सुनहरी-फ़ीकी ज़िन्दगी में इक चमक
सुनहरी-फ़ीकी ज़िन्दगी में इक चमक
बचपन में हम सबने एक छोटी लड़की को रस्सी पे चलते एयर करतब दिखते देखा है। उसके साथ उसके माता-पिता या कोई परिजन भी होते थे, जो उसे निडर होकर ऊपर चढ़ने को कहते थे, उसका विश्वास बढ़ते थे की अगर वो लड़खड़ाई या गिर पड़ी तो उसे बचाने उसके अपने नीचे खड़े हैं। वो मासूम सी चेहरे पर एक मुस्कुराहट लिए ऊपर चढ़ जाती थी और करतब दिखाकर राह चलते लोगों को आकर्षित करती थी, बढ़ती भीड़ उसका मनोबल और प्रोत्साहन का माध्यम बन जाता। अंत में चंद सिक्कों को समेट कर वो शहर से कोसों दूर अपने तंबू वाले घर में वापस लौट जाते थे।
यह कहानी है वैसे ही एक नन्ही बच्ची 'सुनहरी' की। सुनहरी ३ साल की कच्ची उम्र से ही अपने मैया और बापू के साथ शहर-शहर में घूम कर करतब दिखाया करती थी। दर्शक भी जब तक तमाशा खत्म न होता एक रुपया जेब से नहीं निकालते थे। कोई बिस्कुट का पैकेट थमा त तो कोई चॉक्लेट देकर दोबारा करतब दिखाने की मांग करते और कोई- कोई तो जाते-जाते कह जाते थे कि कैसे माँ-बाप हैं? छोटी सी बच्ची की जान दाव पे लगा रखा है? पाल पोस नहीं सकते तो पैदा ही क्यों करते है क्या पता?
पर कोई मुफ्त की एक रोटी उस नन्ही सी जान को बिना करतब दिखाए नहीं देता था।
सुनहरी ५ साल की थी, तमाशा दिखाने जाते वक्त इसकी नज़र हमेशा स्कूल जाते हुए बच्चों को देख कर उदास हो जाया करती थी। भूख और बेबसी ने उसके नन्हे हाथों में लकड़ी से बनी पेंसिल की जगह बांस का एक खम्बा पकड़ा दिया, एक रोज़ की बात है, गर्मी का मौसम था। दिन बहुत हीं कठिन गुज़र रहा था। सूरज अपने ताव से उनके शरीर की ऊर्जा को तोड़ रहा था। उसका बापू गर्मी से लू लगने की वजह से वहीं बेहोश होकर गिर पड़ा और एकाएक वहीं उसकी सांसे थम गई। मदद का एक भी हाथ नहीं मिला। शहर की भीड़ में उनके चीखें जैसे खो गयी।
जैसे तैसे करके उसकी मैया और सुनहरी छोटे-मोटे तमाशे दिखाकर अपने पेट भर रही थी। कभी कभार उसकी मैया ढाबे में बर्तन भी साफ कर लिया करती थी। सुनहरी अब 10 साल की हो गयी थी। भाग्य की विडम्बना देखें उसकी मैया का साथ भी छूट गया जब वो एक ट्रक के नीचे आ गयी। अकेली, अनाथ, बेसहारा वो १० साल की बच्ची अब सड़कों पे घूमती फिरती, कहीं ढाबे में बर्तन धोकर खाना मांग लेती तो किसी के घर के सामने का कचड़ा उठाकर रोटी मांग लेती थी।
रविवार का दिन था, शहर के बीचों-बीच एक बाल उद्यान में वो पहुँच गयीं, वहां बहुत सारे छोटे बच्चे हँसी -खुशी से अपने परिजनों के साथ खेल रहे थे। सुनहरी सबको देखकर उदास सी खड़ी थी। वहीं दूसरी ओर एक निःसंतान दंपति खड़े होकर उन बच्चों को देख रहे थे। प्यारे-प्यारे खिलखिलाते हुए मासूम चेहरे देखकर उनकी छवी को अपने अंतर्मन के किसी कोने में समेट रहे थे। सुनहरी झूले की ओर बढ़ रही थी, वहां पहुंची और उस झूले पर बैठने लगी। पास खड़ी एक महिला ने उसे डाँट लगाकर भगा दिया, कहा कि यहां तुम नहीं खेल सकती ये हमारे बच्चों के लिए है। सुनहरी वहां से डर के मारे निकल आयी। तभी उस पर उस दंपति की नज़र पड़ी। दोनों उसकी ओर बढ़ने लगे, उसके पास पहुँचकर उसका नाम पूछा। सहमी आवाज़ में उसने अपना नाम बताया- "मेमसाब मेरा नाम सुनहरी है।" उन्होंने उसके बारे में पूछा, सुनहरी की मुँह से उसकी पूरी कहानी सुनने के बाद दोनों की आँखें भर आईं। एक दूसरे की तरफ देखा और उससे पूछा- "बेटा क्या तुम हमारे साथ चलोगी?"
सुनहरी ने झट से जवाब दिया- "जी मेमसाब मैं चलूंगी, मुझे बस दो वक्त का खाना दे देना, मैं घर का काम कर लेती हूं।"
उसके मुँह से ऐसा सुनकर दोनों ने उसके सिर पर हाथ रखा और कहा- "हम तुम्हें नौकरानी नहीं अपनी बेटी बनाकर रखेंगे, हमें नौकरानी की ज़रूरत नहीं बल्कि एक संतान की है। जिसे माँ-बाप की ज़रूरत हो, और जो हमारे जीवन के इस अधूरेपन को अपनी हँसी से पूरा कर दे। क्या तुम हमें अपने माँ-पाप के रूप में स्वीकार करोगी?"
सुनहरी ने नन्ही सी उम्र से ही बहुत कुछ देख लिया था। उसका पिछला सबकुछ उसे याद आ गया, रोते-रोते उसके मुँह से माँ-पापा निकल गया। उस दंपति ने झट से उसे गले लगाया, तीनों की आँखों में आँसू और दिल में परिवार पूर्ण होने असीम खुशी थी।
इस कहानी के माध्यम से मैं पाठकों व श्रोताओं को यह संदेश देना चाहती हूँ कि ऐसे बहुत सी सुनहरी हम अपने रोज़ मर्रा की ज़िंदगी में देखते हैं, और ऐसे निःसंतान दंपति भी जो डॉक्टरों के क्लीनिक के चक्कर काटते रहते हैं मगर संतान प्राप्त नहीं कर पाते।
तो क्या इस दंपति की तरह असहाय बच्चों को अपनाकर अपने जीवन का वो सूनापन मिटा नहीं सकते?
जिन बच्चों को सपने देखने के लिए सिराहने नसीब नहीं होते क्या हम उनका सिराहना बनकर उनको सपने देखने और उसे पूरा करने का सुख नहीं दे सकते? किसी बेसहारा का सहारा बनकर , उनकी ज़िंदगी से अंधेरा मिटाकर, उनकी सपनों में अपनी उड़ान भर के देखिये। न जाने हम कितनी कोशिशें करते हैं उस अधूरेपन को पूरा करने के लिए, एक कोशिश ये भी कर के देख लीजिए। संतान सुख की प्राप्ति खुद से जन्में बच्चे से होती है, इस बात को मैं नहीं नकारूँगी पर इतना ज़रूर कहना चाहूंगी कि मातृत्व व पितृत्व का एहसान उस पे निर्भर नहीं करता। ये एहसास किसी भी बच्चे को देखकर हो सकता है। उन बच्चों की मुस्कुराता की वजह बनकर देखिये... कुछ मिले न मिले आत्मशांति और आत्मसंतुष्टि ज़रूर प्राप्त होगी।
