स्वच्छ भारत अभियान
स्वच्छ भारत अभियान
कचरा वाला राजू रोज़ दो डस्टबीन लेकर आता और सोसाइटी में सबसे कहता कि मेम साहब दो डस्टबीन रखिए। एक में गीला और दूसरे में सूखा कचरा डालिए। मुझे दोनों अलग-अलग करने होते हैं क्योंकि सरकार ने दो बड़े डस्टबीन बनाए हैं एक गीले के लिये और दूसरा सूखे के लिये।
सब उससे कहते कि यह तो तुम्हारा काम है हमारा नहीं। हम तुम्हें इस काम के लिये पैसे देते हैं इसलिये तुम जानो कैसे करना है ? ख़ूब बहस करते ! वह समझाता रहता पर कोई नहीं सुनता।
वह फिर भी रोज़ समझाता कि गीला सूखा सब आपस में मिल जाते हैं मेमसाहब, जिससे उसे सूखने में काफ़ी समय लगता है और हवा भी इससे दूषित होती है। अगर गीला कूड़ा अलग होगा तो वह कम समय में सूख जायेगा और हवा को भी कम दूषित करेगा। प्रदूषित वायु लेने से हम सब बीमारी की चपेट में भी तो जल्दी आ जाते हैं। मच्छर भी तो गीले में ही पैदा होता है जिससे मलेरिया, चिकनगुनिया, डेंगूँ ना जाने कितनी तरह की जानलेवा बीमारी आ जाती हैं। इसलिये बरसात के मौसम में तो हमें अधिक सावधानी बरतनी चाहिये।
मिसेज कश्यप तो इतना सुनने के बाद उस पर बहुत भड़क गईं ! कहने लगीं “कचरे वाला होकर हमें समझायेगा, अपनी औक़ात तो देख क्या है ? मैं तुम्हें नौकरी से ही निकलवा दूँगी, अभी बात करती हूँ।” फ़ोन हाथ में लेती है,
मिसेज़ गुप्ता जो सामने के फ़्लैट में थीं सारी बात सुन रहीं थीं तुरंत बाहर आतीं हैं और मिसेज़ कश्यप को समझाते हुए कहतीं हैं. “भाभी जी राजू बात तो बड़े पते की कह रहा है। अगर हम सब एैसा करने लग जायें तो हम सब घर में रहते हुए भी “स्वच्छ भारत अभियान” में अपना थोड़ा सा योगदान कर पाएँगे और जो भूल हम बरसों से करते आ रहे हैं उसे भी सुधार पायेंगें।” मिसेज़ कश्यप भी यह सुनकर शान्त हो जाती हैं।
“हाँ यही तो मैं आप सबको समझाना चाह रहा था।” राजू बड़े जोश से बोलता है।
“राजू ठीक है कल से तुम जैसा कह रहे हो वैसा ही होगा, मुझसे भूल हुई है फिर भी मैं तुमको अनाप-शनाप बोले जा रही थी, माँफ करना मुझे!” कहकर भीतर चली जाती हैं,
अगले दिन से राजू को कुछ समझाना नहीं पड़ता सब दो डस्टबीन लाते और वह ख़ाली कर देता मुस्कुराते हुए।
