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Shishir Mishra

Drama

3  

Shishir Mishra

Drama

सरिता करे पुकार

सरिता करे पुकार

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फिर एक इंसान को आज मेरी याद आई। आया बड़े शांत मन से आकर मेरे सामने पहाड़ो की कोख में बैठा और बोला, ' हे सरिता, मुझे यहाँ आने में बहुत कठिनाई झेलनी पड़ी। मैं तुम्हारी कहानी जानने आया हूँ।'

मैंने कहा, ' बस मेरे बहाव के साथ तुम बहते चले जाओ, तुम्हे स्वयं ही ज्ञात हो जायेगा मेरे जीवन के बारे में। '

वो उठा, अपने थैले से एक कलम, एक डायरी निकाली, और मेरे साथ चलने को तैयार हो गया। उसने अपनी डायरी में जो कुछ भी लिखा आप वही पढ़ने जा रहे हैं। 

" मेरी यात्रा का पहला दिन, जब ये नदी, इन पहाड़ों की छाती पर स्थित इस सरोवर से, अपना सब कुछ पीछे छोड़ लोगो की ज़रूरतों को पूरा करने, कल-कल करती इस स्वर्ग को छोड़ती है तो ना जाने बादल कितने बर्फ रूपी आँसू गिराते हैं। एक पल को ऐसा लगता है कि नदी भी इन आँसुओं को खुद में समाती लौट पड़ेगी परंतु अपने कर्म-पथ पर आग्रसर हो चुकी नदी अपने स्वार्थ के लिए रुकती नहीं। 

आगे बढ़ने पर उसका पथ प्रसन्नताओं से भरा मालूम होता है। घाटियों में बिखरे रंग-बिरंगे फूलों की अलग-अलग खूशबू मिलकर जब एक होती है और वहाँ की ताज़ी हवाएँ जब नदी के हृदय को चूमती हैं तो वहाँ से कोई नाचीज़ ही हो जो चला जाए, पर वादे के मुताबिक वो रुकती नहीं।

चलते-चलते उसकी मुलाकात एक पथरीले किनारे से होती है, शायद यहाँ खड़े होने के लिए लोगों को मिट्टी नहीं पत्थर ज्यादा अच्छा लगता हो जो दोनो ओर टांको की तरह जड़ दिया। सबसे मज़ेदार बात तो ये है कि यहाँ हजारों की संख्या में लोग नदी की पवित्रता को अपने प्लास्टिक के डिब्बों में उसके कुछ अंश को कैद करते हैं अौर अपनी ज़िंदगी भर की इकट्ठा सारी मैल नदी को अर्पित करते हैं और उसी से पूजा करके कहते हैं कि मेरे जीवन में कभी दुख ना आए। कुछ लोगों की मैल तो इतनी काली होती है कि उन्हे साबुन, शैंपू, फूल-माला, अबीर-गुलाल और ना जाने क्या क्या चीजों की जरूरत पड़ती है और इतने श्रद्धापूर्ण होते हैं कि ये चीजें उपहार में दे जाते हैं। 

इन शोर शराबों से दूर जाने के मन से जब ये नदी तेजी से आगे बढ़ती है तो निराशा, उदासी और कमजोरी उसकी चाल को धीमा बना देती है। क्योंकि उसका सामना एक विशालकाय घर की तरह नजर आती एक गरम, दहकती फैक्टरी से होती है। गुस्से में धूँआ उगलती इस जनता की जान ने इस नदी का जीना हराम कर दिया है। काली और असहाय हो चुकी नदी की आधी जान तो यहीं पर निकल जाती है और बाकी रह गयी कुछ कसर लोग गर्मागरम बहस करके और एक दूसरे पर आरोपों की बरसात करके पूरी कर देते हैं।

यहाँ से नदी का निर्जीव और बेरहम रूप लोगों को देखने को मिलता है। फिर मार्ग में आ रही सारी बाधाओ का अब सामना नहीं वो पलटवार करने लगी। लोगों के अट्टहास पर अब वो बाढ़ लाने लगी और इस पर भी जब सियासत ठंडी ना हुई तो थकी हारी नदी अपने अंतिम क्षणों की ओर बढ़ती है। आगे चालकर उसको पता चलता है कि इंसानो की तरह उसकी बर्बादी का भी किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता और इसी निराशा में डूबी वो अपने यमराज समुद्र के मुख में समाहित हो जाती है। सालों की खूशबू, मधुर स्वर, संघर्ष को एक पल में खत्म कर वो धीरे-धीरे मरती है। "

मेरी इस कहानी में उस शांत इंसान की बड़ी भूमिका है पर मेरी ही तरह वो भी अंत में निराश हो जाता है। उसका जीवन भी समाप्त हो जाता है। पर हर रोज़ हर पल मैं इसी उम्मीद के साथ निकलती हूँ कि कोई तो मिले जो मुझे मुद्दा बनाने की बजाय मेरे पथरीले किनारों को स्पर्शमयी बनाए, मुझमें मैल अर्पित ना करे और मुक्ति दिलाए मुझे इन ज़हर उगलती फैक्ट्रियों से। 


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