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उरिया

उरिया

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शहर की काली चमचमाती सड़क पर सोमित्र की कार फर्राटा भर रही थी l रात का समय था l हल्की हल्की बूंदा बांदी ने मौसम को खुशनुमा बना दिया था l अक्टूबर के महीने में बैसे भी हल्की हल्की सर्दी होने लगती है l सोमित्र ने अपने सिगरेट केस से एक सिगरेट निकाली और सुलगाकर कश लगाने लगा l सोमित्र ने अपनी गाड़ी रेड लाइट एरिया की तरफ मोड़ दी l वैसे सोमित्र वहाँ बहुत कम ही जाता है, उसका अपना घर परिवार है लेकिन उसके घर में आज कोई नहीं है...सभी के सभी दुर्गापूजा में शामिल होने के लिए कलकत्ता गए हुए हैं l तभी वह एरिया भी आ गया जहां उसका एकाकीपन दूर हो सकता है l एक छोर पर उसने उसने गाड़ी पार्क की, तभी एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति उसके पास आया l शायद वह लड़कियों का दलाल था l

" क्या पेश करूं साहब, अपुन के पास सब कुछ मिलता है"

" नये में कुछ है क्या?"

" हाँ साहब, कल ही गाँव से दो लड़कियाँ आयी है, एक दम अछूती है l एक दम फ्रेश" l

" ठीक है दिखाओ मुझे "

" ये देखिये साहब दौनो एक से बढ़कर एक " फोटो दिखाते हुए उस दलाल ने कहा l

" इसका नाम क्या है" एक फोटो की तरफ इशारा करते हुए कहा l

" जी यह उर्मि है, कल ही आई है हमारे गरीवखाने में, एक दम मासूम चेहरा, कटीले नाक नक्श, सही चुनाव किया आपने साहब "

" ठीक है भेज दो इसे मेरे कमरे पर, पैसे बताओ " l

" जी एक दम फ्रेस माल है, तो साहब दस हजार से कम क्या लूंगा" l खींसे निपोरते हुए उसने कहा l

सोमित्र ने गाड़ी में पड़े एक बैग से रुपयों की गड्डी निकाली और उसके सामने फेंकते हुए कहा " जल्दी से भेज उसे "

सोमित्र उस बस्ती के छोटे से कमरे में एक सिंगल बेड पर अधलेटा हुआ था l सामने मेज पर एक लोकल ब्रांड की दारू रखी हुई थी l उसने उसमे से कुछ घूँट एक गिलास में डाले और पेक बनाकर पीने लगा l

अचानक से कमरे का दरवाजा खुला और एक लड़की दाखिल हुई जो लगभग बाइस या तेईस बरस की रही होगी l सादगी ऎसी कि कोई भी मोहित हो जाए l बदन पर सादा सा सलवार सूट और कायदे से उड़ा हुआ दुपट्टा l 

" मुझे क्या करना है साहब" उस लड़की ने पूछा l सोमित्र को यह आवाज जानी पहचानी सी लगी l उसका नसा एक दम से काफूर हो गया l अरे कही यह अपनी उरिया तो नहीं l आवाज से तो बिल्कुल वही लग रही है, नाम भी वही और चेहरा भी कुछ कुछ मिलता सा लग रहा है l चेहरा तो बदल गया ही होगा पाँच बरस हो गये अपने गाँव और उन सबसे रिश्ता तोढ़े l

उसकी सादगी भी उरिया की ही तरह उसे अपनी और आकर्षित कर रही थीं l हिम्मत करके सोमित्र ने उसे 'उरिया' कहकर पुकारा तो उसकी आँखे फटी की फटी रह गयी l उसकी आवाज उसकी जुबान पर नहीं आ रही थी l उसकी खुली हुई आँखे और पसीने से तरवतर चेहरा देखकर सोमित्र समझ चुका था कि ये और कोई नहीं वल्कि मेरी उरिया ही है l

"क्या हुआ? तू कुछ बोलती क्यों नहीं" सोमित्र ने उसे झकझोरते हुए कहा l 

" सोमित्र बाबू, मै आपकी उरिया थी जरूर लेकिन आज से मेरा भविष्य बदलने वाला है आज के बाद मेरा बदन कोड़ी कोड़ी में बेचा जाएगा l एक मरे हुए जानबर की भाति मेरे जिस्म को नोचा खसोटा जाएगा I फिर तू मुझ जैसी गंदगी को क्यो अपनी उरिया कहेंगा l सिसकते हुए उर्मि ने कहा l 

" ये कैसे हो गया उरिया, तू यहाँ कैसे आ गई..गाँव में तेरे साथ क्या हुआ? बता न, मेरा हृदय विदीर्ण हुआ जा रहा है " सोमित्र ने उर्मि को ढाढस बंधाते हुए पूछा l

" सोमित्र बाबू, किस्मत का लिखा कौन मेट पाया है आज तक, जो मेरी किस्मत बदलती l तूने प्रण लिया था न मेरी किस्मत बदलने का देखो आज मैं कहाँ से कहाँ पहुँच गई l साली किस्मत निगोड़ी की निगोड़ी ही रही l तूने अपने बापू से हमारी लग्न की बात की, उसके बाद की महाभारत तो तुझे पता ही है, कितना हंगामा हुआ था... ये छोटी जाती की , हम जमींदार खानदान के.. ये कुलक्षना, हम शराफत के पुतले... ये तेरे लायक नहीं है, इसका तो करम फूटा ही है तू क्यों अपना सिर खपाता है l किसी अच्छे खानदान से तेरी शादी कर दूँगा l कितना कुछ कहा गया था मेरे बारे में l उसी समय सारे सपने चकनाचूर हो गए थे जो तूने मुझे दिखाए थे खुली आंखो से l फिर तेरी शादी कर दी गई किसी रईस खानदान में l तू हमेशा के लिए अपने गाँव और परिवार से रिश्ता तोड़कर इस शहर में आ गया l तेरे जाने के बाद जमींदार साहब ने मुझे ही तेरे अलगाव का कारण माना l मेरे बापू को हर तरीके से जलील और प्रताड़ित किया गया l मुझे भी पता नहीं क्या क्या कहा गया l पंचायत की तरफ से मेरे घर का हुक्का पानी भी बंद कर दिया गया l कुछ दिन बाद बापू चल बसा l मै गाँव में कैसे रहती, सभी ने भी मुझे काम और आश्रय देने से इंकार कर दिया l अब तुम्ही बताओ सोमित्र बाबू, इस पापी पेट का क्या करती l एक रात मैंने उस गाँव को छोड़ दिया और यहाँ शहर आ गई और यहाँ मुरारी मिल गया... अरे वही मुरारी जिसने मुझे तेरे साथ भेजा l पढ़ी लिखी तो थी नहीं जो कोई काम मिलता, इसलिए थक हार कर किस्मत पर भरोशा कर लिया "

" इतना कुछ तेरे साथ होता रहा और तूने मुझे खबर तक न दी l तूने मुझे पराया कर दिया उरिया l अरे शादी नहीं हुई तो क्या हुआ, मेरा प्यार तेरे लिए जितना पहले था उससे कम तो न हुआ " l

" कैसे बताती सोमित्र बाबू, आपका पता ठिकाना किसे पता था l मै तो समझ चुकी थी कि बिना तुझे देखे ही इस दुनिया से निकल जाऊँगी " l 

" ऐसा नहीं कहते पगली " कहते हुए सोमित्र ने उर्मि को आगोश में ले लिया l दोनों को असीम सुख का अनुभव हो रहा था l उर्मि के भुजापास में बंधा सोमित्र अपने पुराने दिनों में खोता चला गया... कैसे बचपन में दौनो एक साथ खेलते थे उर्मि का बापू मेरे यहाँ काम करता था सो उर्मि भी साथ में आती l सभी उसे उर्मि कहते लेकिन एक अकेला मै ही उसे उरिया कह कर चिढ़ाता लेकिन धीरे धीरे यह चिढ़ उसे अच्छी लगने लगी l ये पता भी न चला कि कब हम बचपन से युवा और जबान हो गये और गुड्डो गुड़ियों का खेल प्यार में बदल गया l एक जैसे सपने देखते, सपने बोते, सपने सजोते.. सिर्फ और सिर्फ सपनो की दुनियाँ में जीते l एक दिन उसके पिता के अहम और ऊंचे खानदान ने उसके सपनो की चिता जला दी l 

अचानक से कमरे का दरवाजे पर कुछ खटका सा हुआ तो सोमित्र की तंद्रा टूटी l सुबह के तीन बज चुके थे l " चलो अब अपने घर चलते है, मैं तुझे इस जगह नहीं रहने दूँगा l सोमित्र ने उर्मि का हाथ पकड़ कर कहा l 

" मैं तुम्हारे साथ नहीं जा सकती सोमित्र बाबू, तुम्हारे घर में हँसता खेलता परिवार है, क्यों आग लगाना चाहते हो मुझ जैसी अभागन को ले जाकर " 

" नहीं उरिया मैं तुझे इस हाल में नहीं छोड़ सकता l मेरा प्यार इतना स्वार्थी तो नहीं है l मैं तेरे लिए कुछ नहीं कर सका तो मेरे होने से क्या फायदा " l 

" ठीक है सोमित्र बाबू, कल आइएगा कल मै तुम्हें निराश नहीं करूंगी l 

सोमित्र का दूसरा दिन बड़ी बेसब्री से कटा l शाम को उर्मि के बताए समय पर उस कमरे पर आया l दरवाजा खुला हुआ था l सामने उस बेड पर उर्मि दुल्हन के लिवास में बैठी हुई थी l 

" ये क्या है उर्मि, मै तुझे लेने आया हूँ" सोमित्र ने कहा l 

" सोमित्र बाबू, मेरा एक काम करोगे फिर मैं इस जगह को बिल्कुल छोड़ दूँगी" l 

" हाँ, जल्दी से बोल क्या करना है" 

" मेरी सूनी मांग में सिंदूर भर दोगे " हथेली पर रखी सिंदूर की डिब्बी को सोमित्र को दिखाते हुए उर्मि ने कहा l 

" बिलकुल पगली है तू" कहते हुए सोमित्र ने उसकी हथेली से सिंदूर की डिब्बी उठाई और चुटकी भर सिंदूर से उसकी मांग भरकर उसे सुहागन बना दिया l

" तुमने मेरे प्यार को अमर बना दिया.. सोमित्र बाबू l अब मै तुम्हारी सुहागन बनकर आराम से जा सकूंगी l तुमने कहा था कि तुम मुझे इस जगह नहीं देख सकते... अब मैं जाने के लिए तैयार हूँ" 

" तो चलो न देर किस बात की" 

" मुझे माफ करना सोमित्र मै तुम्हारे साथ नहीं... अपने बापू के पास जा रही हूँ उसकी हसरत थी कि वो मुझे दुल्हन बना देखे इसलिए मैंने।" कहते हुए उर्मि ने अपने दौनो हाथ खोल दिए जिससे उसके हाथ से गिरी, जहर की शीशी एक तरफ लुढ़कती हुई चली गई l 

सोमित्र की गोद में सिर रखे सुहागन उरिया अपनी जीत पर अजेय मुस्करा रही थी और सोमित्र की आँखो से निकली अश्रुधारा उस महान आत्मा का अभिषेक कर रही थी l


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