विश्वनाथ का न्याय
विश्वनाथ का न्याय
विश्वनाथ बाबा के दर्शन से पूर्व एक दुकान से विजया ने पूजन सामग्री के साथ दो पैकेट प्रसाद खरीदा ताकि अपने सभी परिचितों बाँट सके।
"कितने पैसे हुए ?"
"तीन सौ रुपये। दर्शन से लौटकर दे देना।" - दुकानदार ने कहा।
उसने दूध मिले जल का एक लोटा भी हाथ मे थमा दिया।
सखी नीरा ने झट से लोटा विजया के हाथ से ले लिया।
बनारस के एक परिचित सोनी जी ने अपनी पहचान के जरिये बहुत जल्दी और भरपूर दर्शन करवा दिये।
नीरा ने जल चढ़ाया , विजया ने उसे फूल बेलपत्र भी दिये
। फिर स्वयं भी जल फूल आदि चढा कर प्रणाम किया।
दुकानदार को देने के लिये विजया ने तीन सौ रूपये निकाले ही थे कि नीरा सौ रुपये निकाल कर बोली यह मेरे पैसे। विजया को बहुत अजीब लगा। यदि पैसे लिये तो प्रसाद में से बराबर का हिस्सा देना होगा। यह सोच विजया ने पैसे लेने से इंकार कर दिया। पर नीरा जिद पर आ गई। विजया उसकी चालाकी समझ गई थी। सोनी जी यह सब देख रहे थे। उन्होंने प्रसाद की थैली विजया के हाथ से लेकर आगे गाड़ी में टांग ली।
घर पहुँच उन्होंने पत्नी के हाथ में थैली पकड़ाते हुए कहा, कि इसमें अपने लिये प्रसाद निकल कर इन्हें दे दो। जब पत्नी लौटी तो थैली में बहुत थोड़ा प्रसाद ही शेष था।
