उत्तरा का संघर्ष जारी है
उत्तरा का संघर्ष जारी है
एक भरे पूरे बड़े संपन्न घर में चौथी संतान के रूप में जन्म हुआ था उत्तरा का। उसके पहले तीन बड़े भाई थे लेकिन फिर भी चौथी संतान के रूप में जब पुत्री का जन्म हुआ तो उसके पिता अशोक ठाकुर माता कुंती देवी को बिल्कुल पसंद नहीं आया।
उन्हें लगा कि यह भी बेटा होता तो अच्छी बात थी। अगर उत्तरा के जन्म से कोई खुश था तो वह उसकी दादी थी....जो कदम कदम पर उसे आगे बढ़ाने और पढ़ने लिखने के लिए प्रेरित करती रहती थी। घर में छोटी-छोटी बातों से लेकर पढ़ाई लिखाई तक उत्तरा का संघर्ष और अपने अस्तित्व की लड़ाई जारी रहती। वह कभी-कभी टूट जाती तो रोने लग जाती उसकी दादी उसका सबसे बड़ा सहारा बन जाती और कहती,
" मेरी लाडली ! हिम्मत मत हारो...मेहनत करो,पढ़ते रहो और आगे बढ़ते रहो। तुम्हारी शिक्षा ही कल को तुम्हे जिंदगी में आगे बढ़ाने और सम्मान दिलाने में मदद करेगी !"
आगे चलकर ज़ब उत्तरा ने पूरे जिले में टॉप किया, तब जाकर उसके पिता अशोक जी ने गर्व महसूस किया और उसकी माता ने सबसे पहले यह बात कही कि....
" बिटिया रानी ! हमें तुम पर गर्व है !"
आज उत्तरा बहुत खुश थी। क्योंकि आज उसे माता-पिता ने पहली बार उसे गले लगाया था उसके लिए अच्छी-अच्छी बातें कही थी…।
उत्तरा जानती थी कि....उसका संघर्ष सभी जारी है और जारी रहेगा। लेकिन पहली बार सफलता मिलने पर जो उसे गर्व महसूस हुआ था, उसके लिए वह अपनी दादी का बार-बार धन्यवाद करती थी।
