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Saket Shubham

Drama


5.0  

Saket Shubham

Drama


टर्मिनल 3 से कॉलेज गेट का सफर

टर्मिनल 3 से कॉलेज गेट का सफर

5 mins 575 5 mins 575

टर्मिनल 3 के गेट नो. 47 की तरफ बढ़ते हुए मैंने एक तस्वीर ली और उसे भेज दी, वही व्हाट्सप्प से। व्हाट्सप्प एक ऐसा

माध्यम है, जहाँ आपको कुछ बोलने के लिए नज़रों की ज़रुरत नहीं होती, जहाँ आप दिल की बात फोटो भेज कर भी कर सकते

हैं या आँखों में हजारों जज्बातों को छुपा के आप बस एक इमोजी भेज निकल सकते हैं।

तस्वीर भेज दी थी मैंने, उधर से सवाल आया “एयरपोर्ट ?"

"हां",मैंने जवाब भेजा

“वहां क्या कर रहे हो ?

"वापस पटना आ रहा'

"फ्लाइट से ?"

"नहीं ट्रेन से"

फिर उसने कुछ ऐसे ही बचकाने मैसेजेस के बाद पूछा, "अराइवल कितने बजे की है"

मैंने टिकट की एक तस्वीर ली, वही स्क्रीनशॉट लेकर और उसे भेज दी।

अराइवल 4:15 की थी। अब उसने थोड़ा वक़्त लिया और चमकते आँखों वाली इमोजी के साथ एक मैसेज भेजा, "मैं रिसीव

करने आऊं ?"

जवाब तो हाँ में ही देना था लेकिन फिर भी 2-3 बार मैसेज टाइप करके डिलीट किया, पहले हाँ लिखा दिल वाली इमोजी के साथ, फिर बिना किसी इमोजी के ही हाँ लिखा और भेज दिया। सीट पर बैठते ही वो मोबाइल फ़ोन को फ्लाइट मोड में रखने की घोषणा होने लगी की, “एट थिस टाइम योर पोर्टेबल इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस मस्ट बी सेट टु एयरप्लेन मोड अंटिल एन अनाउंसमेंट इस मेड अपॉन अराइवल"

लेकिन तब तक ढेर सारे मैसेसेस आ चुके थे जैसे की, "टॉफी भर के लेते आना जेब में" 

"रसगुल्ला भी चलेगा"

"जो मिले लेते आना"

अब मोबाइल में नेटवर्क नहीं था और अब मैं अपने फ़ोन की गैलरी में पड़े तस्वीरों को देखने लग गया, फिर थोड़ी देर में सैमसंग नोट्स में लिखे हुए उन अल्फ़ाज़ों को पढ़ने लग गया जो कुछ उसके लिए, कुछ उसके तारीफ में लिखे हुए और एक उसी के कहे जाने पर लिखे हुए मेरे उन हर्फ़ों को जिसे उसके सामने मैं कभी नहीं पढ़ पाया। एक दिन उसने ऐसे ही कहा था की, "प्रोपोज़ मी, आई वांट तो रिजेक्ट समवन"

मैंने भी मज़ाक में लिख दिया था की, "पसंद हो, हां तुम मुझे पसंद हो, तुम्हारा हँसना, बिन किसी बात पे रोना, चोरी से तस्वीरें लेना, कुछ छीन लेने पर खुश होना, अपनी तारीफ पर शर्माना, वो मासूम सी शक्ल बनाना और कभी अपनी समझदारी से हैरान कर देना, पसंद है मुझे ! और मुझे नहीं मालूम की इश्क किसे कहते हैं लेकिन अगर इसे इश्क कहते हैं तो हाँ हो गया है मुझे भी,

अच्छा खासा बैठा-बैठा गुम हो जाता हूँ, अब मैं अक्सर मैं नहीं रहता तुम हो जाता हूँ, तुम्हारी जैसी प्यारी लड़की को बेशुमार प्यार करने वाला चाहिए, अगर कतरा भर भी कमी हुई तो वो नाइंसाफी होगी और मेरे में और कोई काबिलियत हो न हो लेकिन इस बात का दावा कर सकता हूँ कि जिस शिद्दत से मैं तुम्हे प्यार कर सकता हूँ और कोई नहीं कर सकता और ये मैं हमारे बूढ़े

होने तक करना चाहता हूँ और उस वक़्त तुम्हारा हाथ अपने हाथ में लेकर ये सुनाना चाहता हूँ की तुम फिर उसी अदा से अंगड़ाई लेकर हँस दो आ जाएगा पलट कर गुज़रा हुआ ज़माना" .

अब मेरे लिए ये पढ़ पाना भी उतना आसान नहीं था जितनी आसानी से मैंने कभी ये लिख दिया था। अब कुछ ही वक़्त रह गया था पटना वापस आने में और गुजरते वक़्त के साथ ये सोचने लगा की, 'वो आएगी की या नहीं आएगी,एक अजीब सी बेचैनी थी, अकेले होगी या किसी के साथ आएगी, क्यों ही आना है उसको?'

दिमाग ऐसे हालात में 2 तरह से सोचता है, एक जैसा सच में है और एक वैसा जैसा आपको अच्छा लगे। फिर क्या था मैंने भी किसी ग्यारवीं कक्षा में पढ़ने वाले किसी लड़के की तरह सोचना शुरू कर दिया था की अगर आ गयी वो तो बस गले लगा लूंगा और आज ये सुना ही दूंगा जो लिखा था कभी, इसके साथ और भी लिखने का सोचा लेकिन तब तक विमान ज़मीन पर आ चूका

था, मोबाइल में नेटवर्क आ चूका था और उसका मैसेज मोबाइल में की, "आई एम कमिंग, भागना मत"

दिमाग के बिजली घर से निकलते तार अब बस एक ही जगह सप्लाई दे रहे थे शायद मेरे दिल को। अब सैकड़ों चीजें एक साथ जहन में दौड़ने लगीं जैसे; वो एग्जाम से एक दिन पहले लाइब्रेरी में पीछे से जा कर उसी के कुर्सी के एक कोने से जिसपर वो बैठी थी, उसके चेहरे के भाव को पढ़ना, उसे महसूस करना, उड़ते हुए उसके एक दो बालों का मेरे चेहरे पर आ लगना, किताब के पन्नों को पलटते वक्त उसके हाथ से मेरे हाथ का उतने वक्त के लिए ही मिलना जितने वक्त के लिए हवा मिल पाती हो। थोड़े इंतज़ार के बाद बाहर निकला तो उसे पाया, सामने खड़ी पीले रंग के लिबास में, ऐसा लग रहा था मुझे मानो आसपास कुछ हो ही नहीं, न लोग, न कोई आवाज़, न मेरे पीछे लटका हुआ वो भारी सा बैग। उसे देखने में इतना मशगूल हो गया था की भूल ही गया की

उसे गले भी लगाना था। वहां से कॉलेज हॉस्टल जाते वक़्त ये बात याद तो आयी लेकिन तब तक दिमाग ने इन्द्रियों पर काबू कर लिया था। हल्दीराम जो हमारे कॉलेज के रास्ते में ही था, वहां हम रुक गए कुछ देर के लिए ही सही। उसने कुछ कुछ आर्डर भी किया पर मैं शायद आज बस उससे देखना चाहता था, एक पल भी ज़ियां नहीं करना चाहता था। शायद मुझे देखने भर की तो

इजाजत उसने दी ही थी। उसने एक बार टोका भी की, "नज़रे नहीं मिला पा रही तुमसे ऐसे मत देखो मुझे"

लेकिन वो अपना काम कर रही थी और मैं अपना । बोलते वक़्त न उसके होठ ज्यादा नहीं मिल पा रहे थे। नज़रें मेरी नज़रों से बचती हुई इधर उधर भागने की नाकाम कोशिश कर रही थी। मैं बर्बाद हो रहा था हर एक बीतते पल के साथ लेकिन इससे मुझे न वो रोक सकती थी, न ही मैं खुद को रोकना चाहता था । नज़रें उसकी एक दो बार मेरी तरफ देखती और तभी ही उसके चेहरे पर एक अलग सी मुस्कान आ जाती जो मैंने पहले तो नहीं देखी थी और उसकी पलकें फिर ठीक वैसे ही झुक जाती जैसे की वीडियो कॉल करते

वक्त जब मैं उसकी तारीफ में कुछ कहता और तब झुकती थी।

अब वहां से निकल हम कॉलेज की मैन गेट पर पहुंचे जहाँ से उसे अपने घर और मुझे अपने हॉस्टल जाना था । जाने देने का दिल तो नहीं था लेकिन जाना तो था ही। उसको जाते वक़्त निहारता रहा और फिर उसे कॉल कर के बोला की कॉलेज के पीछे वाले गेट पर 2 मिनट के लिए रुकना, शायद मुझे उसे गले लगाना था। लेकिन उसने बोला, "कल मिलते हैं अब देर हो गयी"

मैंने भी सोचा सच में देर हो गयी और अपने हॉस्टल की तरफ बढ़ गया।


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