स्वाभिमान की कटुनिबौरी ही भली
स्वाभिमान की कटुनिबौरी ही भली
" क्यूँ चित्रा जी ! सुबह की चाय का मजा ले रही हो। ऐसी सुकून की चाय तो हमें नसीब ही नहीं हुई। अब घर गिरस्ती के झंझट से फुर्सत मिले तब ना....! सारा काम निपटाकर चाय का कप लेकर बैठती हूं तब तक तो चाय ठंडी हो चुकी होती है !"
चित्रा जी ने चाय का कब मुंह से लगाया ही था कि सामने के फ्लैट की पड़ोसन मीना जी ने उन पर तंज कसा।
एक तो वैसे ही चित्रा जी सुबह-सुबह बालकनी में कम ही आया करती थी। ऊपर से आज उन्होंने सोचा था कि... अखबार पढ़ते हुए चाय पीयेगी। चाय में तो वैसे ही मधुमेह की वजह से चीनी नहीं डाली जाती थी और पड़ोसन की बात से तो बस चाय का स्वाद ही कसैला हो गया।
चित्रा जी ने अपनी पड़ोसन की बात का जवाब एक सुमित मुस्कुराहट के साथ दिया और किसी भी तरह अपने अकेलेपन का दर्द छुपाकर चुपके से चाय का कप लेकर अंदर आ गईं ।
अब वह भला कैसे बताती है की उम्र के छठे दशक में जब जीवनसाथी भी साथ छोड़ जाता है और शरीर की एक-एक अंग धोखा देने लग जाते हैं और इसके साथ ही इस शरीर के से निकले हुए बच्चे भी जब हाथ छुड़ाकर निकल जाते हैं।.तब यह अकेलापन कितना सालता है और तब यही चाय कितनी बेस्वाद हो जाती है।
रामानंद जी ने सरकारी नौकरी में रहते हुए ही इस रिहायशी इलाके में बड़े शौक से अपनी पूरी जमा पूंजी लगाकर यह मकान बनवाया था कि... बुढ़ापे में अपने बेटे नितांश और बहू त्रिशला के साथ इस घर में आराम से रहेंगे। लेकिन रिटायरमेंट के एक साल बाद ही उनका बुलावा आ गया। बेटी अवनि की शादी पहले ही कर चुके थे इसलिए एक संतोष था कि अपने पीछे कोई जिम्मेदारी छोड़कर नहीं गए।
पर उनके जाने के बाद जो अकेलापन और तन्हाई छोड़कर गए थे उसका दर्द उनकी पत्नी चित्रा जी हर दिन झेलती थी।
ऐसा नहीं था कि...चित्रा जी के बेटे और बहू उन्हें अपने साथ नहीं रखना चाहते थे या फिर बेटी उनका ख्याल नहीं रखती थी।
पर... दोनों की एक ही शर्त थी कि घर द्वार बेचकर सब कुछ हमारे नाम कर दो और हमारे साथ आकर रहने लगो। चित्रा जी ने बहु बहु के बहुत आग्रह करने पर दो महीने के लिए बेटे बहू के साथ रहकर भी आई थी। और वहां जो अपमान उन्होंने झेला था।अपने अस्तित्व का खोकर उन्होंने किसी तरह दो रोटी के निवाला अपमान के साथ निगले थे।उसके बाद उनकी हिम्मत नहीं हुई कि दोबारा बेटी बहू के साथ जाकर रहे।
मां इस घर में अकेली क्या करोगी या घर भेज दो और अभी हम लोग एक बड़ा फ्लैट ले लेंगे ताकि उसमें तुम्हारा एक अपना अलग कमरा रहेगा नहीं तो तुम यहां पर हाल में सोती हो हमें अच्छा नहीं लगता इस तरह के शब्दों की चाशनी में लपेटकर जो बेटा उन्हें अपना घर बेचने को कहने लगा तो वह समझ गई कि उ...सकी मंशा क्या है...?
उन्होंने बड़े ही साथ स्वर में बेटे से कहा बेटा तू भी तो अपना तबादला लखनऊ कर सकता है कानपुर में अपना इतना बड़ा मकान है सब मिलकर साथ रहेंगे तेरे बाबूजी का भी यही सपना था कि यह सब मिलकर एक साथ रहेंगे मैं यहां आऊंगी खामखा किराए के फ्लैट में हम रहेंगे उससे अच्छा इतना अच्छा अपना मकान है क्यों ना सब चलकर भाई साथ रहे चित्र जी ने जब यह कहा तो बेटी की बदले में बहू ने हाथ नचाकर जवाब दिया...
" मां जी आप भी अजीब बात करती हैं कहां मुंबई और कहां कानपुर का वर्क्सपा वाला ना वहां कोई फैसिलिटी है ना कोई अच्छा स्वीमिंग पुल है ना आपके क्लब फैसिलिटी है। वहाँ तो मेरा दम ही घुट जाएगा। और आप इतने बड़े मकान का लेकर क्या करेंगे आपके लिए तो एक ही कमरा काफी है कमरे से भी ज्यादा आप चाहे तो बच्चे की नर्सरी में भी अपनी एक हाथ डालकर रह सकती हैं। बेहतर है कि आप ही हमारे साथ आकर रहें!"
बस...उसके बाद से चित्रा जी ने बहु बेटे को कुछ नहीं कहा।
फिर कुछ दिन बेटी के घर भी गई तो वहां भी बेटी ने लगभग अपनी इच्छा जता ही दी कि...
" मां! क्या रखा है उस घर में...? वह घर बेच दो. और हमारे साथ आकर रहो। मैं भैया और भाभी से भी कह दूंगी कि जो बुढ़ापे में माँ की देखभाल करेगा... सारी संपत्ति उसे ही मिलेगी तुम्हारा हमसे हमारे साथ आकर रह सकती हो!"
चित्रा जी समझ रही थी कि अभी-अभी बेटी के बच्चा हुआ है और बाहर मेड कितनी मुश्किल से मिलती है विश्वासी भी नहीं मिलती तो एक तरह से उनके लिए मेड की जॉब का ऑफर था और साथ में ही अपना खर्चा भी खुद लेकर आना था घर भेज देती तो उनके लिए रहने का ठिकाना नहीं रहता तो मजबूर होकर वह बेटी और बेटे के ऊपर निर्भर हो जाती है और अपना स्वाभिमान अपना अस्तित्व भेज कर वह दो जून का निवाला मंजूर नहीं कर पा रही थी।
मुझे पता था कि कानपुर के उसे इलाके में रहने में रात में कभी डर लग सकता है चोरी कर सरकारी का डर है बुढ़ापे में हरी बीमारी में भी कौन देखेगा लेकिन फिर भी उन्होंने अपने आपकी हिम्मत जुटा और वेदों का केसरी क्लब ज्वाइन किया जहां शनिवार रविवार को सारे वृद्ध जमा होते और जिंदगी के शाम को भी सुबह के उजाले में भरने की कोशिश करते धीरे-धीरे समिति के लेटर और योग क्लब में अपने आप को इनरोल किया और एक अच्छी नौकरानी मिल गई कुल मिलाकर जिंदगी की जगह गाड़ी चल निकली बचे हुए समय में कभी अपना कुछ लिखती पड़ती और अपनी जिंदगी के सार्थकता को सिद्ध करने के लिए उन्होंने छोटा सा किचन गार्डन शुरू कर दिया।
जिंदगी बहुत खूबसूरत तो नहीं लेकिन स्वाभिमान के साथ कट रही थी उन पर किसी का एहसान नहीं था तो चेहरे पर भी धीरे-धीरे आत्मविश्वास और लड़ाई आती जा रही थी समझ में भी लोग अब उसका उनके उदाहरण देने लगे थे कि इस उम्र में भी उन्होंने स्वाभिमान को चुना था।
हां...चित्रा जी ने अपने अस्तित्व की सार्थकता के एवज़ में अपने अकेलेपन और स्वाभिमान को चुना था।
माना... अकेले का सफर बहुत थका देता है। पर उसे साथ से कहीं काफी बेहतर होता है...जहां खुद के अस्तित्व को नगण्य कर दिया जाए और अपमान के साथ हर दिन जीना पड़े।
चित्रा जी ने अपमान की मीठी पूरी की जगह स्वाभिमान की कटुक निबौरी को चुना था। जो उन्हें सम्मान से जीवन जीने के लिए सबसे जरूरी लगा था।
चित्रा जी अंदर जाकर चाय का कप लेकर बैठी ही थी कि...
उनके स्वयंसेवी संस्था से कॉल आ गया कि...
" मैडम आपके बिना मुश्किल हो रहा है। जल्दी आइए। अभी आपकी बहुत जरूरत है!"
और... चित्रा जी मुस्कुराईं...उन्हें फिर से अपनी सार्थकता का बोध हुआ और चाय का कसैला स्वाद फिर से स्वादिष्ट लगने लगा।
(समाप्त )
