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Anand Mishra

Action

5  

Anand Mishra

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स्वतंत्र नक्षत्र

स्वतंत्र नक्षत्र

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वर्ष 2185

मानव सभ्यता अब केवल पृथ्वी तक सीमित नहीं थी।

चंद्रमा।

मंगल।

गुरु के उपग्रह।

शनि की कक्षीय बस्तियाँ।

कई स्थानों पर भारतीय वैज्ञानिकों और विभिन्न देशों के लोगों ने मिलकर नए नगर बसाए थे।

इन स्वतंत्र उपनिवेशों को सामूहिक रूप से कहा जाता था—

सप्तग्रह संघ।

हर ग्रह अपनी संस्कृति, भाषा और प्रशासन रखता था।

लेकिन सब एक सिद्धांत पर सहमत थे—

"ज्ञान साझा होगा, संसाधनों का न्यायपूर्ण उपयोग होगा, और किसी एक शक्ति का प्रभुत्व स्वीकार नहीं होगा।"

वर्षों तक शांति बनी रही।

फिर अंतरिक्ष के सबसे बड़े औद्योगिक समूह—

हेलिक्स कंसोर्टियम

ने सभी उपनिवेशों पर एक समान संसाधन कर लगाने की घोषणा कर दी।

जो इंकार करता...

उसकी ऊर्जा आपूर्ति रोक दी जाती।

उसकी संचार प्रणाली बंद कर दी जाती।

उसके व्यापार मार्ग अवरुद्ध कर दिए जाते।

युद्ध नहीं।

लेकिन धीरे-धीरे स्वतंत्रता समाप्त की जा रही थी।

मंगल की कृषि बस्ती अन्नभूमि सबसे पहले प्रभावित हुई।

उनकी ऑक्सीजन बनाने वाली शैवाल-प्रणाली के लिए आवश्यक खनिजों की आपूर्ति रोक दी गई।

कुछ ही सप्ताह में पूरा नगर संकट में आ गया।

बस्ती की प्रमुख थीं—

कमांडर वैदेही आर्य।

पूर्व अंतरिक्ष नौसेना अधिकारी।

उन्होंने हथियार उठाने के बजाय सहायता का संदेश भेजा।

अधिकांश उपनिवेश डर गए।

यदि वे सहायता करते, तो अगला लक्ष्य वे स्वयं बनते।

तभी पृथ्वी से एक साधारण मालवाहक अंतरिक्षयान पहुँचा।

उसका कप्तान था—

आरव कश्यप।

वह सैनिक नहीं था।

न राजनीतिज्ञ।

वह अंतरग्रहीय आपूर्ति अभियंता था।

उसने वैदेही से कहा—

"एक बस्ती अकेले नहीं बचेगी।"

"हमें सबको साथ लाना होगा।"

दोनों ने यात्रा शुरू की।

चंद्रमा के वैज्ञानिक।

शुक्र की कक्षीय ऊर्जा प्रयोगशाला।

यूरोपा के जल-अनुसंधान केंद्र।

टाइटन के अभियंता।

बुध के सौर ऊर्जा विशेषज्ञ।

हर स्थान की अपनी समस्या थी।

अपना भय।

अपना स्वार्थ।

आरव ने किसी से युद्ध में शामिल होने की अपील नहीं की।

उन्होंने केवल एक प्रश्न पूछा—

**"यदि आज अन्नभूमि अकेली रह गई..."

"...तो कल आपकी बारी आने पर कौन आएगा?"

धीरे-धीरे सातों उपनिवेश एक साथ आ गए।

उन्होंने विशाल युद्धपोत नहीं बनाए।

उन्होंने अपनी-अपनी विशेषज्ञता साझा की।

वैज्ञानिकों ने नई ऊर्जा प्रणाली विकसित की।

कृषि विशेषज्ञों ने स्थानीय खाद्य उत्पादन बढ़ाया।

अभियंताओं ने स्वतंत्र संचार उपग्रह स्थापित किए।

कानूनविदों ने अंतरग्रहीय स्वशासन का साझा घोषणापत्र तैयार किया।

हेलिक्स कंसोर्टियम ने समझा था कि वे अलग-अलग बस्तियों को दबा देंगे।

उन्हें यह अनुमान नहीं था कि सहयोग किसी भी हथियार से अधिक शक्तिशाली हो सकता है।

अंतिम टकराव युद्धभूमि में नहीं हुआ।

वह अंतरग्रहीय परिषद में हुआ।

हेलिक्स के प्रमुख ने कहा—

"यदि हम व्यवस्था न चलाएँ, तो अराजकता फैल जाएगी।"

वैदेही ने उत्तर दिया—

"व्यवस्था और नियंत्रण एक बात नहीं हैं।"

आरव ने परिषद के सामने सातों उपनिवेशों द्वारा हस्ताक्षरित एक नया समझौता रखा।

उसमें लिखा था—

कोई भी संसाधन एकाधिकार में नहीं होगा।वैज्ञानिक खोजें साझा धरोहर होंगी।किसी उपनिवेश की जीवन-रक्षक प्रणालियों को दबाव के साधन के रूप में उपयोग नहीं किया जाएगा।विवादों का समाधान परिषद करेगी, शक्ति नहीं।

कई महीनों की बहस के बाद समझौता स्वीकार कर लिया गया।

सप्तग्रह संघ स्वतंत्र बना रहा।

कुछ वर्ष बाद मंगल की अन्नभूमि में पहला अंतरग्रहीय विश्वविद्यालय स्थापित हुआ।

उसके प्रवेश द्वार पर एक विशाल धातु-पट्ट लगाया गया।

उस पर अंकित था—

"तारे हमें अलग-अलग दिखाई देते हैं।"

"लेकिन आकाश उन्हें एक ही ब्रह्मांड में जोड़ता है।"

"सभ्यताएँ भी ऐसी ही होती हैं।"

आरव ने विश्वविद्यालय के उद्घाटन पर कहा—

"स्वतंत्रता केवल अपने लिए सुरक्षित रखने की वस्तु नहीं है।"

"स्वतंत्रता तब टिकती है जब शक्तिशाली, कमज़ोर की स्वतंत्रता की भी रक्षा करे।"

उस दिन सातों ग्रहों के बच्चे पहली बार एक ही कक्षा में बैठे।

उनकी भाषाएँ अलग थीं।

उनकी दुनिया अलग थी।

लेकिन उनके पाठ्यक्रम का पहला वाक्य एक ही था—

"सहयोग ही सभ्यता का सबसे बड़ा ईंधन है।"



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