहानी पूरी करना. पीपल के नीचे मत आना. मैं आऊंगी. 13 दिन बाद. तेरे घर. • तेरी कोमल" आज 13वां दिन है. रात के 11:50 हुए हैं. मैं ये कहानी लिख रही हूं. StoryMirror पर डालूंगी. पूरी दुनिया पढ़ेगी. दरवाजे पर दस्तक हुई. कोमल आ गई. और डायन? वो मर गई. आज. अभी. इस कहानी के साथ. समाप्त।


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