Priya Kanaujia

Fantasy


4.5  

Priya Kanaujia

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सुहाना सफ़र

सुहाना सफ़र

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कुछ सफ़र हमारे जहन में हमेशा के लिए अपनी याद छोड़ जाते हैं और उन्हें याद करने में भी बड़ा सुकून मिलता है। यह कहानी है दुर्गा की जो स्वभाव से बहुत चुलबुली लड़की है और उसका सपना है पूरी दुनिया में भ्रमण करने का। दुर्गा ने बचपन से बस यहीं सपना देखा है कि वह दुनिया को अपनी नज़र से देखेगी। साल बीतते गए मगर दुर्गा ने अपनी उम्मीद नहीं टूटने दी ,वह सही वक्त का इंतजार कर रही थी। जब भी वह घर से बाहर जाती थी घर का कोई न कोई सदस्य उसके साथ जाता था, यहां तक कि स्कूल भी उसे उसका भाई छोड़ने जाता था। दुर्गा की स्कूल की पढ़ाई पूरी हो गई थी और उच्च शिक्षा के लिए उसे शहर भेजा जा रहा था मगर उसे अपने पिताजी के दोस्त की बेटी के साथ हाॅस्टल में रहना था। फिर भी दुर्गा बहुत खुश थी कि शायद उसे कभी मौका मिल जाये। दुर्गा को यह मौका बहुत ही जल्दी मिल गया जब उसे घर जाना था , उसकी सहेली पहले ही अपने घर जा चुकी थी और घर के सब लोग व्यस्त थे क्योंकि उसकी बहन की शादी थी। दुर्गा के तो मानों आज पंख ही लग गए थे क्योंकि आज उसे पहली बार अकेले सफ़र करने का मौका मिल रहा था और वह निकल पड़ी अपने पहले सफ़र पर।

दुर्गा बस स्टेशन पहुंची और बस में खिड़की वाली सीट पकड़ कर बैठ गई। बस ने जैसे ही चलना शुरू किया तो हल्की-हल्की बारिश होने लगी। दुर्गा ने अपनी खिड़की का शीशा खोला और बारिश का मजा लेने लगी। बारिश की फुहारें जब उसके गालों पर पड़ रहीं थी तो वह ऐसा महसूस कर रही थी जैसे कोई मयूर अपने सारे पंखों को फैलाकर झमाझम बारिश में नृत्य कर रहा हो। वह अपनी हथेलियों को बारिश की बूंदों से बार- बार भिगा रही थी। जब बस रास्ते में रुकी तो सब चाय नाश्ता करने के लिए नीचे उतरने लगे।

अब बारिश भी थम चुकी थी तो दुर्गा भी बस से बाहर आ गई और सीधा चाय की दुकान पर जा पहुंची। उसने चाय पी और एक चिप्स का पैकेट खोलकर खाने लगी। सब आकर बस में बैठ गये और बस दोबारा चल पड़ी। जब दुर्गा घर पहुंची तो घर में सब उसकी तारीफ करने लगे कि जो लड़की कभी घर के बाहर अकेले नहीं निकली वह आज इतना लम्बा सफ़र अकेले तय कर आयी। अब तो दुर्गा का आत्मविश्वास और भी प्रबल हो चला था। शाम को उसकी दीदी की सगाई हुई और उसने देखा कि उसकी दीदी उतनी खुश नहीं लग रहीं थी जितना होना चाहिए।

सगाई के बाद जब सब चले गए तो दुर्गा ने दीदी से पूछा कि वह अपनी सगाई से खुश क्यों नहीं है तो दीदी के आंसू छलक आए और उन्होंने दुर्गा को बताया कि उनका सपना एयर होस्टेस बनकर अलग-अलग देशों में घूमने का था मगर घरवाले उनके एयर होस्टेस बनने के खिलाफ हो गये और शादी तय कर दी। उन्होंने बोला कि ऐसा नही है कि उन्हें इस शादी से कोई एतराज़ है बस वह अपने सपने के टूटने से आहत हैं। दीदी ने दुर्गा से पूछा कि उसका क्या सपना है। दुर्गा ने दीदी को जब बताया कि उसका सपना पूरी दुनिया भ्रमण का है तो दीदी ने बोला कि वह उसका सपना कभी नहीं टूटने देंगी ,हर हाल में उसका साथ देंगी। दीदी की शादी सम्पन्न होनें के बाद दुर्गा अपने हाॅस्टल वापस आ गई। धीरे-धीरे वक्त कब निकल गया पता ही नहीं चला और दुर्गा अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद घर वापस आ गई। उसने अपने पिता जी से अपने दुनिया भ्रमण के सपनें के बारे में बात की तो उसके पिता ने घर में भूचाल ला दिया। उन्होंने साफ-साफ कह दिया कि हमारे घर की बेटियां ऐसे ख्वाब नही पालतीं। दुर्गा का तो मानों दिल ही टूट गया था और वह अपने सारे सपनें समेटकर कई दिनों तक दुबककर रोती रही। दुर्गा अपने आप को सम्भाल ही रही थी कि एक दिन अचानक उसकी दीदी को उनके ससुराल वाले हमेशा के लिए घर छोड़ गए क्योंकि दीदी के पति को एक नौकरी पेशा लड़की से शादी करनी थी और वे दीदी को बेवकूफ समझते थे। आज दीदी ने बोलना शुरू किया कि जो उनके साथ हुआ वह उनकी बहन के साथ नहीं होने देंगी।

दीदी ने दुर्गा का हाथ पकड़ा और बाहर जाने लगी तो उनके पिता जी ने कहा कि आज मैं तुमलोगों को नहीं रोकूंगा जाओ कर लो अपने सपने पूरे। पिताजी ने कहा ' लौट आना मुसाफ़िर ' मगर अपनी मंजिल पाने के बाद। दोनों बहनें अपने सपनों को पंख लगाकर अपने सफ़र पर निकल पड़ी थी। सबसे पहले दोनों बहनें भारत भ्रमण पर निकली। कभी आगरा का ताजमहल, कभी बनारस का घाट, कभी राजस्थान का गुलाबी शहर जयपुर तो कभी कश्मीर की वादियां , भारत का कोना- कोना दोनों बहनों ने छान डाला। एक दिन दुर्गा ने दीदी को उनके सपने के बारे में याद दिलाया और जिद करके उन्हें वापस एयर होस्टेस बनने भेज दिया। अब तो दुर्गा हाथ में कैमरा लेकर आज इस देश तो कल अगले देश बस घूमती ही रहती थी। ऐसा करते- करते कई साल बीत गए और एक दिन दुर्गा को फोन आया कि उसकी दीदी एक एयर होस्टेस बन गयी हैं और वह बहुत खुश हुई। उसकी दीदी जब उससे मिलने आयीं तो उस वक्त वह फ़्रांस में थी। दोनों बहनें एक-दूसरे के गले मिलीं और घूमने चल पड़ीं। दोनों बहनें पेरिस पहुंची जिसे 'प्यार के शहर ' और ' रोशनी के शहर' जैसे उपनामों से भी बुलाया जाता है। दोनों बहनें एफिल टॉवर , नोट्रे डेम गिरिजाघर, सैक्रे कोएर, सीन नदी और डिज्नीलैंड घूमी। दिनभर घूमने के बाद जब दोनों बहनें अपने होटल वापस आयीं तो रात में दीदी ने दुर्गा से पूछा कि वह घर कब वापस जायेगी। दुर्गा ने दीदी से कहा कि अब बस ग्रीस यात्रा बची है उसके बाद सीधा घर। सुबह होते ही दीदी वापस अपने काम पर चली गई और दुर्गा अपने अगले सफर ग्रीस शहर केे लिए निकल पड़ी। दुर्गा अपने आधे सफर पर ही पहुंची थी कि अचानक से उसके कानों में एक आवाज पड़ी, उसने देखा कि सामने एक नौजवान खड़ा था और उससे पूछ रहा था कि क्या वह उसके साथ बैठ सकता है।

दुर्गा ने हां में सर हिलाया तो वह लड़का पास आकर बैठ गया। दुर्गा अपने साथ एक डायरी रखती थी जिसमें वह अपनी यात्रा के दौरान की सारी बातें लिखती रहती थी। लड़के ने दुर्गा से कहा कि मेरा नाम राज है और आपका ? दुर्गा ने उसकी बातों पर ध्यान नहीं दिया और चुपचाप डायरी लिखती रही। लड़के ने मुस्कराते हुए कहा मैंनें आपसे ही पूछा है जी, तो दुर्गा ने कहा जी मेरा नाम दुर्गा है। राज ने कहा कि मैं भारत से ग्रीस भ्रमण पर आया हूं क्या आप भी वहीं जा रही हैं तो दुर्गा ने हां में सर हिला दिया। राज स्वभाव से काफी चंचल था लेकिन दुर्गा के शांत स्वभाव और सादगी से वह काफी प्रभावित हो गया था। थोड़ी देर में दोनों की मंजिल आ गई थी तो राज ने दुर्गा से पूछा कि अगर आप बुरा नहीं माने तो क्या मैं आपके साथ चल सकता हूॅं क्योंकि आपको देखकर ऐसा लगता है जैसे आपने दुनिया घूमी है और मैं तो पहली बार घूमने निकला हूॅं। दुर्गा ने कहा कि हां मैं सच में पूरी दुनिया घूम चुकी हूॅं और ये आखिरी मंजिल है, तुम मेरे साथ चल सकते हो। सबसे पहले दोनों एक्रोपोलिस देखने गए, वहां से क्लाइंब माउंट ओलिंप और फिर मेलिसनी गुफा गये। दोनों बहुत थक गए थे और भूखे भी थे। दोनों ने पेटभर खाना खाया और फिर होटल की तलाश में निकल पड़े। रात काफी हो गई थी तो सारे होटल बंद हो चुके थे। राज ने दुर्गा से पूछा अब क्या करें। दुर्गा ने कहा कि मेरे साथ कई बार ऐसा हो चुका है इसीलिए मैं हमेशा अपने साथ रुकने का सामान लेकर चलती हूॅं। थोड़ी ही देर में शहर से कुछ दूर पर दुर्गा ने अपना टेंट लगा लिया।

उसने राज से कहा कि वह उसके साथ टेंट में आज रात के लिए रुक सकता है। दुर्गा के सो जाने के बाद राज काफी देर तक दुर्गा को निहारता रहा और सोचने लगा कि कोई पूरी दुनिया घूमने के बाद भी इतना शांत और सादगीपूर्ण कैसे हो सकता है। यहीं सब सोचते- सोचते वह कब सो गया उसे पता ही नहीं चला। सुबह राज ने पूछा अब कहां चलना है तो दुर्गा ने कहा कि आज हेफेस्टस मंदिर चलना है। दोनों पूरा दिन साथ घूमते रहे। आखिर वह दिन आ ही गया जब कई सालों बाद दुर्गा अपने घर जाने वाली थी और जब राज को यह बात पता चली तो उसने कहा दुर्गा मैं तुमसे कुछ कहना चाहता हूॅं , मैंने जबसे तुम्हें पहली बार देखा था उसी पल से मुझे तुमसे प्यार हो गया था और मंदिर में भी मैंने तुम्हें ही मांगा। दुर्गा ने राज से कहा कि मैंने अपने पिता से दुनिया घूमने की इजाजत ली है न कि प्यार करने की, मैं उनका और दिल दुखाना नहीं चाहती। राज ने दुर्गा से पूछा क्या मैं तुम्हारे साथ भारत वापस चल सकता हूॅं तो दुर्गा ने हां कर दी क्योंकि वह भी मन ही मन राज को प्रेम करने लगी थी।

भारत पहुंचने के बाद जैसे ही दुर्गा अपने शहर जाने को बस की तरफ मुड़ी, राज ने दुर्गा का हाथ पकड़ लिया और कहने लगा 'लौट आना मुसाफ़िर '। राज के ये शब्द सुनते ही दुर्गा राज़ के गले लगकर जोर से रोने लगी और बोली मुझे माफ़ कर देना राज मैं तुमसे बहुत प्यार करती हूॅं मगर मैं अपने घरवालों के खिलाफ अब और नहीं जा सकती। फिर दोनों ने एक-दूसरे को नम आंखों से विदा किया। दुर्गा के घर पहुंचते ही घर में खुशहाली छा गई। सबने दुर्गा का जोरदार स्वागत किया। सब दुर्गा से रोज अलग-अलग देशों के बारे में जानते और खुश होते मगर दुर्गा अपने आप में ही खोई रहती।एक दिन दुर्गा ने दीदी को सब कुछ बता दिया। इधर राज ने दुर्गा की तलाश शुरू कर दी और एक दिन जब दुर्गा का पता मिल गया तो सीधे दुर्गा के घर अपने माता-पिता के साथ जाकर उसका हाथ मांग लिया। दुर्गा की तो खुशी का ठिकाना नहीं रहा। घरवालों ने दुर्गा की शादी राज से करवा दी। दुर्गा ने एक‌ संस्था खोल ली जिसमें वह लोगों को विश्व भ्रमण सम्बंधित सारी जानकारियां देने लगी। दुर्गा और राज अब साथ- साथ अपनी जिंदगी का सफर खुशी से तय कर रहे थे।


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