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Jyotsna Saxena

Abstract

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Jyotsna Saxena

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"थकान"

"थकान"

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"मोहिता के आने से घर मे खूब रौनक हो गई है। सूना हो जायेगा घर। उसके जाने पर"नीलम से ये कहते बहुत उत्साहित और उदास भी थी सुनयना।बहुत दिनों बाद स्कूल आई थी।लॉक डाउन के बाद केवल बोर्ड परीक्षाओं के लिए विद्यालय खुला था।

 "2 साल रह गए हैं रिटायरमेंट को।VRS लेकर मोहिता के साथ बंगलोर क्यों नही शिफ्ट हो जाती"नीलम ने उसकी उदासी देखकर कहा

"अरे नहीं ! अश्विनी तो मझधार में छोड़ चल बसे। अभी मेरे ऊपर मकान का लोन और मोहिता के एजुकेशन लोन का ऋण बकाया है। साथ ही उसकी शादी की जिम्मेदारी भी शेष है" 

"हां। सही कह रही हो। लेकिन नौकरी लगने के बाद एजुकेशन लोन तो मोहिता को चुकाना चाहिए ना। " नीलम की प्रश्नवाचक निगाहें सुनयना के चेहरे को टटोल रही थी

"बंगलोर बहुत महंगा शहर है। मुश्किल से गुजारा करती है वो वहां। फिर MNC में नौकरी के हिसाब से उसे अपने को भी मेंटेन करना पड़ता है"

"ह्म्म्म" नीलिमा से बातों के दौरान घर आ गया।

लाडो के आने के बाद कितनी ऊर्जावान हो गईं हैं वो इन दिनों। खुद में बहुत बदलाव देख रही है। आजकल। दौड़ दौड़कर मोहिता के पसन्द के व्यंजन बनाना। घर को आधुनिक तरीके से सजाना।

स्कूल जाते समय टेबल पर मोहिता के लिए खाना। गैस पर आधी पकी खीर और उसेP सोता छोड़कर ड्यूटी चली गईं थी।सांझ का धुंधलका फैलने लगा था। आहिस्ता से हाथ डालकर सांकल खोली।

    मोहिता छत पर किसी मित्र से बातों में मशगूल थी। हाथ मुँह धोकर कपड़े बदलकर किचन में गैस पर खीर रखकर छत पर जाकर मोहिता को चौंकाना चाहती थी सो दबे पांव सीढियां चढ़ते अंतिम 2 सीढ़ी पर ठिठक गईं। 

"अरे यार ! तुम्हे समझ नही आता है। अभी कैसे आऊं?इस लौकडाउन के चक्कर मे पूरा बजट बिगड़ा हुआ है।तभी तो इस गांव में पड़ी हूँ। दिन भर मातोश्री की पकाऊ बातें झेलती हूँ। जरा एक आई पैड का प्रबंध हो जाए। फिर आती हूँ जल्दी"

उल्टे पांव लौट आई सुनयना। बहुत थकान महसूस हुई।ओह ! ये क्या। उफ़न गई सारी खीर।


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