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Saket Shubham

Drama


5.0  

Saket Shubham

Drama


आखिरी कंबल

आखिरी कंबल

3 mins 624 3 mins 624

हर साल के ठण्ड की तरह इस साल भी ठंड की शुरुआत लंबे गर्मी से राहत देने से हुई थी और अब जैसे जैसे नवंबर बीतता जा रहा है, ये लाल काका की चाय दुकान के पास वाले पुराने पेड़ की तरह भयावह होती जा रही है। वो पेड़ भी रात में कुछ ज्यादा ही भयावह दिखता है और मैं कभी अकेले रात को वहाँ से नही गुज़र सकता। लेकिन दीदी के साथ होने से मुझे न ठंड और न वो पेड़ से कभी डर नहीं लगा।

अभी आग के पास मैं दीदी के साथ ही बैठा था। सड़क के किनारे और मेरे सर के ठीक ऊपर जलने वाली रोशनी बार बार बन्द होकर जल रही थी जिससे मैं परेशान हो रहा था। मैंने शिकायत दीदी से की तो उन्होंने अनसुना कर दिया और फिर बस यूँ आँख दिखाया जैसे कहना चाहती हो कि जीवन में इससे बड़ी और भी समस्याएँ हैं। आग की लपटें मैं अपनी दीदी की आँखों में देख सकता था। मैंने उसे दुनिया से लड़ते देखा है, गरीबी को हिम्मत से हराते देखा है, डर को भी डराते देखा है, लेकिन कभी परेशान नहीं देखा पर इस साल की ठंड और कामगारों-मेहनतकशों के लिए काम की कमी ने मेरी दीदी को परेशान कर दिया है।

पहले सरकारी हुक्मरानों ने हमारी झोपड़ी तोड़ दी थी और फिर इस ठंड से पहले एक आखिरी कंबल का चोरी हो जाना, दीदी के हिम्मत का इम्तेहान ले रही थी।

मुझे दीदी को ऐसे देखना कभी पसंद नही था तो मैंने टोका, " ये गाना याद है दीदी ?"

दीदी शायद कुछ सोच रही थी, फिर मेरी तरफ बड़े प्यार से देखते हुए बोला, " कौन सा गाना बाबू ?"

मैंने कहा, "ध्यान से सुनो न ! वो चाय के दुकान वाली रेडियो से आ रही है।"

और फिर दीदी के गले में लिपट कर गाने लगा, "आने वाला पल जाने वाला है, हो सके तो इस में ज़िंदगी बिता दो पल जो ये जाने वाला है।"

दीदी सारी परेशानी भुलकर गुनगुनाने लगी और फिर बोली, "याद है ! बाबा तुम्हे कंधे पर बिठा कर, मुझे साथ लेकर गंगा घाट घूमने जाया करते थे। एक दिन मैंने गुड़िया खरीदने की ज़िद मचाई थी और उन्होंने डाँट दिया था।"

मैंने कहा, "हाँ तुम रोने लगी थी तो पापा ने तुम्हें यही गाना सुनाया था न ?"

दीदी अब अपने आँसू पोछते हुए बोली, "फिर रात को वो वाली ही गुड़िया ले आये थे।"

फिर मैं दीदी के गोद में जा कर लेट गया और दीदी सिर पर हाथ फेरते हुए गाने लगी, "हो सके तो इस में ज़िंदगी बिता दो पल जो ये जाने वाला है।" और पता नहीं कब मुझे नींद आ गयी।

अगले शाम जब दीदी वापस आयी तो उनकी थकान, उनके चेहरे की खुशी नही छिपा पा रही थी।

उन्होंने मुझसे लिपटते हुए कहा, "काम मिल गया ! "

दीदी ने कंबल लाल काका की दुकान पर छोड़ दिया और मुझसे बोला, "आज घाट पर चलेंगे।"

हमने एक दूसरे का हाथ पकड़ा और गाते हुए यादों के सफर पर निकल पड़े। 


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