वक्त की कमान
वक्त की कमान
वक्त की कमान से निकला तीर जाने कब, कैसे और कितने जनो को ज़ख़्मी कर जाता है जिसकी कोई गिनती नहीं है और ना ही कोई हिसाब, बस यही तकाजा है वक्त का जिससे अनजान रहता है हर इंसान !
यह उन दिनों की बात है जब संदीप नया-नया इस शहर में आया था ! जब वो कानपुर से तबादला होकर जोरहाट आया था तब हमें भी हैदराबाद से आये हुए अभी चार महीने ही हुए थे, संदीप मिस्टर का कलीग था और जूनियर भी। वो अक्सर संडे को हमारे यहां आता, बच्चों के साथ खेलता, बच्चे भी उससे घुल-मिल गये थे । हमें सर्विस क्वार्टर नहीं मिला था, हम किराए के मकान में रहते थे, मकान मालिक भी वहीं रहता था उसका बहुत बड़ा घर, खूब बड़ा बाड़ा, बाड़े के अहाते में एक तरफ दो कमरे, रसोई और बरामदें सहित छोटा मकान था जो भाड़े के लिए ही था । मकान मालिक की फॅमली बहुत मिलनसार थी, उनके यहां कोई छोटा बच्चा नहीं था वे हमारे बच्चों से बहुत प्यार करते थे। उनके एक बेटा, दो बेटियां थीं जो लगभग मेरी ही हमउम्र थी मुझे भाभी और मिस्टर को दादा कहती लड़का भी यही कहता वो मिस्टर से करीब दो साल छोटा था, मैं उसे दादा कहती और उनके माता-पिता को अंकल - आंटी कहती थी।
सब अच्छा चल रहा था कहीं कोई न खंत न परेशानी सब स्मूथली जा रहा था ! हमारे बच्चे दिन भर उनके यहां ही रहते, दूध पिलाने व खाना खिलाने के लिए लेकर आती मगर हफ्ते में एक दो बार तो बच्चों का खाना-पीना वगैरह सब वहीं होता था, बड़ा मेरा तीन का, छोटा डेढ़ साल का, दोनों मस्तीखोर, नटखट और बहुत ही प्यारे थे हरेक का मन मोह लेते, उनके लिए चलते-फिरते खिलौने थे उन्हीं के साथ खेलना, खुश रहना ही उनका शगल था मानो !
दादा की दुकान में नाटक वगैरह के लिए किराए पर दिए जाने वाले कपड़े रहते रहते थे अक्सर ये लोग बच्चों को भगवान श्रीकृष्ण के कपड़े पहनाकर उनको बाल कृष्ण बनाकर खूब मज़े करते, खेलते हंसते ऐसे ही यहां - वहां कभी घर, कभी दुकान तो कभी उनके घर होते रहते ! संदीप भी जब आता तो उनके साथ ही खेलता और साथ - साथ घूमता रहता । लेकिन जाने कब संदीप और बड़ी लड़की रेणुका एक-दूसरे के प्यार में पड़ गये ! प्यार की पींगे लड़ाने लगे अपनी सारी बातें शेयर करने वाली रेणुका ने अपने प्यार की भनक तक नहीं पड़ने दी और ना ही संदीप ने ! हालांकि दोनों हंसते - बतियाते मुझसे अपनी सब बातें शेयर करते लेकिन यह तो पता ही नहीं चला हां एक फर्क जरूर लगा था, महसूस किया था, ,,, रेणुका और रितु दोनों हमारे यहां जरूर ही रहती थी जब संदीप होता मगर ऐसा कभी खयाल नहीं आया कि ऐसा कुछ होगा ! यह तो तब भेद खुला जब उस दिन संडे को रेणुका और रितु दिन भर नहीं आई न ही संदीप आया था, रात को पता चला जब रेणुका की मां रात के आठ बजे आई मुझे देखकर बोली - बुआरी, रेणुका कोत आसे ? अभी तक आया नहीं कोत थाकिले ? तुम्हारे साथ गया था ना ? मैं हैरान कि आंटी ऐसा क्यों कह रही है मेरे साथ कब गई थी ! आंटी को किसने कह दिया कि मेरे साथ गई ?
आंटी, मैं तो कहीं नहीं गईं दिन भर घर में ही थी लेकिन रेणुका, रितु तो आई ही नहीं आज मुझे लगा कहीं गई होगी या कुछ काम होगा, , मोंए एकू ना जानू आंटी !
मुझे तो उसने कहा था - मम्मी, हम भाभी के साथ जा रहा हूं, हम लोग देर से आएगा जब रितु को पूछा - तू भी जा रही है ? तो उसने मना कर दिया था लेकिन,, जब उसे बुलाकर रेणुका के बारे में पूछा तो काफी आनाकानी के बाद उसने बताया - संदीप और रेणुका प्यार करते हैं आज शादी करने वाले हैं ! कब और कहां पूछने पर वो नहीं बता पाई या फिर बताया नहीं ! उसकी बहुत पिटाई भी की उसकी मां ने हालांकि मैंने बहुत रोका लेकिन बेचारी को अधमरा कर दिया फिर भी वो टस से मस नहीं हुई मैंने बीच-बचाव कर प्यार से अकेले में पूछा तो भी उसने मना ही किया, लग ही रहा था कि वो सच बोल रही है ! अब सवाल यह कि आखिर गई कहां ? जोरहाट इतना छोटा भी नहीं कि आसानी से ढूंढ़ा जा सके इतनी जल्दी।
अंकल जी दादा और मिस्टर अपनी तरफ से काफी कोशिशें कर रहे थे नतीजा ढाक के तीन पात ! अब अंकल-आंटी का गुस्सा हम पर उतरने लगा क्योंकि संदीप हमारे यहां जो आता था । हमारे अच्छे-भले रिलेशन थे मगर इतने कटु हो गये कि पूछो ही मत !
संदीप पता नहीं कहां गायब हो गया कि अता- पता तक नहीं, यहां तक कि चार दिन हो गये मगर आॅफिस भी नहीं आया, उसके न आने से सबकी हालत खस्ता थी अब करें भी तो क्या करें ! हमने उन लोगों को समझाने की कोशिश की, बहुत विश्वास दिलाया कि इसमें हमारा कोई हाथ नहीं बल्कि हमें भी संदीप पर गुस्सा आ रहा है, , उसने ऐसा जो किया फिर इस तरह रेणुका के जाने का भी दुख है ! शर्मिंदा भी हैं इसलिए कि संदीप हमारा दोस्त है और एक तरह से तो हमारी वजह से ही हुआ फिर रेणुका हमारी बहन जैसी है जैसे वो हमें प्यार करती है, अपना मानती है वैसे ही हम भी लेकिन इन दोनों ने हमें कहीं का नहीं छोड़ा, उनकी वजह से परेशानी भी तो हुई !
वैसे तो वे समझते ही थे कि हमारा कोई दोष नहीं, लड़के - लड़की की ही कारस्तानी है फिर भी मां-बाप है तो ऐसे ही सारे ख्याल तो आएंगे ही ! खैर हमें भी उनसे कोई शिकायत नहीं है । लेकिन यहां सबसे बड़ा लोचा है उनके रिश्तेदारों और जाति वालों में बहुत आक्रोश भरा हुआ था कि बस, मिले तो हलाल करदे हमें भी एक अनजाना भय सता रहा था, मैं तो मन ही मन ईश्वर से प्रार्थना कर रही थी कि वे लोग वापस न आए मगर वहीं हुआ जिसका डर था सिलीगुड़ी स्टेशन पर पकड़े गये,, उन लोगों ने शादी कर ली थी बहुत खुश थे ! बदकिस्मती उनकी देखो, , बहन ने भाई को देखा तो ऐसा प्यार उमड़ा दे दी भाई को आवाज और दौड़ कर दादा के पास गई, छलछलाई आंखों से भाई को निहार रही थी भाई ने बाहों में भर लिया प्यार से सिर पर हाथ फेरा, फिर भरे गले से बोला - तुमने यह क्या किया ? शादी हम करवाते, भरोसा किया होता कितनी बदनामी, छिछालेदर हुई कुछ तो सोचा होता !
सौरी दादा, मैं डर गई थी।
चल अब सब ठीक हो जाएगा, संदीप कहां है ?
वहां वेटिंग रूम में, चलिए मैं आपको लेकर चलती हूं। खुशी - खुशी दादा को ले गई लेकिन वहां जाकर देखा - संदीप ख़ून से लथपत लाश में तदबील हो चुका था वो एकदम सकते की हालत में संदीप पर गिरते ही बेहोश हो गई, सामने चचेरा भाई शोमू खड़ा था हाथ में खुखरी लिए जो खूनसनी थी ! दादा बिल्कुल आश्चर्यमिश्रित हक्का - बक्का, कुछ देर तो बोल ही नहीं सका फिर किसी तरह खुद को संभाल कर बोला - की कोरी दीसे ? वो लोग शादी कर लिया था, , अब क्यों ? क्यों दादा क्यों ? नहीं करना चाहिए था आपको मैंने आप पर भरोसा किया था आपने तो अपने हाथों अपनी बहन का सुहाग उजाड़ दिया !
उसका ऐसा ही होना चाहिए उसने हमारी इज्जत पर हाथ डाला, छी, तू कैसा मर्द है तुम्हें ज़रा भी नहीं लगा, लानत है तुम पर और तुम्हारी मर्दानगी पर, कहते हुए गुस्से में दनदनाता हुआ निकल गया। बहनोई की लाश पर पड़ी मूर्छित बहन को दादा अपनी गंगा-जमुना होती आंखों से देख रहा था मगर सब धुंधलाया हुआ था, सोच रहा था- वक्त की कमान से निकले तीर ने क्या से क्या कर दिया ! ओह !
