विश्व हृदय दिवस
विश्व हृदय दिवस
विश्व हृदय दिवस सेवा (कर्म) और योग से भी पहले सर्व प्रथम भाव भावना केंद्र की शुद्धि अति अनिवार्य चीज है। आज World Heart Day - 29 सितंबर है। आइए हम हमारे blood circulation system को निरंतर गति देने वाले अत्यंत अनिवार्य अंग हृदय को एक अलग तरह अलग dimension में समझते हैं। इसे आध्यात्मिक ज्ञान की दृष्टि से समझते हैं। यूं तो हमारा हृदय देखने में बड़ी स्थूल सी और छोटी सी चीज लगती है। पर हम जानते हैं कि यह हमारे पूरे शारीरिक संरचना के संचालन में बहुत ही ज्यादा महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसकी गतिविधि के पीछे सूक्ष्म शक्ति भाव और भावना की शक्ति भी काम करती है। हमारा हृदय केंद्र हमारी आत्मा के भाव केन्द्र से भी संबंधित होता है। भावनाओं का केन्द्र विचार के केन्द्र से भी ज्यादा संवेदनशील सूक्ष्म और शक्तिशाली होता है। प्रत्येक जीवात्मा के आंतरिक जगत में भाव केंद्र और विचार केंद्र ये दोनों ही केंद्र होते हैं। सभी जीवात्माओं में इन दोनों केंद्रों की सिर्फ सक्रियता के लेवल (चैतन्यता) में ही फर्क रहता है। हमारे मन अर्थात् विचार केन्द्र और भाव केन्द्र यूनिवर्स की अलग अलग फ्रीक्वेंसी से सूक्ष्म स्तर पर जुड़े रहते हैं। इसलिए इन दोनों केन्द्रों के काम करने की प्रक्रिया में भी अंतर होता है। ये अलग अलग होते हुए भी कभी कभी अलग अलग अनुभव नहीं होते हैं। इनके वास्तविक मैकेनिज्म की वास्तव में सटीक व्याख्या नहीं की जा सकती है। खैर...ये सब तो अति वैज्ञानिक बातें हैं। हमारे जीवन के ज्यादातर व्यवहारिक पक्ष का ज्यादा हिस्से का इससे ज्यादा ताल्लुक नहीं होता है। इस विषय के संदर्भ में हम बात कर रहे हैं हमारे भाव भावना के केंद्र की। हमारे जीवन का कम से कम 80% हिस्से का कनेक्शन (सम्बन्ध) हमारे भाव और भावनाओं से होता है। यूं कहें कि मनुष्य का जीवन ऑटोनॉमस mode पर 80% भाव और भावनाओं से संचालित होता है। हम आत्मा के अन्तर्जगत भावना और विचार की बात कर रहे हैं। इस विषय को हम अनेक प्रकार से अनेक आयामों में विवेचन कर रहे हैं। इसलिए ऊपर से देखने में ऐसा प्रतीत हो सकता है कि यह पुनरूक्ति सी है। लेकिन गहरे में देखेंगे तो ऐसा नहीं है। यूं कहें तो भाव के केंद्र के पास तर्क की योग्यता नहीं होती है। विचार के केंद्र के पास तर्क की योग्यता होती है। पर भाव के केंद्र के पास इंट्यूटिव योग्यता होती है। यह योग्यता बहुत खास होती है। इंट्यूटिव योग्यता के अपने विशेष और महत्वपूर्ण उपयोग होते हैं। यदि भाव केन्द्र शुद्ध होता है तो उसका यूनिवर्स के साथ जुड़ाव ज्यादा सूक्ष्म रूप से रहता है। जबकि विचार केन्द्र का यूनिवर्स के साथ जुड़ाव भाव केन्द्र की तुलना में कम रहता है। यदि भाव केन्द्र सूक्ष्म लेवल पर सक्रीय रहता है तो बहुत ज्यादा संभावना बनती है कि विचार केन्द्र भी सूक्ष्म लेवल पर सक्रीय रहता है। भाव केन्द्र यदि स्थूल लेवल पर सक्रीय रहता है तो बहुत ज्यादा संभावना बनती है कि विचार केंद्र भी स्थूल लेवल पर सक्रीय रहता है। भाव केन्द्र की शुद्धता जिसे हम सच्चा या साफ दिल कहते हैं, वह वास्तव में क्या होती है? इसकी व्याख्या बहुत सूक्ष्म होती है। चूंकि इस विषय का संबंध अनेक जन्मों से है। इसलिए इसकी पूरी व्याख्या कर पाना सम्भव नहीं है। दरअसल अध्यात्म विज्ञान के अध्ययन और प्रयोगों के अनुसार हृदय केंद्र आत्म चेतना के आंतरिक और बाहरी विस्तार का केंद्र है। प्राकृतिक रूप से विचार करें। उदाहरण के तौर पर जब भी कोई चीज बहुत ज्यादा संकुचित या संकीर्ण या dormant होती है तब उसमें धीरे धीरे एक निश्चित प्रकार की अशुद्धि आने लगती है। ठीक यही स्थिति हमारी सूक्ष्म प्रकृति की होती है। हमारा भाव और हमारे विचार हमारी सूक्ष्म प्रकृति का प्रतिनिधित्व करते हैं। इसलिए वास्तव में हमारे यह भाव केन्द्र के लेवल की सूक्ष्मता या विशालता ही हमारे स्थूल दिल की शुद्धता का पर्याय कहलाती है। हम अपनी आम बोलचाल की भाषा में उपयोग करते हैं कि दिल साफ होना चाहिए। यह बुद्धि की आंतरिक स्थिति की बात होती है। जानकारों ने बुद्धि को ही आंतरिक दिल कहा है जिसका सूक्ष्म संबंध भौतिक अंग हृदय से बताया गया है। आत्माओं के भाव केंद्र की सूक्ष्मता और विशालता का प्रभाव हृदय के स्वास्थ्य पर पड़ता है। यानि हृदय की शुद्धता के लिए भाव केन्द्र के लेवल की विशालता चाहिए, संकीर्णता नहीं। राजयोग का अभ्यास करने में हमारे विचारों का और भावनाओं का बहुत बड़ा योगदान रहता है। ऐसा कहा गया है कि अच्छे अच्छे बड़े बड़े योगियों को भी राजयोग (आंतरिक योग) के गहन अनुभव करने के लिए भक्ति भाव (परमात्मा के प्रति अगाध आस्था अनुराग/प्रेम) का सहारा लेना पड़ता है। भक्ति भाव का सहारा लेने का भावार्थ है कि परमात्मा के प्रति प्रेम भावना को जगाना पड़ता है। इसे ही दूसरे शब्दों में आत्मा (योगी के) के भाव संस्थान की शुद्धि कहा जाता है। संकल्पों अर्थात् विचारों की महानता और विशालता से भी हमारे भाव केन्द्र की शुद्धता बढ़ती है। भाव केन्द्र की शुद्धता के लिए पांच विकारों का त्याग तो जरूरी है ही। पर उससे भी ज्यादा जरूरी है कि कुछ समय तक नियमबद्ध तरीके से अपने भाव केन्द्र को शुद्ध करने का अभ्यास करना। अतीत के समय से मनोजगत में कुछ अशुद्ध संस्कारों की निर्जरा जरूरी होती है। उस अभ्यास में सिर्फ शुभ शुद्ध भावनाओं को भिन्न भिन्न तरह से अपने भाव केन्द्र में जागृत करके वैसा आंतरिक अनुभव करना पड़ता है ताकि कभी भी भाव केन्द्र में किसी के लिए भी अशुद्ध भावनाएं जागृत ना हों। इसके लिए मेरी स्वयं की समझ तो यह है कि ईश्वरीय ज्ञान का साप्ताहिक कोर्स पूरा होने के बाद दूसरा एक मास का कोर्स भाव और भावना शुद्धिकरण का होना चाहिए। राजयोग के अभ्यास का पुरुषार्थ करने से पूर्व ही एक अनिवार्य कोर्स, भाव, भावनाओं की शुद्धि का होना चाहिए। भाव की शुद्धि राजयोग के लिए अत्यंत जरूरी है। बिना भाव केन्द्र की शुद्धि के भी राजयोग का अभ्यास या पुरुषार्थ तो कर सकते हैं। लेकिन उसमें बहुत मेहनत लगेगी और उसके हितकर होने की संभावना बहुत कम होती है। तब तो खोदा पहाड़ और निकली चुहिया वाली बात होगी। भाव केन्द्र या भावनाओं की शुद्धि को आप दूसरे शब्दों में मन बुद्धि की शुद्धि भी कह सकते हैं। यदि psychology और मनोदैहिक psychosomatic के आपसी संबंध के हिसाब से कहा जाए तो हमारी भावनाओं की शुद्धि से स्थूल हृदय का function सिस्टम भी ठीक ठाक काम करता है। इसे ही दूसरी तरह से भी कह सकते हैं।हृदय की शुद्धि के लिए और हृदय के ठीक ठाक काम करने के लिए सिर्फ बेहद के ज्ञान की ही नहीं, अपितु शुद्ध भावनाओं के मोतियों की आवश्यकता भी होती है। हमारी शुद्ध भावनाएं और शुद्ध विचार भी हमारे लिए आहार का काम करते हैं। हृदय के स्वास्थ्य के लिए भोजन के संतुलन और अनुकूलता भी अनिवार्य होती है। पर पहली बात भाव केन्द्र की शुद्धि की होती है। इसलिए सार संक्षिप्त में बात सिर्फ यही है कि हृदय को हेल्थी रखने के लिए हमारे भाव भावनाओं की शुद्धि की सबसे पहले और सबसे ज्यादा आवश्यकता है। उसके बाद हमारे आहार की शुद्धि और संतुलन की आवश्यकता होती है। कर्मों की शुद्धि भी भाव और भावनाओं की शुद्धि के बाद आती है। भावना भाव, विचार और आहार तथा कर्मों की शुद्धि ये सभी अनिवार्य हैं। सार यह हुआ कि योग और कर्म की गुणवत्ता और शुद्धि बढ़ाने के लिए भावनाओं की शुद्धि को दृढ़ प्रतिज्ञ होकर सबसे पहले बढ़ाना चाहिए। हमारा भाव केंद्र की शुद्धि ही हमारे जीवन के लिए जीवन के आधारभूत है। इसलिए हमें शुरू से ही समस्त संसार में जड़ चेतन में सुख शांति व्याप्त हो - ऐसी शुभ भावना सदा हमारी बनी रहे - यह मंत्र हमें भक्ति मार्ग में ही पूरे दो युगों से पक्का कराया जाता है। अधिकांश बार समय प्रति समय कोई ना कोई ऐसा विषय उपस्थित हो ही जाता है जिसपर मुझे प्रेरणा आती है कि इसपर कुछ ज्ञानयुक्त विचार विश्लेषण जरूरी करना चाहिए। इससे यदि ज्यादा नहीं तो कम से कम एक गिलहरी वाली सेवा की बात तो जरूर सार्थक होगी। Thank you Original Date 29/9/2022
