ऊँची उड़ान
ऊँची उड़ान
"ओह...आज तो बहुत सारे मैसेजेस है...क्या बात है ?" कल्पना ने हमेशा की तरह खाना शुरू करने के साथ अपने सोशल मीडिया पर नजर डाली।
"हे भगवान.... आज नितिन का जन्मदिन था।" वो भूल ही गई थी। तीन चार बार पूरी घंटी गयी पर फोन नहीं उठा। कल्पना ने अपनी मां को फोन लगाया।
"हाँ माँ... जरा नितिन से बात करा दिजिये... उसे जन्मदिन की शुभकामनाएँ तो दे दूँ...." वो अनुनय भरे स्वर मे बोली।
"कल्पना.... अभी नितिन अपने दोस्तों के साथ है.... थोड़ी देर में फोन करना.... यहाँ बहुत शोर भी है..." माँ ने फोन काट दिया।
खाना खाकर कल्पना ने पुनः माँ को फोन किया।
"माँ....नितिन से बात नही हो पायी अभी तक, अखिल का भी फोन नही उठ रहा.... कहाँ है वो ?" कल्पना परेशान थी।
"हम तो अपने घर आ गये कल्पना.... हो सकता है शायद सो गया हो" माँ ने बेरुखी से कहा।
"क्या बात है माँ...सब ठीक है ना..." कल्पना को चिंता होने लगी।
"बात क्या होगी...आखिर हम सब की तरह वह मासूम भी तुम्हारे बिना जीना सीख रहा है। तुम्हारा फोन न आने पर शाम को बहुत रोया था। अब तुमसे नाराज है... बात नहीं करना चाहता।" माँ बहुत उखड़ी हुई थी।
"ऐसा क्यों बोल रही हो माँ...यह सब उसके सुखद भविष्य के लिए ही तो कर रही हूँ मैं।"कल्पना ने दबे स्वर मे सफाई देनी चाही।
"किसे बेवकूफ बना रही हो कल्पना, खुद को ही ना...वर्तमान छीन कर भविष्य नही बनाए जाते। तुम्हें अपने इकलौते बेटे का जन्मदिन नही याद रहा, माँ क्या ऐसी होती है ? तुम मशीन हो गई हो कल्पना...तुम्हें किसी की भी भावनाओं की चिंता नहीं है..... बस तुम और तुम्हारी महत्वाकांक्षा...."माँ का गुस्सा फट पड़ा।
"क्या करूँ माँ.....मेरा भी वजूद है..." कल्पना खिसिया गयी....
"अरे छोड़ो... अखिल अपने बाप होने की पूरी जिम्मेदारी निभा रहा है। क्या उसका वजूद खत्म हो गया ? साथ ही इतना बड़ा बिजनेस संभाल रहा है...ऐसा ही था तो शादी क्यों की ? क्यों लायी नितिन को इस दुनिया में...." आज माँ सब कह देना चाहती थी....
"बस करो माँ...." अब कल्पना सुन नहीं पा रही थी...
"सही में कल्पना.... अब बस भी करो... अपने मन के पंछी की उड़ान को काबू करो.....आसमान में उड़ने वालो को थक कर नीचे ही आना होता है। तुम्हारी उड़ान को कभी किसी ने पिंजरे में कैद नही किया पर कहीं ऐसा ना हो जायें कि तुम्हारे लिए जमीन पर जगह ही ना हो....कब तक अकेले उड़ोगी....वक्त रहते संभल जाओं नहीं तो......" आगे के शब्द मौन हो गये, माँ ने फोन काट दिया।
कई दिनों से कल्पना को नितिन मे बदलाव महसूस हो रहा था पर वह नजरअंदाज कर रही थी.... लेकिन आज अपनी ही माँ कि कड़वी बातों ने उसे झंझोड़ कर रख दिया....उसे अपनी दुनिया, अपना अस्तित्व बहुत छोटा लगने लगा था। उसके सुसज्जित कमरे की दीवारे उसकी तरफ सरकती जा रही थी...मानो उसे उसकी ही दुनिया में कैद कर रही हो, उसका दम घुटता जा रहा था।
कल्पना को महसूस हुआ कि सिर्फ बाहर ही नही... उसके भीतर भी उठापटक हो रही थी...
शायद उसके भीतर कुछ टूट रहा है.... कुछ चटक रहा है....
अंदर बाहर की यह कशमकश उसे विचलित कर रही थी, वह बॉलकनी मे आ गयी। खुली हवा में उसे कुछ राहत महसूस हुई।
ओह...यह क्या....यह चमचमाती लाईट्स, जिन्हें कभी वो अपने सपनों की दुनिया समझा करती थी आज भभकती आग लग रही है....उसे झुलसा रही है.... उफ्फ...उसका दम फिर घुटने लगा। वह पास पड़ी ईजी चेयर पर ढेर हो गयी। कल्पना समझ नही पा रही थी कि कहाँ, क्या गलत हो गया....
अपने माता पिता की लाडली कल्पना ने कभी भी अपने मन को नही मारा। ना ही कभी इसकी जरूरत पड़ी। मेहनती और दृढसंकल्पित कल्पना ने जो चाहा वो ही पाया। उच्च शिक्षा, बेहतरीन नौकरी और फिर मनचाहा जीवनसाथी। अपनी मनवांछित कामयाबी से संतुष्ट कल्पना कभी किसी और को संतुष्ट नही कर पाई। समय देना, जीवन के हर रिश्ते को निभाने की पहली शर्त है और कल्पना के पास दूसरे को देने के लिए समय ही कहाँ था ? जीवन साथी और जीवन से जुड़ी तमाम जिम्मेवारी उसकी उड़ान में बाधक नही बने, इसी शर्त पर कल्पना ने दाम्पत्य जीवन की शुरुआत करी थी। शुरू का जीवन बहुत आराम से कटा.... फिर बेटे नितिन की जरूरतें उसके पैरों की बेड़ियां बनने लगी। नितिन को पति अखिल एवं उसके माँ बाबूजी को सौंप कल्पना ने दुबई स्थानांतरण ले लिया। चार छः महीने में घर आती और पन्द्रह दिन में वापस चली जाती थी।
धीरे धीरे पति अखिल का वो बेइंतहा प्यार तिरोहित हो चुका था। माँ पापा कब से उसे समझा समझा कर हार चुके थे और अब तो नितिन के मासूम प्यार की कोपलें भी मुरझाने लगी थी। उसने स्वयं ही अपने आप को सबसे दूर यहाँ कैद कर लिया था।
आज अचानक वो अपनी उड़ान की थकान महसूस करने लगी थी... वो खुले आकाश मे गोते खा रही थी... बिना किसी सहारे के...तभी उसके डूबते मन को कुछ थाह मिली...
"साढ़े तीन घंटे की ही दूरी है... सुबह मैं अपने परिवार के पास होऊँगी। अब मुझे एक पल भी नही गँवाना..." बड़बड़ाते हुऐ वो अपने टिकट बुक करने लगी....उसके मन के पंछी को उसका घोंसला जो बुला रहा था !
